सब्सिडी की सौगात का सच

“माल-ए-मुफ्त, दिल–ए-बेरहम, फिर क्या तुम, क्या हम?” हमारी एक आदत सी हो गई है। हम हर चीज की अपेक्षा सरकार या सरकारी व्य वस्था  से करते हैं। यह ठीक है कि हमारे दैनिक जीवन में सरकार का दखल बहुत अधिक है बावजूद इसके हम उस पर कुछ ज्य़ादा ही निर्भर हो जाते हैं। एक कहावत है कि किसी समाज को पंगु बनाना है तो उसे कर्ज या फिर सब्सिडी की आदत डाल दो, वो इससे आगे कभी सोच ही नहीं पाएगा। देश की राजनीति में ये कथन बहुत मौजूं है।  

सरकार देश के कमजोर तबके के लोगों के लिए कुछ मूलभूत जरूरत की चीजों को खरीदने के लिए आर्थिक सहायता देती है जिसे सब्सिडी कहा जाता है। लेकिन हकीकत ये है कि सब्सिडी को जिस तबके के लिए फायदेमंद बताया जाता है, वो या तो उस तक पहुंचती नहीं है या फिर उस वर्ग विशेष का भला नहीं कर पाती। इस तथ्य को पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने सार्वजनिक रूप से दशकों पहले स्वीकार किया था कि सरकार की मदद का महज 15 फीसदी हिस्सा ही जरूरतमंदों तक पहुंच पाता है। यानी इससे बिचौलिये चांदी काटते हैं। इसी को देखते हुए सरकार आधार के जरिये डायरेक्ट बेनिफीट ट्रांसफर (डीबीटी) स्कीम लेकर आई जिससे सब्सिडी की राशि सीधे जरूरतमंद के खाते में पहुंच जाती है। 

वैसे तो सरकार कई तरह की सब्सिडी देती है, लेकिन इसे मोटे तौर पर तीन वर्गो में बांटा जा सकता हैः खाद्य, एलपीजी और फर्टिलाइजर  पर सब्सिडी। इस साल के कुल बजट का तीन फीसदी हिस्सा यानि दो लाख चालीस हजार करोड़ रुपये सब्सिडी के मद में रखे गए हैं जिन्हें खाद्य, पेट्रोलियम और फर्टिलाइजर के उपभोक्ताओं को दिया जाना है। इसमें एक लाख 45 हजार करोड़ रुपये खाद्य सब्सिडी के मद में है जिसमें राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तहत देश के 80 करोड़ लोगों को कम कीमत पर अनाज मुहैया कराना है। पच्चीस हजार करोड़ रुपये पेट्रोलियम सब्सिडी के मद में है जिसमें 16 हजार करोड़ रुपये एलपीजी और बाकी कैरोसीन तेल की सब्सिडी के मद मे हैं। जबकि सत्तर हजार करोड़ रुपये फर्टिलाइजर यानि यूरिया की सस्ती खरीद के मद में हैं।   

भले ही ये राशि बजट का महज तीन फीसदी हो लेकिन ये राशि खासी बड़ी है। दो लाख चालीस हजार करोड़ रुपये तो कई बड़े राज्यों का सालाना बजट है। इतनी राशि में कई राज्यों को साल भर का खर्चा चलाया जा सकता है। वास्तविकता ये है कि इस राशि का एक बहुत छोटा हिस्सा जरूरतमंदों तक पहुंच पाता है। उसे भी पाने के लिए उन्हें जी-तोड़ भागदौड़ करनी पड़ती है।
2013 में यूपीए सरकार ने अपने कार्यकाल के आखिरी दिनों में एलपीजी कनेक्शन को आधार से जोड़ने की स्कीम शुरू की। इस दौरान करीब साढे तीन करोड़ गैस कनेक्शन ऐसे निकले जो फर्जी थे या फिर एक घर में कई कनेक्शन थे। इसी दौरान कुछ नाम ऐसे भी सामने आए जिसमें जिसमें एक व्यक्ति के नाम पर दो सौ एलपीजी कनेक्शन थे यानि सरकारी पैसे की पूरी तरह बर्बादी हो रही थी। 2014 में मोदी सरकार ने एलपीजी कनेक्शन को आधार से जोड़ने की योजना को जारी रखा और इससे करीब 24 हजार करोड़ रुपये सरकार ने एक साल में सब्सिडी के मद में बचाए। ये एक अच्छी पहल थी। इसके बाद सरकार ने स्वैच्छिक रूप से एलपीजी सब्सिडी छोड़ने वाले लोगो के लिए गिव अप मुहिम चलाई जिसके तहत एक करोड़ से ज्यादा लोगों ने अपनी सब्सिडी छोड़ दी। बचत के इस पैसे से सरकार ने उज्जवला योजना शुरू की जिसमें देश के दूरदराज इलाकों में रहने वाले गरीबों को ढाई करोड़ से ज्यादा एलपीजी के कनेक्शन मुहैया कराए जा रहे हैं। 

