Farmers

कहने को तो हिंदूस्तान एक देश होने के नाते एक यूनिफाइड मार्केट है लेकिन किसानों के लिए सरकार जब चाहे तब एक नई लक्ष्मण रेखा खींच देती है। किसानों को अपनी ही फसल अपने मनपसंद ग्राहक को बेचने की आजादी नहीं रही है। देश के किसी अन्य प्रांत में तो क्या किसानों को अपना उगाया अनाज अपने तहसील या लोकल मंडी में भी प्राइवेट ट्रेडर्स को देने में कड़ी मनाहियां रहीं हैं। कुछ किलो अनाज को भी अपने साथ दूसरे राज्य में ले जाने पर स्मगलिंग जैसे संगीन मामले आरोपित कर किसानों को 30 दिन तक सलाखों के पीछे धकेला जाता रहा है। प्रस्तुत वीडियो डाक्यूमेंट्री में किसानों की आपबीती उन्हीं की जुबानी सुनें

जब बात किसानों से भूमि अधिग्रहण की आती है तो राजनीतिक दलों और उद्योगों के बीच होड़ शुरू हो जाती है। जब किसान की भूमि अधिग्रहीत की जाती है तो वह जीत की स्थिति में कभी नहीं होता है, चाहे वह कांग्रेस शासित राज्य हो या भाजपा शासित। ग्रेटर-नोएडा में भूमि अधिग्रहण का किसानों द्वारा किए जा रहे विरोध का समर्थन करने वाली भाजपा भी इससे कुछ अलग नहीं है।

भारतीय किसान यूनियन के प्रमुख राकेश टिकैत का कहना है कि राजस्थान की कांग्रेस सरकार द्वारा जालौर में किसानों की भूमि अधिग्रहीत करने के एवज में उन्हें मात्र 6.8 पैसा प्रति वर्ग मीटर का मुआवजा दिया जा रहा है।

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क्या खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतों पर अंकुश लगाने के लिए सरकार कागजी वायदों के सिवाय कुछ ठोस उपायों के बारे में सोच सकती है? हमारा मानना है कि अमूल की तर्ज पर किसानों को कोऑपरेटिव और कंपनियों के रूप मे संगठित किया जाना चाहिए और इन एजेंसियों के जरिए व्यवस्थित रीटेल बनाया जाना चाहिए।

देश में कमर तोड़ महंगाई ने सब का जीना मुश्किल कर दिया है. खाने की चीजों के दाम में लगभग 20 प्रतिशत की वृद्धि हो चुकी है और पेट्रोल की बढ़ती कीमतों ने मिल कर आम आदमी का बजट बिगाड़ दिया है. भारत में मुद्रास्फीति यानी महंगाई की दर दिसंबर के अंत में 18.32 फीसदी दर्ज की गई है जो कि  वर्ष 2010 में सबसे अधिक थी.