बलात्कार

राष्ट्रकवि मैथलीशरण गुप्त द्वारा जंग-ए-आजादी के समय लिखी गई कविता “अबला जीवन तेरी हाय यही कहानी, आंचल में है दूध और आंखों में पानी” आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी कि उस दौर में हुआ करती थी। महिलाओं की स्थिति के बाबत कार्यरत अंतर्राष्ट्रीय संस्था ‘वुमन्स रीजनल नेटवर्क’ (डब्लूआरएन) द्वारा प्रस्तुत शोधपत्र तो कम से कम यही प्रदर्शित करता है। संस्था द्वारा अफगानिस्तान, पाकिस्तान और भारत के कॉन्फ्लिक्ट जोन (संघर्ष वाले क्षेत्रों) में निवास करने वाली महिलाओं की स्थिति का सैन्यीकरण, सुरक्षा और भ्रष्टाचार जैसे तीन महत्वपूर्ण तथ्यों के आधार पर आंकलन किया गया।

 

राजनीति, क्रिकेट सहित विभिन्न क्षेत्रों में सुधार के लिए निंदा अभियान चलाने की बजाय ईमानदारी से प्रयास करने की जरूरत। हर मोड़ पर जरूरी सरकारी अनुमति की एवज में हमारे सभी दलों ने जब भी मौका मिला, आगे बढ़ने को आतुर उद्योग जगत की बांहें मरोड़ीं और अपने दलीय तथा निजी कोषों को भरने के लिए धन दुहा है।

दिल्ली गैंगरेप हादसे के बाद समाज के विभिन्न वर्गों द्वारा तमाम तरह की मांगे की जा रही हैं और सुझाव दिए जा रहे हैं। हालांकि उनमे से अधिकांश बेहद बेतुके और बेसिर पैर के भी हैं। मजे की बात यह है कि बेतुके और बेसिर पैर की मांगें और सलाह सभी पक्षों (राजनैतिक दलों, अध्यात्मिक गुरुओं, प्रशासन और प्रदर्शनकारी) की ओर से समान रूप से प्रस्तुत किए जा रहे हैं। कोई लड़कियों को मर्यादा में रहने की बात कर रहा है तो कोई उन्हें सलीकेदार कपड़े पहनने की सलाह दिए जा रहा है। कोई घटना के लिए बलात्कारियों और लड़की दोनों को ही बराबर का दोषी बताते हुए ताली एक हाथ से न बजने की कहावत याद दिला रहा है

देश में इन दिनों बेवजह बात का बतंगड़ बनाने की एक परंपरा सी चल पड़ी है। किसी भी सुझाव, विचार अथवा प्रस्ताव के अच्छे बुरे पहलुओं पर विचार किए बगैर ही बेवजह उस पर विवाद पैदा कर दिया जाता है। मजे की बात यह है कि इस परंपरा का निर्वहन, केवल सत्तापक्ष द्वारा विपक्ष और विपक्ष द्वारा सत्तापक्ष की खिंचाई के लिए ही नहीं बल्की अपने लोगों की भर्त्सना के दौरान भी बखूबी किया जा रहा है। केंद्रीय मानव संसाधन राज्यमंत्री शशि थरूर द्वारा एंटी-रेप लॉ के मद्देनजर एक दिन पूर्व दिए गए सुझाव के संदर्भ में भी इसी परंपरा का निर्वहन देखने को मिल रहा है। स्वयं थरूर की पार्टी कांग्रेस के लोग ही उनके

जो कुछ हो रहा है, भयावह है। लग रहा है जैसे सती-युग लौट आया है। चैनल खबर चला रहे हैं- संसद सदमे में। सदमे में तो हम हैं। स्त्री अब क्या करेगी, कैसे जिएगी, कैसे अपना मुंह सबको दिखाएगी- ये कैसे सवाल हैं? लोग रो रहे हैं, दुखी हैं, और कह रहे हैं अब तन ढकने से क्या, बेचारी का जो था सो तो सब लुट गया। इज्जत सरेआम रौंद डाली गई। अब तो बेचारी तिल-तिल कर घुट-घुट कर मरेगी। यह सब क्या है। यह कैसी सहानुभूति है, जो बलात्कार का शिकार हुई स्त्री को स्वाभाविक जीवन जीता देखना गवारा नही करती।

“नरेला इलाके में घर के बाहर खेल रही 6 साल की बच्ची को बहला फुसलाकर पड़ोसी ने किया बलात्कार। अजमेरी गेट इलाके की 14 वर्षीय छात्रा के साथ अध्यापक द्वारा चार साल से किये जा रहे यौन शोषण मामले का सनसनीखेज खुलासा। सफदरजंग अस्पताल की सुरक्षा व्यवस्था को धता बताते हुए देररात महिला वार्ड में घुसकर गर्भवती महिला के साथ बलात्कार का प्रयास। मुंडका में नाबालिक युवती के साथ पड़ोसी द्वारा बलात्कार। उत्तर पश्चिम जिले के महेंद्र पार्क में रूई मांगने के बहाने सर्वोदय विद्यालय की नौवीं कक्षा की छात्रा के साथ पड़ोसी युवक द्वारा बलात्कार।“