रतन टाटा की शानदार विरासत

ratan-tata.jpg

नमक से लेकर सॉफ्टवेयर तक बनाने वाले देश के प्रमुख औद्योगिक घराने टाटा ग्रुप से एक वर्ष के अंदर बदलाव की दूसरी बड़ी खबर आयी है 43 वर्षीय युवा सायरस मिस्त्री की डिप्टी चेयरमैन के पद पर नियुक्ति के रूप में. रतन टाटा द्वारा अध्यक्ष पद छोड़ने और कंपनी की कमान युवा हाथों में देने की 2010 में की गयी पहल के बाद से ही इस पर बहस छिड़ गयी थी. नये अध्यक्ष के चयन के लिए बनी पांच विशेषज्ञों की समिति द्वारा देश-विदेश के सैकड़ों लोगों के साक्षात्कार के बाद अंतिम रूप से सायरस मिस्त्री के नाम पर सहमति बनी.

सायरस युवा, प्रतिभावान और जिम्मेदार होने के साथ-साथ वर्तमान अध्यक्ष रतन टाटा की उम्मीदों पर खरा उतरते रहे हैं. वे 2006 में टाटा ग्रुप के बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर में शामिल होने वाले सबसे युवा पेशेवर थे. कम अनुभव के बाद भी कंपनी के हित में लिये उनके फ़ैसले अहम साबित हुए, जिससे रतन टाटा काफ़ी प्रभावित हुए थे.

उन्होंने अपनी घरेलू कंस्ट्रक्शन कंपनी शापूरजी पल्लोनजी को नया मुकाम दिया है. पिछले दो दशकों में पल्लोनजी का कारोबार 24 फ़ीसदी बढ़ाने का श्रेय सायरस को जाता है. शापूरजी पल्लोनजी ग्रुप की टाटा संस में 18 फ़ीसदी हिस्सेदारी है. टाटा ग्रुप के 142 वर्षो के इतिहास में दूसरी बार ‘टाटा’ उपनाम के दायरे से बाहर का व्यक्ति इसका प्रमुख बनेगा.

पहली बार 1932 में सर नवरोजी सकलतवाला की नियुक्ति इस पद पर हुई थी. हालांकि नये मुखिया के चयन की घोषणा पर मुंबई के व्यापार व उद्योग जगत ने आश्चर्य जताया है. साइरस का चयन उनकी उम्मीदों के अनुसार नहीं है, क्योंकि अधिकतर लोगों का विचार था कि रतन टाटा के सौतेले भाई नोएल को उत्तराधिकारी घोषित किया जा सकता है.

रतन टाटा अपने उत्तराधिकारी के रूप में युवा पेशेवर को आगे लाने के संकेत कई मौकों पर देते रहे हैं. कंपनी को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी पेशेवर के हाथ में सौंपना अच्छा माना जाता है. हालांकि कभी-कभी परिवार के लोग भी कंपनी को नया मुकाम देते रहे हैं, जिसके सबसे बेहतर उदाहरण खुद रतन टाटा हैं. फ़िर भी नियमत किसी कंपनी की बागडोर सबसे बेहतर लोगों के हाथों में सौंपी जानी चाहिए. युवा पेशेवर कंपनी को लंबे समय तक अपनी सेवाएं देते रहते हैं. रतन टाटा भी युवा ही थे, जब उन्होंने यह पद संभाला था. उनके अनुभवों ने टाटा ग्रुप को नया मुकाम दिया.

सायरस के साथ भले ही टाटा उपनाम नहीं जुड़ा है, लेकिन वे अब भी इस परिवार का हिस्सा हैं. एक तो उनकी कंपनी पल्लोनजी की लंबे समय से टाटा संस में हिस्सेदारी है. दूसरा, वे रतन टाटा के सौतेले भाई नोएल टाटा के साले हैं. टाटा परिवार से उनका जुड़ाव काफ़ी समय से रहा है. कंपनी में यह बदलाव का दौर है और माना जा सकता है कि हिस्सेदारी ज्यादा होने के कारण कंपनी में उनकी स्वीकार्यता बढ़ी.

रतन टाटा जानते हैं कि केवल किसी नाम के सहारे सफ़लता नहीं मिल सकती. वे टाटा ग्रुप को पूरी तरह प्रोफ़ेशनल कंपनी के तौर पर उभारना चाहते हैं. इसीलिए उन्होंने सीधे परिवार के किसी सदस्य को टाटा ग्रुप के अध्यक्ष की कुर्सी नहीं सौंपी. सायरस पिछले कई वर्षो से टाटा ग्रुप से जुड़े हैं. उन्हें कंपनी के कामकाज की बेहतर जानकारी है.

किसी बाहरी व्यक्ति को यह जिम्मेदारी सौंपे जाने पर उसे कंपनी का कामकाज समझने में समय लगता. इसके अलावा सायरस एक बेहतर इंसान भी हैं. वे कम बोलते हैं और ठोस फ़ैसले लेते हैं. नैनो कार को साकार करने में सायरस की भूमिका अहम थी. सायरस पारसी समुदाय से आते हैं. इस समुदाय की आबादी बहुत कम है. वे अपने उसूल के पक्के हैं और उन्होंने कई मौकों पर इसका प्रमाण भी दिया है.

अपनी नियुक्ति की घोषणा के बाद दिया उनका बयान कि अगले एक वर्ष तक उप अध्यक्ष के रूप में काम करते हुए रतन टाटा से कामकाज के गुर सीखूंगा, उनके शिष्टाचार और आदर की भावना को दर्शाता है. उन्होंने यह भी कहा कि अब वे अपनी कंपनी शापूरजी पल्लोनजी से कानूनी रूप से अलग हो जायेंगे. जाहिर है, इससे दोनों कंपनियों के हित टकराने का खतरा खत्म हो जायेगा. यह टाटा ग्रुप के भविष्य के लिए अच्छा होगा और इससे यह भी पता चलता है कि सायरस अपनी जिम्मेदारियों के प्रति बेहद गंभीर हैं.

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापार बढ़ाने के लिए बड़े निवेशकों का साथ और बड़ी पूंजी की जरूरत होती है. टाटा समूह इस वक्त बड़ी पूंजी का शिद्दत से इंतजार कर रहा है. इस मकसद से भी आजकल शेयरधारकों को कंपनी के महत्वपूर्ण पदों पर बैठाने का प्रचलन बढ़ रहा है और सायरस मिस्त्री की नियुक्ति  का यह भी एक कारण हो सकता है. बड़े शेयरधारकों के साथ आने से पूंजी जुटाने के कई नये द्वार खुल जाते हैं.

Gurcharan Das-गुरचरन दास
साभार: प्रभात खबर

doordrshita ke liye badhai

doordrshita ke liye badhai