परिचर्चा

संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार घोषणापत्र 1948 के अनुच्छेद 26 शिक्षा से संबंधित है जिसकी तीन धाराएं हैं। पहला, निशुल्क एवं आवश्यक प्राथमिक शिक्षा से संबंधित है तो दूसरा शिक्षा के उद्देश्यों (समझ को बढ़ावा देने, सहनशीलता, सभी राष्ट्रों, जाति व धार्मिक समूहों के साथ मित्रता) की स्थापना करता है। तीसरी धारा अभिभावकों को अपने बच्चों को दिए जाने वाली शिक्षा के प्रकार को चुनने पूर्वाधिकार की बात कहता है। अभिभावकों के चुनने का विचार शिक्षा के अधिकार (आरटीई) एक प्रमुख घटक रहा है, लेकिन भारत में शिक्षा के सुधार को लेकर होने वाली बहसों में शायद ही इस पर कभी चर्चा होती है।  

शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) को लागू हुए आज तीन वर्ष पूरे हो गए। इस मौके पर देश भर में सरकारी व गैर सरकारी स्तर पर बेहतर शिक्षा, स्कूलों व अध्यापकों की गुणवत्ता आदि पर ढेरों बातें हुईं। अधिकांश चर्चाओं परिचर्चाओं का मुख्य केंद्र सरकार द्वारा इस मद में खर्च की जाने वाली धनराशि, सरकारी स्कूलों की खराब स्थिति व स्कूलों में पिछले तीन वर्षों के दौरान हुए दाखिलों की बातें ही रहीं। छात्रों को किस प्रकार के कमरों में पढ़ाया जाए? स्कूल का आकार कम से कम कितने क्षेत्र में फैला होना चाहिए? कक्षा में अधिकतम छात्र कितने होने चाहिए? मिड डे मिल का मेन्यू क्या हो ताकि छात

पूंजीवाद, बाजारवाद और पूर्ण प्रतियोगिता की अवधारणा ही एक ऐसा सिद्धांत है जिसे अपनाकर कोई भी देश एक साथ सामाजिक, आर्थिक व शैक्षणिक समस्याओं सहित सभी समस्याओं से न केवल निजात पा सकता है बल्कि तरक्की और विकास के मार्ग पर भी अग्रसर हो सकता है। देश की तंगहाल आर्थिक स्थिति से निराश जनता और बाजार ने नब्बे की दशक में ऐसे अप्रत्याशित विकास को प्राप्त कर इसकी अनुभूति भी कर चुकी है। लेकिन वर्तमान समय में इरादतन अथवा गैर इरादतन ढंग से बाजार से प्रतियोगिता की स्थिति बनाने की बजाए इसे और हतोत्साहित किया जा रहा है जिसका परिणाम महंगाई, मुद्रा स्फिति आदि जैसी समस्याओं के रूप में हमारे साम

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