मौत

बीते 16-17 जून की रात उत्तराखंड में हुए जलप्लावन और जनधन की अपार क्षति के बाद एक बार फिर से पहाड़ों पर निर्माण और विकास कार्यों की सार्थकता और आवश्यकता पर पर्यावरणविदों व भूगर्भविज्ञानियों के बीच बहस तेज हो गई है। अचानक से ही पहाड़ों को तोड़ने के लिए विस्फोटकों के हुए प्रयोग की मात्रा का हिसाब किताब ढूंढ ढूंढकर निकाला जाया जाने लगा है। टिहरी बांध के साथ ही साथ होटलों, रिजॉर्टो के निर्माण कार्यों की एक सुर में आलोचना की जाने लगी है। कारपोरेट्स, उद्योग जगत व बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रसित लोगों द्वारा उन्हें विनाश का पुरोधा बताया जाना तो अवश

कभी महाराष्ट्र औद्योगिक दृष्टि से अव्वल और सामाजिक दृष्टि से प्रगतिशील राज्य के रूप में मशहूर था लेकिन पिछले कुछ वर्षों में उसकी चर्चा किसानों की आत्महत्याओं के कारण ज्यादा होने लगी। अब महाराष्ट्र में एक और गंभीर समस्या सिर उठा रही है और वह है- बड़े पैमाने पर बालमृत्यु ।पिछले कुछ वर्षों में बालमृत्यु राज्य की राजनीति में सबसे चर्चित मुद्दा बनता जा रहा है। सुप्रसिद्ध समाजसेवी और महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र के सुदूर आदिवासी इलाकों में पिछले कई दशकों से काम करनेवाले अभय कुमार बंग की अध्यक्षता में बालमृत्यु की समस्या का अध्ययन करने के लिए बनी समिति की रपट में तो कई चौकानेवाल

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