B R Shenoy

मैं साथियों के निम्न विषयों पर विचारों से सहमत नहीं हो पा रहा- (i) योजना का आकार, (ii) योजना के लिए वास्तविक संसाधन जुटाने में घाटे का वित्त पोषण, (iii) योजना के प्रारुप पर कुछ योजनाओं और संस्थाओं का प्रभाव। मैं संक्षेप में इन विषयों पर अपने विचार रख रहा हूं-

(I) योजना का आकार

Tags: 

9 मई, 1977 को लिखा बी. आर. शिनॉय का  यह निबंघ “कृषि मूल्य आयोग के मिथ्या तर्क” शीर्षक से यह निबंध छपा था. शिनॉय ने इस सिद्वांत का विरोध इस गलत धारणा को दूर करने के लिए किया कि मजदूरी की दरें बढ़ाने से बढ़ीं खाघान्नों की कीमतों मुद्रास्फीति में इजाफे का कारण बनती है। यह तो मुद्रा के एक हाथ से दूसरे हाथ में जाने का साधारण मामला है जिसके तहत धन किसानों की जेब से होते हुए वितरण प्रणाली के जरिए होते हुए शहरी आबादी की जेब में जाता है।

Tags: 

21 दिसंबर 1961 के इस लेख में चुनाव से ठीक पहले जारी राजनैतिक दलों के घोषणापत्रों की आलोचना की गई है। लेखक के मुताबिक केवल जनसंघ का घोषणा-पत्र ही अर्थव्यवस्था के सरकारीकरण के खिलाफ है। हालांकि इसमें भी आधारभूत मामलों को लेकर स्पष्टता का अभाव ही है। पीएसपी और कांग्रेस जिस प्रगति की बात कर रहे हैं, वह केवल कुछ अतिप्रिय हठों को दूर करके ही हासिल की जा सकती है।

Tags: 

साठ के दशक में ही बी.आर.शिनॉय ने मुद्रास्फीति और सरकारीकरण से होने वाले नुकसान को भांप लिया था। उन्होंने इसके दुष्परिणामों के बारे में भी बार-बार चेतावनी दी थी। 1962 में लिखी गयी उनकी किताब "इंडियन प्लानिंग एंड इकानॉमिक डवलपमेंट" से लिए गए इस अध्याय में उन्होंने एक चेतावनी दी जिस पर 1992 में पहली बार ध्यान दिया गया जब उदारीकरण और वैश्वीकरण की लहर आखिरकार पूरे देश में छा गई थी.

Tags: 

विदेशी मदद से प्रगति को पंख लगने की वर्तमान सोच के विपरीत लेखक ने 21 जनवरी, 1970 के इस अध्ययन में संभावना व्यक्त की है कि भारी-भरकम सहायता का भारी भरकम दुरूपयोग होगा। उन्होंने इस बात पर भी हैरानी जताई है कि आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक के अर्थशास्त्री और सांख्यिकीविद भी इस बात को समझ नहीं सके हैं….

Tags: 

यह लेख उद्योगपति जे.आर.डी. टाटा के एसोसिएटेड चैंबर्स ऑफ कॉमर्स ऐंड इंडस्ट्री में दिए गए भाषण के समर्थन में  12 मई, 1975 को लिखा गया है। इसमें निजी उद्योग के अस्तित्व पर गहराते संकट को लेकर चेतावनी दी गई है…

Tags: