स्वतंत्र पार्टी -उदारवाद की बुलंद आवाज (3)

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दो चुनावों में तारा चमका
तीसरे में  डूब गया

राजनीतिक और आर्थिक स्वतंत्रता के जरिये समृद्ध भारत बनाने की संकल्प प्रगट करके भारतीय राजनीति में एक नई लीक बनानेवाली नवजात स्वतंत्र पार्टी को अपनी स्थापना के ढाई साल के भीतर ही आम चुनाव की भारी चुनौती का सामना करना पड़ा और वह उस चुनौती का सामना करने में कामयाब भी रही। अपनी पहली चुनावी परीक्षा में  लगभग 8.54 प्रतिशत वोट और लोकसभा में अठारह सीटें प्राप्तकर वह देश की तीसरी सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बन गई। उसे सत्तारूढ कांग्रेस और संयुक्त कम्युनिस्ट पार्टी के बाद सबसे ज्यादा सीटें हासिल हुईं । देश के विभिन्न राज्यों की विधानसभाओं की कुल सीटे जीतने के दृष्टि से वह दूसरे नंबर पर रही। गुजरात, बिहार, राजस्थान और उडीसा में वह सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी बनकर उभरी। इस चुनाव में जयपुर की महारानी गायत्री देवी ने राजस्थान से लोकसभा का चुनाव जीतनेवाली पहली महिला होने का गौरव हासिल किया। इसके अलावा उन्होंने सर्वाधिक वोटों से जीतने का विश्व रेकार्ड कायम कर गिनिज बुक आफ वर्ल्ड रेकार्ड में अपना नाम दर्ज कराया। फिर 1967 और 1971 में भी स्वतंत्र पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर इसी सीट से चुनाव जीतकर हैटट्रीक की।

इसके बाद 1967 हुए आम चुनावों में स्वतंत्र पार्टी अपनी चुनावी सफलता के शिखर पर रही। इस चुनाव की स्थितियां सारे विपक्ष के लिेए बहुत अनुकूल थी। 1964 में पंडित जवाहरलाल नेहरू का निधन हो गया था। इससे देश में एक राजनीतिक शून्य पैदा हुआ। उनके बाद उनके उत्तराधिकारी लाल बहादुर शास्त्री भी जल्दी चल बसे। नई प्रधानमत्री इंदिरा गांधी तबतक पार्टी और जनता पर अपनी पकड़ को मजबूत नहीं बना पाईं थीं। जनता का कांग्रेस के शासन से मोहभंग होने लगा था। नतीजतन स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार कई राज्यों में कांग्रेस को बहुत तगड़ी राजनीतिक चुनौती मिल रही थी। सभी विपक्षी दलों की ताकत इस चुनाव में बढ़ी लेकिन स्वतंत्र पार्टी ने 1962 के चुनावों के मुकाबले भारी चुनावी सफलता प्राप्त की और वह लोकसभा में कांग्रेस के बाद दूसरी सबसे बडी राजनीतिक पार्टी बन गई। इन चुनावों में कांग्रेस की सीटों में भारी कमी आई थी। उसे 1962 की 361 सीटों के मुकाबले 284 सीटें ही मिलीं और वोटों के प्रतिशत में काफी गिरावट आई थी वह 44.73 प्रतिशत  से घटकर 40.82 प्रतिशत रह गया। दूसरी तरफ विपक्ष में स्वतंत्र पार्टी पिछले चुनाव की तुलना में 42 सीटें जीतकर सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी बनकर उभरी। उसके बाद भारतीय जनसंघ का नंबर था जो जिसकी सीटें 14 से बढ़कर 35 हो गई थी।

वर्ष 1967 के चुनाव में  भारी सफलता पानेवाली स्वतंत्र  पार्टी के लिए 1971 के चुनाव करारा झटका रहे। ऐसा झटका जिसने बाद के वर्षों में उसके अस्तित्व को ही खत्म कर दिया। दरअसल 1968 में  कांग्रेस का विभाजन हुआ लेकिन इंदिरा गांधी के अगुवाईवाली कांग्रेस प्रिविपर्स की समाप्ति और बैंको के राष्ट्रीयकरण के अपने समाजवादी कार्यक्रम के जरिये जनता को लुभाने में कामयाब रही थी। देश अब इंदिरा गांधी छाप समाजवाद की दिशा में बढ रहा था। 1971 के चुनावों से पहले इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओं का नारा दिया। जिसने विपक्ष के खिलाफ ब्रह्मास्त्र का काम किया और उस समय समाजवाद की हवा कुछ ऐसी बही कि  विपक्ष का सूपड़ा साफ हो गया।

