अर्थशास्त्र

19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में पश्चिमी यूरोप में आर्थिक विचारों के दो विरोधी संप्रदायों- जर्मन ऐतिहासिक संप्रदाय और ऑस्ट्रियन संप्रदाय का जन्म हुआ। जर्मन ऐतिहासिक संप्रदाय ने आर्थिक इतिहास की सहायता से आर्थिक सच्चाई को जानने का प्रयास किया। प्रारंभिक ऑस्ट्रियन विचारकों ने 1883 में जर्मन संप्रदाय द्वारा विकसित अनुभवाश्रित पद्धति को अपनी आलोचना का केंद्र बनाया। इनका मत था कि आर्थिक ज्ञान इतिहास के अध्ययन से नहीं बल्कि सैद्धांतिक विश्लेषण से उत्पन्न होता है। पद्धति को लेकर उत्पन्न हुआ विवाद दो दशकों से अधिक समय तक बना रहा। ऑस्ट्रियन संप्रदाय के

अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कार को लेकर इस बार भारतीयों की उत्सुकता कुछ ज्यादा थी। संभावित विजेता के रूप में रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन का नाम चर्चा में आ जाने की वजह से इस पर बहुत से लोगों का ध्यान अटका था कि देखें, उन्हें यह पुरस्कार मिलता है या नहीं। दिलचस्प बात यह रही कि जब अमेरिकी अर्थशास्त्री रिचर्ड थेलर का नाम घोषित हो गया और यह स्पष्ट हो गया कि रघुराम राजन को यह पुरस्कार नहीं मिला है, तब फिर बिल्कुल अलग रूप में लेकिन ठेठ भारतीय संदर्भ में यह फैसला चर्चा में आ गया। कुछ लोगों ने इस तथ्य को प्रचारित करना शुरू किया कि नोबेल पुर

 

जब ऐसा कहा गया है कि मानव (Home Economicus) धन पैदा करने के लिए तैयार किया गया एक यंत्र है, तो भारतीय अर्थशास्त्र में बताए जा रहे उस तर्क की जांच करना अत्यंत आवश्यक हो जाता है, जिसके अनुसार भारत की विशाल जनसंख्या गरीबी का एक कारण है। यदि मनुष्य एक मात्र ऐसी प्रजाति है जो धन पैदा कर सकती है, तो इसकी अधिक संख्या गरीबी का कारण कैसे हो सकती है? सच क्या है ?

इलाहाबाद में इन दिनों महाकुंभ मेले की धूम मची है। महाकुंभ में स्नान कर अपने सभी दुखों से निवारण करने की चाह में देशभर के लोग अपने अपने काम-धंधे और रोजगार से छुट्टी लेकर यहां महीने भर डेरा जमाए रहते हैं। अल सुबह से ही संगम के तीरे डेरा डाले रहने के बावजूद त्रिवेणी के संगम स्थल पर मन भरकर डुबकी लगाने की इच्छा कुछेक लोगों को ही प्राप्त होता है। बाकी बस किसी प्रकार दूर किनारे से ही डुबकी लगा अपने को तृप्त मान लेते हैं।

जब ऐसा कहा गया है कि मानव (Home Economicus) धन पैदा करने के लिए तैयार किया गया एक यंत्र है, तो भारतीय अर्थशास्त्र में बताए जा रहे उस तर्क की जांच करना अत्यंत आवश्यक हो जाता है, जिसके अनुसार भारत की विशाल जनसंख्या गरीबी का एक कारण है। यदि मनुष्य एक मात्र ऐसी प्रजाति है जो धन पैदा कर सकती है, तो इसकी अधिक संख्या गरीबी का कारण कैसे हो सकती है? सच क्या है ?

सरकार पर विश्वास करने से अर्थशास्त्र के नियम बदल सकते है यह सोचना टीक वैसा ही है जैसे हम सोचें कि हम भौतिक विज्ञान के नियम बदल सकते हैं।

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