स्वामीनाथन एस. ए. अय्यर

इस पेज पर स्वामीनाथन एस. ए. अय्यर के लेख दिये गये हैं। ये लेख शीर्ष बिजनेस अखबारों में स्वामीनॉमिक्स कॉलम में प्रकाशित होते हैं।

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अधिक जानकारी के लिये देखें: http://swaminomics.org

भारत में सबसे बड़ा क्रांतिकारी परिवर्तन दुनिया को मात देने वाले कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर का विकास है। भारत की अर्थव्यवस्था चमत्कारिक नहीं है, लेकिन सॉफ्टवेयर एक चमत्कारिक सेक्टर है। एक दशक तक 40 फीसदी प्रतिवर्ष की दर से फल-फूल रहे इस सेक्टर ने पिछले साल निर्यात से आठ अरब डॉलर की कमाई की।

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स्वामीनाथन अय्यर

स्वामीनॉमिक्स के 10 साल पूरे हो गए हैं. जब मैंने एक दशक पहले इस कॉलम की शुरुआत की थी तब मेरे बारे में ज्यादातर यह कहा जाता था कि मैं विद्रोही हूं और बगैर सावधानी बरते परंपरागत समाजवादी विचारों पर निशाना साधते हुए उसकी आलोचना करता हूं. आज मैं यह देखकर चकित हूं कि अब मुझे मुख्यधारा का लेखक समझा जाने लगा है. 10 वर्ष पहले आर्थिक सुधारों को कितना ज्यादा असंभव माना जाता था. लंदन की पत्रिका ‘द इकोनॉमिस्ट’ ने 1991 में अपनी आवरण कथा में भारत को “पिंजरे में बंद शेर” बताते हुए लिखा था कि इसके बाहर आने की कोई संभावना नहीं है.

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स्वामीनाथन अय्यर

इन दिनों कोका कोला और पेप्सी कोला में पेस्टिसाइड्स (कीटनाशक) की उपयुक्त मात्रा को लेकर विवाद चल रहा है. भारतीय स्वामित्व वाले शीतल पेय पदार्थों के साथ ही यहां तक की भारत के दूध और पानी के साथ इनकी तुलना के कोई प्रयास नहीं किए गए हैं.

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अपनी युवावस्था के दिनों में मैंने निचले स्तर तक आर्थिक लाभ के सिद्धांत (थ्योरी ऑफ इकोनॉमिक ट्रिकल डाउन) के बारे में सुना था। इसके मुताबिक अगर अमीर और अधिक अमीर होंगे तो गरीबों को भी इसका लाभ मिलेगा और इस वजह से यह सबके लिए फायदेमंद रहेगा। ऐसा माना जा रहा था कि यह इस बात का भी खुलासा कर देगा, कार्ल मार्क्स के विपरीत, कि यह सच नहीं है कि अमीर और अमीर हो गए, जबकि गरीब और गरीब। इसके विपरीत हुआ यह कि दोनों ही साथ-साथ अमीर हुए। अमेरिका में गरीबी की रेखा 11 हजार डॉलर प्रति वर्ष (पांच लाख रुपए प्रति वर्ष) की चौंकाने वाली ऊंचाई तक पहुंच गई है। इतिहास देखा जाए तो गरीब कभी

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भाजपा शासित भारत जबकि स्वदेशी को अपना रहा है, ब्रिटेन इस सोच से किनारा कर रहा है। ब्रिटेन की उत्पादन क्षमता की जीवंत प्रतीक कंपनी रोल्स रॉयस, जर्मनी की बीएमडल्यू कंपनी को बेच दी गई है। फोक्सवैगन अब और बड़ी बोली लगाने की तैयारी में है। इसके साथ ही पैसेंजर कार निर्माताओं में अब एक भी ब्रिटिश कंपनी बाकी नहीं है। फिर भी ब्रिटेन में स्वदेशी कार के अंत पर शोक जैसी कोई स्थिति नहीं है।

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स्वामीनाथन अय्यर

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