लाभ

अपनी युवावस्था के दिनों में मैंने निचले स्तर तक आर्थिक लाभ के सिद्धांत (थ्योरी ऑफ इकोनॉमिक ट्रिकल डाउन) के बारे में सुना था। इसके मुताबिक अगर अमीर और अधिक अमीर होंगे तो गरीबों को भी इसका लाभ मिलेगा और इस वजह से यह सबके लिए फायदेमंद रहेगा। ऐसा माना जा रहा था कि यह इस बात का भी खुलासा कर देगा, कार्ल मार्क्स के विपरीत, कि यह सच नहीं है कि अमीर और अमीर हो गए, जबकि गरीब और गरीब। इसके विपरीत हुआ यह कि दोनों ही साथ-साथ अमीर हुए। अमेरिका में गरीबी की रेखा 11 हजार डॉलर प्रति वर्ष (पांच लाख रुपए प्रति वर्ष) की चौंकाने वाली ऊंचाई तक पहुंच गई है। इतिहास

Author: 
स्वामीनाथन अय्यर
भारत ने पहले लोकतंत्र को अपनाया और बाद में पूंजीवाद को और यह हमारे बारे में बहुत कुछ समझाता है। भारत 1950 में सर्व मताधिकार और व्यापक मानवाधिकारों के साथ लोकतंत्र बना लेकिन 1991 में जा कर इसने बाजार की ताकतों को ज्यादा छूट दी।
 

वर्ष 2013 की शुरूआत में जीएम फसलों के महत्व को लेकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सार्वजनिक तौर पर अपने विचार देश के सामने रखे थे। कुछ उसी तरह वर्ष 2014 की शुरूआत भी एग्रीबायोटेक उद्योग के लिए खुशनुमा है। हमारे तमाम वैज्ञानिक प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के स्पष्ट वक्तव्य से उत्साहित हैं। अनुवांशिक रूप से परिवर्तित जीएम फसलों के लिए एक सक्षम नीति के लिए अपनी सरकार की प्रतिबद्धता दर्शाते हुए डॉ.

वित्तीय घाटे का विचित्र इलाज सार्वजनिक इकाइयों के शेयर बेचकर सरकार अपना वित्तीय घाटा पूरा करना चाहती है। सरकार की आमदनी कम हो और खर्च ज्यादा हो तो अंतर को वित्तीय घाटा कहा जाता है। वर्तमान में वित्तीय घाटा तेजी से बढ़ रहा है, क्योंकि खाद्य पदार्थो, डीजल एवं फर्टिलाइजर पर दी जा रही सब्सिडी का बोझ बढ़ रहा है। चिदंबरम की सोच है कि सरकारी कंपनियों के शेयर बेचकर इस घाटे की भरपाई कर ली जाए। पेंच है कि पूंजी प्राप्ति का उपयोग चालू खर्च के पोषण के लिए किया जाना है। पूंजी प्राप्ति में जमीन, शेयर, मकान, मशीन आदि की बिक्री आती है। जैसे प्रिंटिंग प्रेस का मालिक या पूर्व में खरीदे गए

मुझे फेविकोल का एक चर्चित विज्ञापन याद आता है जिसमें एक बस को दिखाया गया है कि कैसे बस के अंदर-बाहर और ऊपर तमाम लोग लदे हुए हैं। देश के अद्र्घशहरी तथा ग्रामीण इलाकों में यह दृश्य आम तौर पर देखा जा सकता है। विज्ञापन खत्म होता है और बस के पिछले हिस्से में फेविकोल का बोर्ड नजर आता है। हालांकि यह भारत में प्राय: नजर आने वाला एक विशिष्ट दृश्य है, वहीं यह भारतीयों के 'जुगाड़' के स्वभाव का भी परिचायक है। बस की बात करें तो उसमें जितनी सीट होती हैं, उससे कहीं अधिक लोगों को बस में बिठाया जा सकता है, इसके अलावा ढेर सारे लोग खड़े होकर और बस की छत पर बैठकर भी सफर कर सकते हैं बल्कि करत