स्वामीनाथन एस. ए. अय्यर

इस पेज पर स्वामीनाथन एस. ए. अय्यर के लेख दिये गये हैं। ये लेख शीर्ष बिजनेस अखबारों में स्वामीनॉमिक्स कॉलम में प्रकाशित होते हैं।

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संयुक्त राष्ट्र की मानव विकास रिपोर्ट 2006 भारत में सामाजिक विकास का निराशाजनक चित्र पेश करती है। भारत 177 देशों की इस सूची में 126वें स्थान पर है। ऐसे में हमें ऐसी किसी भी भविष्यवाणी से बचना चाहिए कि भारत जल्द ही दुनिया की एक आर्थिक महाशक्ति बनने जा रहा है। दमदार सामाजिक विकास के बगैर आर्थिक तरक्की बेमानी साबित होगी।

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औद्योगिकीकरण के कारण लाखों लोगों को अपने मूल स्थान से विस्थापित होना पड़ा और विस्थापन की भीषण नाकामियों का भी उनको सामना करना पड़ा। ताजा मामला टाटा स्टील प्लांट की स्थापना के कारण विस्थापन का विरोध कर रहे कलिंगनगर, उड़ीसा के 13 आदिवासियों की मौत का है। औद्योगिकीकरण बढ़ने के साथ यह समस्या और अधिक गंभीर रूप ले लेगी। हाल ही में 150 विशेष आर्थिक क्षेत्रों (स्पेशल इकोनॉमिक झोन्स या सेज) को मंजूरी दी गई है और जल्द ही यह संख्या दोगुनी हो सकती है। शायद 10 लाख लोगों पर विस्थापन की नौबत आ जाए। हमें न्याय और निष्पक्षता वाली एक नई विस्थापन नीति की जरूरत है। आखिर इस मामले में म

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कई पर्यवेक्षकों, मार्क्सवादियों से लेकर बिल गेट्स तक, इस बात को लेकर चिंतित रहते थे कि हालांकि सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) बहुत ज्यादा फायदे की तो है, लेकिन यह कमाई और पहुंच के लिहाज से ग्रामीणों और शहरियों के बीच के अंतर को और अधिक बढ़ा देगी।

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गरीबी कम करने के लिए ग्रामीण रोजगार योजनाओं का मैं पुरजोर समर्थक रहा हूं। मैंने उनका मूल्य सूखे के दिनों में और ऐसे इलाके के लोगों की पर्चेजिंग पॉवर (क्रय शक्ति) में इजाफे में भी देखा जिनकी रोजी-रोटी को कोई नुकसान हुआ हो। लेकिन फिर अनुभव ने मुझे सिखाया कि ऐसी योजनाओं की गरीबी उन्मूलन के लिए लंबे समय में कुछ खास कीमत नहीं होती। वे सूखे में एक अच्छा तात्कालिक उपाय तो हो सकते हैं लेकिन गरीबी को स्थायी तौर पर हटाने में कारगर नहीं हो सकतीं। ऐसा तो केवल उत्पादकता बढ़ाकर ही किया जा सकता है ताकि वास्तविक मजदूरी और आय बढ़े। इसलिए मैं रोजगार गारंटी कानून (ईजीए) को लेकर उत्स

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सबसे होशियार राजनीतिज्ञों में भी दूरगामी परिणामों को सोचने की ताकत का अभाव मुझे चौंका देता है। अनेक मुख्यमंत्रियों ने चुनावी परिणामों से यह निष्कर्ष निकाल लिया है कि यह मतदाता की मुफ्त बिजली की मांग से प्रभावित थे। आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु ने तो किसानों के लिए अपनी बिजली दरें सिफर कर दी हैं तो महाराष्ट्र ने इसे 50 पैसे से घटाकर 25 पैसे कर दिया है।

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आजादी के आंदोलन के दौरान हमारे नेताओं ने भारत की गरीबी के लिए औपनिवेशिक शोषण को खूब कोसा था। ब्रिटिश लोगों के आने से पहले भारत की गिनती दुनिया की शीर्ष उद्योग और कारोबारी महाशक्तियों में की जाती थी। जब ब्रिटिश गए तो भारत गरीब होकर, तुलनात्मक रूप से और भी पिछड़ गया था। भारतीयों ने इसका दोष ब्रिटेन के माथे मढ़ दिया था और इस बात को लेकर वे आश्वस्त थे कि औपनिवेशिक सत्ता खत्म होने के बाद भारत फिर अमीर बन जाएगा।

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गरीबी को खत्म करने के अभी तक सुने गए प्रस्तावों में सबसे आसान एक एनजीओ में काम करने वाले एक दोस्त की ओर से आया। क्यों न हम न्यूनतम वेतन को इतना बढ़ा दें कि सभी लोग गरीबी की रेखा से ऊपर आ जाएं? यह कितना आसान लगता है मनोहारी और दर्दरहित। अफसोस, यह नाकाम रहेगा क्योंकि हमारे यहां एक ऐसा कानून है जिसका परिणाम अनपेक्षित है।

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स्वामीनाथन अय्यर

भारत में बदनाम लेकिन काबुल में कारगर बैंकिंग की एक पुरानी पद्धति के बारे में मैं यह स्तंभ अफगानिस्तान से लिख रहा हूं। भारत में हम हवाला को धन के आपराधिक लेन-देन से जोड़कर देखते हैं। हमारी सोच है कि मुद्रा व्यापार से जुड़े कारोबारी इसका इस्तेमाल देश से विदेशी मुद्रा की तस्करी (स्मगलिंग) के लिए करते हैं।

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स्वामीनाथन अय्यर

हर कोई इस बात को मानता है कि जिंदगी के मायने पैसे से ज्यादा कुछ और भी है। फिर भी हम जीवन स्तर को पैसों के तराजू से ही तौलते हैं। क्यों? क्योंकि गैर-मौद्रिक (नॉन-मॉनिटेरी) चीजों को मापना जरूरी भले ही हो, लेकिन आसान कतई नहीं है। आप सांप्रदायिक शांति की कीमत को कैसे मापेंगे? या फिर लोकतंत्र की?

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स्वामीनाथन अय्यर

भारत में सबसे बड़ा क्रांतिकारी परिवर्तन दुनिया को मात देने वाले कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर का विकास है। भारत की अर्थव्यवस्था चमत्कारिक नहीं है, लेकिन सॉफ्टवेयर एक चमत्कारिक सेक्टर है। एक दशक तक 40 फीसदी प्रतिवर्ष की दर से फल-फूल रहे इस सेक्टर ने पिछले साल निर्यात से आठ अरब डॉलर की कमाई की।

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