Grass

पूर्वोत्तर राज्यों के लोगों ने प्रकृति और संस्कृति, कला और जीवन, सामरिक ललक, भावनात्मक एवं आध्यात्मिक शांति, जैव एवं सांस्कृतिक विविधता के बीच एक बेमिसाल तालमेल स्थापित किया है और इसे संरक्षित भी किया है। इन लोगों ने इस संतुलन की खूबी को संगीत, कला, स्थापत्य, अपनी सोच और ज्ञान प्रणाली, जीवन के आधारभूत रीति रिवाज से लेकर अपने कार्यों, मौसम और प्रकृति में संजोये रखा है।

कलम की ताकत से होने वाले बदलाव महत्वपूर्ण होते हैं. खासकर तब, जब नीतियां धीरे-धीरे घिसट रही हों और जिन बदलावों की हमें जरूरत है, वे कहीं नजर न आ रहे हों. जरूरी यह होता है कि हम एक उस चीज को पकड़ लें, उस नस तक पहुंच जाएं, जिससे चीजें अपने आप गति पकड़ लें. मुझे लगता है कि केंद्रीय पर्यावरण व वन मंत्री जयराम रमेश की सभी मुख्यमंत्रियों को लिखी गई वह चिट्ठी ऐसा ही बदलाव ला सकती है, जिसमें उन्होंने लिखा है कि बांस घास हैं, लकड़ी नहीं.

देश भर में अनेक मामलों में खराब नीतियों और बदलाव की धीमी गति को देखते हुए सुधार की सख्त आवश्यकता महसूस की जा रही है। इस संबंध में ऐसे सुधार आवश्यक हैं जो व्यापक पैमाने पर और जरूरी रफ्तार से अपना असर छोड़ सकें। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने सभी मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखकर स्पष्ट किया है कि बांस दरअसल घास है न कि इमारती लकड़ी। उनका यह पत्र निश्चित रूप से सार्थक दिशा में उठाया गया एक कदम है।

हाल ही में केंद्र सरकार ने बांस को पेड़ नहीं, घास की संज्ञा दे दी है. इस आधिकारिक पुष्टि के साथ ही लम्बे समय से बांस को घास घोषित किये जाने के लिए चल रहे अभियान को राहत मिली है. इस आधिकारिक पुष्टि से जंगलो में रहने वाले आदिवासियों के अधिकार भी स्थापित हो सकेंगे.

बांस के घास घोषित होने के साथ ही उम्मीद है कि हमारे जंगलों का नुकसान कुछ कम होगा और देश के करोड़ों लोगों को रोज़गार मिल सकेगा. साथ ही साथ देश के आदिवासियों को अपने जंगलों और उन से मिलने वाले फायदों पर बेहतर इख्तियार मिल सकेगा.