1971 के चुनाव में 44 सीटें जीतकर दूसरे नंबर की पार्टी बनकर उभरनेवाली स्वतंत्र पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा। उसे केवल 8 सीटें पाकर संतोष करना पड़ा। उसे राजस्थान और उडीसा से तीन तीन और गुजरात से दो सीटें मिली। पार्टी के कई दिग्गज बुरी तरह चुनाव हार गए जिनमें एक प्रमुख नाम था उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष और संस्थापक सदस्यों में से एक मीनू मसानी जिनका प्रभावी वक्तत्व संसद में पार्टी और विपक्ष को मजबूत बनाता था।

1971 के चुनावों में करारी हार स्वतंत्र पार्टी के लिए एक ऐसा सदमा थी जिससे वह कभी उबर नहीं पाई। सदमा कितना गंभीर था इसका अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि पार्टी की अपमानजनक पराजय की  नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए पार्टी के अध्यक्ष मीनू मसानी ने केवल अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया वरन सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया। पार्टी के दूसरे बड़े नेता और संस्थापक सदस्य प्रोफेसर एनजी रंगा को तो इस हार ने बुरी तरह तोड़ दिया।। जीवनभर किसानों और आर्थिक राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करनेवाले रंगा तो इस कदर हताशा हो गए कि 16 अगस्त 1972 को फिर कांग्रेस में शामिल हो गए। हालांकि वे किसानों, खेतिहर मजदूरों, हथकरघा कारीगरों और अन्य ग्रामीणो के लिए बाद में भी काम करते रहे लेकिन संघर्ष का पहले जैसा माद्दा उनमें नहीं रह गया था।

वैसे 1971 एक मायने में स्वतंत्र पार्टी के लिए महत्वपूर्ण रहा कि स्वतंत्र पार्टी ने मार्च में झारखंड पार्टी और उत्कल कांग्रेस के साथ मिलकर विश्वनाथ दास के नेतत्व में राज्य में सरकार बनाई। 1971 के चुनावों में करारी शिकस्त खाने के बाद जब मसानी ने सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया और प्रोफेसर रंगा कांग्रेस में चले गए तो पार्टी की कमान पीलू मोदी के हाथों में आई। वे 1972 में स्वतंत्र पार्टी के अध्यक्ष बने और उन्होंने पार्टी की नैय्या पार लगाने की बहुत कोशिश की मगर नाकाम रहे। 1972 में मोदी के अपने गृहराज्य गुजरात में विधानसभा चुनाव हुए जो कभी स्वतंत्र पार्टी का गढ़ हुआ करता था लेकिन वहां पार्टी इतनी बुरी तरह से हारी कि उसे एक सीट भी नसीब नहीं हुई। उसके बाद पार्टी के लोकसभा के आठ सदस्यों में से तीन सदस्य पार्टी छोड़कर इंदिरा कांग्रेस में शामिल हो गए। फिर 1973 में उत्तर  प्रदेश में विधानसभा चुनाव हुए उनमें भी पार्टी को बुरी तरह मुंहकी खानी पड़ी। उसने 112 उम्मीदवार खड़े किए थे लेकिन लगभग सबकी जमानतें जब्त हो गईं। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस केवल 32 प्रतिशत वोट पाकर भी सरकार बनाने में कामयाब रही जबकि विपक्ष 68 प्रतिशत वोट पाकर भी सत्ता से बहुत दूर था। इन लगातार पराजयों ने पीलू मोदी को भी तोड़ दिया उन्होंने 1974 में पार्टी का चौधरी चरणसिंह के नेतृत्ववाले भारतीय क्रांतिदल में विलय कर दिया और इस विलय के बाद जो नई पार्टी बनी उसका नाम था भारतीय लोकदल। पीलू मोदी इस पार्टी के महासचिव बने। बाद में 1977 में भारतीय लोकदल का जनता पार्टी में विलय हो गया। पीलू मोदी 1983 तक यानी जीवन के अंत तक इसी पार्टी में रहे। पीलू मोदी की अगुवाईवाली स्वतंत्र पार्टी ने भले ही भारतीय लोकदल में विलीन हो गई थी लेकिन पार्टी के एक तबके ने पार्टी का स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रखा। 1977 के बाद यह पार्टी भी जनता पार्टी में शामिल हो गई। भारत राजनीति की यह दारुण शोकांतिका थी कि भारतीय राजनीति  में उदारवाद की झंड़ा उठाकर चलनेवाली स्वतंत्र पार्टी का वजूद खत्म हो गया जबकि बाद के समय में यह महसूस किया गया कि उसकी विचारधारा आज भी बहुत प्रासंगिक है जो कुछ अंशों में 1991के बाद हुए आर्थिक सुधारों के रूप में प्रगट भी हुई।

- सतीश पेडणेकर