आर्थिक स्वतंत्रता

- फ्रेजर इंस्टिट्यूट व सेंटर फॉर सिविल सोसायटी द्वारा जारी वैश्विक रैंकिंग में 102 से फिसलकर 112वें स्थान पर पहुंचा भारत
- आर्थिक स्वतंत्रता के मामले में भूटान (78), नेपाल (108) व श्रीलंका (111) से पिछड़ा पर चीन (113), बांग्लादेश (121) व पाकिस्तान (133) से रहा आगे
- आर्थिक रूप से स्वतंत्र देशों की सूची में हांगकांग शीर्ष पर, सिंगापुर व न्यूजीलैंड क्रमशः दूसरे और तीसरे पायदान पर

ग्रामीण भारत में जल और जंगल दो सबसे ज्यादा मूल्यवान संसाधन हैं। लेकिन ये संसाधन इन इलाकों में रहने वाले लोगों के हाथ में नहीं हैं। ये राज्य के हाथ में हैं और राज्य ही इनका प्रबंधन करता है। जल और जंगल ग्रामीण समुदायों की बजाए देश की संपत्ति है। ये राष्ट्रीयकृत संसाधन हैं। इस राष्ट्रीयकरण ने ग्रामीणों को उनके बहुमूल्य आर्थिक संसाधन से वंचित कर दिया है। यह एक ऐतिहासिक अन्याय है। 
 
एक महत्वपूर्ण सवाल: क्या आर्थिक स्वतंत्रता से सचमुच लोगों के जीवन स्तर में कोई सुधार आता है? श्रीलंका में आर्थिक स्वतंत्रता ज्यादा है। यहां आर्थिक और सामाजिक माहौल भी अन्य दक्षिण एशियाई देशों की तुलना में बेहतर है। फ्रेजर तालिका में आर्थिक मायने में ज्यादा मुक्त देशों और कम मुक्त देशों की आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों में आश्चर्यजनक अंतर देखने को मिलता है।
 

नई दिल्ली, भारत – सेंटर फार सिविल सोसायटी द्वारा आज यहां जारी  विश्व आर्थिक स्वतंत्रता : वार्षिक रपट 2012 में भारत 144 देशों में 111 वे स्थान पर रहा है। भारत पिछले वर्ष भी 103 वे स्थान पर था। भारत की कुल रेटिंग 6.26 रही इस तरह से वह चीन,बांग्लादेश,तंजानिया और नेपाल से पीछे रहा।

दुनियाभर में विश्व आर्थिक स्वतंत्रता सूचकांक में थोड़ी सी वृद्धि हुई और वह  2010 में 6.83 रही।2009 में वह तीन दशक में सबसे कम स्तर पर यानी 6.79 पर पहुंच गया था।

इस साल 31 जुलाई को विश्वविख्यात नोबल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री मिल्टन फ्रीडमैन की सौंवा जन्मदिन मनाया जाएगा। फ्रीडमैन न केवल आर्थिक वरन सामाजिक और राजनीतिक स्वतंत्रता को अत्यंत महत्व देनेवाले व्यक्ति थे।उनकी सोच  भारत के संदर्भ में कितनी प्रासंगिक है इस पर विचार करने की जरूरत है।