गुरचरण दास

कल्पना कीजिए कि आप ऐसे आदर्शवादी युवा हैं, जिसमें भावी पीढ़ी के बच्चों को प्रेरित करने की महत्वाकांक्षा है। इसलिए आप स्कूल खोलते हैं। आप अपने जैसे ही प्रेरक शिक्षक जुटाते हैं। स्कूल तत्काल सफल हो जाता है और उसे छात्रों, पालकों और समाज का सम्मान प्राप्त होता है। फिर 2010 में एक नया कानून (राइट टू एजुकेशन एक्ट) आता है। इसमें सरकारी और निजी स्कूलों के शिक्षकों में वेतन की समानता की बात है। आप अपने शिक्षकों का वेतन दोगुना कर 25 हजार प्रतिमाह करने पर मजबूर होते हैं। यहां तक कि श्रेष्ठतम निजी स्कूल जैसे दून स्कूल और मेयो को भी वेतन बढ़ाने पड़ते हैं। क

यद्यपि सन् 1991 से भारत में आर्थिक सुधारों की शुभारंभ और मुक्त बाजार के साथ भारतीयों के प्रेम प्रसंग को शुरू हुए दो दशक बीत चुके हैं, इसके बावजूद पूंजीवाद को भारत में अपना मुकाम पाने के लिए अबतक जद्दोजहद करना पड़ रहा है। अधिकांश लोगों की भांति भारतीय भी मानते हैं कि बाजार फलदायक तो है लेकिन नैतिक नहीं है। लेकिन मेरी राय इसके बिल्कुल उलट है। मेरा मानना है कि इंसान अनैतिक होता है और लोकतंत्र के तहत या राजतंत्र के तहत, समाजवादी व्यवस्था हो अथवा पूंजीवादी समाज बुरा व्यवहार वही करता है। बाजार नामक संस्था अपने आप में अत्यंत नैतिक होती है, और

जब भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई का झंडा अन्ना हजारे के हाथों से अरविंद केजरीवाल के पास आया तो इसमें एक नया जोश देखने को मिला। पिछले कुछ हफ्तों में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा, कानून मंत्री सलमान खुर्शीद और भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी के खुलासे सामने आए। भ्रष्टाचार के खिलाफ यह लड़ाई सफल होती है या नहीं, लेकिन यह अपने पीछे एक बड़ी उपलब्धि छोड़ रही है। इसने मध्य वर्ग को जगा दिया है और शशि कुमार की कहानी इसे साबित करती है।

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गुरचरण दास

वॉशिंगटन डीसी में भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु एक सच बात कह गए। उन्होंने वहां उपस्थित अपने श्रोताओं से कहा कि उनकी सरकार की निर्णय क्षमता पंगु हो चुकी है और २०१४ के चुनावों तक किसी तरह के सुधारों की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए। अलबत्ता, बाद में उन्होंने इस बयान का खंडन किया, क्योंकि इससे उन्हीं की सरकार की फजीहत हो रही थी, लेकिन सच्चाई तो यही है कि उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा, जो भारत में पिछले दो सालों से नहीं कहा जा रहा था। वॉशिंगटन में बसु के श्रोता हैरान थे कि भारत जैसा जीवंत लोकतंत्र, जो एक उभरती हुई आर्थिक ताकत है और जिसकी सिविल सोसायटी ऊर्जावान है, की स

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गुरचरण दास

नब्बे के दशक की बात है जब मैं पूर्व भारत में काफी भ्रमण किया करता था। अपनी इन यात्राओं से मैं इस नतीजे पर पहुंच गया था कि भारत जल्द ही आर्थिक तौर पर तरक्की कर लेगा और इतिहास में पहली बार भारतीय हर बात की कमी से जूझने से उपर उठकर एक ऐसे युग में पहुंच जाएंगे जब अधिकांश की जिंदगी आराम की होगी।

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गुरचरण दास