अर्थशास्त्री

वयोवृद्ध किसान नेता व शेतकारी संगठन के संस्थापक शरद जोशी का शनिवार, 12 दिसंबर को निधन हो गया। 2004 से 2010 तक राज्य सभा के सांसद रहे शरद जोशी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे और उनकी पहचान मझे अर्थशास्त्री, ब्यूरोक्रेट व राजनैतिक दल 'स्वतंत्र भारत पक्ष' के संस्थापक के तौर पर भी होती ह

वर्ल्ड बैंक ने सोमवार को इज ऑफ डूइंग बिजनेस यानी व्यापार सुगमता सूचकांक पर रिपोर्ट जारी की़। रिपोर्ट के मुताबिक उद्योग-व्यवसाय के लिहाज से सुगमता वाले राज्यों की सूची में गुजरात शीर्ष पर है, जबकि आंध्र प्रदेश दूसरे स्थान पर, झारखंड तीसरे, तो छत्तीसगढ़ चौथे स्थान पर है़। यानी इन राज्यों में उद्योग-व्यवसाय लगाना-चलाना सबसे आसान है। रिपोर्ट में प बंगाल को 11 वां, तो बिहार को 21 वां स्थान मिला है़ इज ऑफ डूइंग बिजनेस के मामले में दिल्ली, पंजाब, केरल और गोवा फिसड्डी साबित हुए हैं।
 
Author: 
बिबेक देबरॉय
अभी बजट के गोपनीय दस्तावेजों की छपाई शुरू हुई, तो उससे ठीक पहले हलुआ बनाया गया। तस्वीर आई कि वित्त मंत्री कड़ाहे में अलट-पलट कर रहे हैं। आसपास कुछ सहयोगी खड़े हैं और मिठास के मारे मुस्करा रहे हैं।
 

अब जब देश की आर्थिक नैया मझधार में बेदिशा-बेसहारा लुढ़कती साफ दिख रही है, भारत के अर्थशास्त्री और राजनीतिक पंडित किसी और के सिर दोष थोपने की कोशिश में लगे हुए हैं। नैया डुबोने का दोष क्या सोनिया गांधी के सिर मढ़ा जा सकता है या अपने अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री के सिर पर?

इतिहास के सबसे बड़े सबकों में से एक यह है कि केवल औद्योगिक क्रांति ही किसी गरीब राष्ट्र को समृद्ध बना सकती है। हर सफल राष्ट्र मैन्यूफैक्चरिंग से ही समृद्ध हुआ है। केवल इसी तरह कोई राष्ट्र लाखों अकुशल युवाओं को काम दे सकता है, लेकिन दो दशकों के सुधारों के बाद भी भारत अब तक औद्योगिक क्रांति नहीं ला पाया है। इसकी अर्थव्यवस्था अब भी उत्पादन क्षेत्र की बजाय सेवा क्षेत्र पर आधारित है। त्रासदी यह है कि 90 फीसदी भारतीय अच्छी मैन्यूफैक्चरिंग कंपनियों में काम करने की बजाय अनियमित किस्म की अर्थव्यवस्था से जुड़े हैं। हालत यह है कि गणेशजी की प्र

खुदरा व्यापार में 51 फीसदी विदेशी निवेश के मुद्दे पर ‘संसद से सड़क तक’ घमासान छिड़ने और काफी जद्दोजहद के बाद नियम 184 के तहत संसद में बहस और वोटिंग के बाद विदेशी खिलाड़ियों के लिए देश में रिटेल स्टोर खोलने का रास्ता साफ हो गया है। हालांकि विदेशी निवेश के नफा-नुकसान को लेकर लोगों के मन में अब भी संशय बना हुआ है। उधर, वॉलमार्ट द्वारा भारत में विदेशी निवेश के पक्ष में समर्थन हासिल करने के लिए की गई लॉबिंग और इस मद में खर्चे गए सवा सौ करोड़ रुपए की भारी भरकम राशि ने एक नए बहस को हवा दे दी है। एफडीआई के इन्हीं मसलों पर भारत के पहले उदारवादी वे

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