हमारी मानसिकता में सब्सिडी इतनी रच बस गई है इसे दिल्ली के उदाहरण से समझा जा सकता है। दिल्ली सरकार का इस साल का बजट करीब 48 हजार करोड़ रुपये का है। दिल्ली सरकार बिजली की सब्सिडी में हर साल औसतन एक हजार छह सौ करोड़ रुपये खर्च कर रही है। इससे लोग मस्त हैं और सरकार की वाहवाही करने का कोई भी मौका नहीं छोड़ते। जनता का पैसा जनता को ही लौटाया जा रहा है। गौर करने वाली बात ये है कि इस पैसे को अगर स्कूल या अस्पताल बनाने में खर्च किया जाता तो तब इसकी सार्थकता कुछ ज्यादा होती।
एलपीजी पर सब्सिडी खत्म करने की बात जब पिछले दिनों अचानक उठी तो सड़क से लेकर संसद तक कोहराम मच गया। सरकार ने कहा कि सब्सिडी वाले सिलेंडर में प्रतिमाह चार रुपये बढ़ा कर धीरे धीरे वो मार्च 2018 तक सब्सिडी खत्म कर देगी। हकीकत ये है कि आज सब्सिडी वाले सिलेंडर और बिना सब्सिडी वाले सिलेंडर के दाम में अंतर सौ रुपये से भी कम है। इतने में कोई भी सिलेंडर खरीदने का माद्दा रखता है फिर सरकार की ओर क्यों देखना?

जब समाज इस लायक हो जाता है कि अपने खर्चे खुद उठा सके तो उसे सरकार की ओर नहीं देखना चाहिए। सरकार का काम लोगों के घर चलाना नहीं बल्कि उन्हें सुरक्षा, न्याय और सुशासन प्रदान करना है। आजादी के 72 साल बाद भी अगर हमारी सरकार को हमारा पेट पालने के लिए सब्सिडी रूपी मदद देनी पड़ रही है तो हमें अपनी नीतियों का एक बार अवलोकन करना चाहिए कि कमी कहां रह गई है।

एक मिसाल देता हूं। शिक्षा का अधिकार कानून के तहत सरकार 14 वर्ष तक की आयु वाले उन छात्रों के स्कूल की फीस खुद चुकाने का आश्वासन देती है जो गरीब हैं और प्राइवेट स्कूलों में पढ़ते हैं। इसके लिए छात्र के परिवार की कुल वार्षिक आय एक लाख से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। एक साल पहले तक, जबतक की इनकम सर्टिफिकेट बनवाने के लिए आधार कार्ड को अनिवार्य नहीं किया गया था, लोगों ने फर्जी तरीके से खूब इनकम सर्टिफिकेट बनवाए। इनकम सर्टिफिकेट को छात्र की फीस की रसीद के साथ शिक्षा विभाग के कार्यालय में जमा कराना होता था। छात्र की फीस कुछ महीने बाद बैंक खाते में लौट आती थी। जो लोग शिक्षा विभाग के दफ्तर में इन फॉर्मों को जमा कराने पहुंचते थे उनमें से कई महंगी कारों में होते थे तो कई के बदन पर सोने के आभूषण जैसे चेन और अंगूठियों की भरमार होती थी। इस धंधे में फॉर्म जमा करने वाले क्लर्क से लेकर शिक्षा अधिकारी तक का कमीशन तय था और चपत लगती थी सरकार को। ऐसे में जिस उद्देश्य को लेकर ये योजना बनाई गई थी वो कभी पूरा ही नही हुआ और पैसा असल जरूरतमंदों तक बहुत कम पहुंच पाया । 

हाल में रेल मंत्रालय ने एक नया प्रयोग शुरू किया है। वो रेल टिकट पर यात्री किराये के साथ उस राशि को भी छापता है जो कि किराये की वास्तविक लागत है। टिकट पर लिखा होते है कि यात्री किराया इतना है लेकिन टिकट की असल कीमत इतनी है और सरकार इस टिकट पर इतनी सब्सिडी दे रहे है। लोगो को जागरूक करने और सब्सिडी को खत्म करने के लिए ये अच्छा प्रयोग है। इसके लिए टिकट पर छापा जा रहा है कि इसकी वास्तविक कीमत क्या है। 

फर्टिलाइजर सब्सिडी पर भी सरकार प्रत्येक साल औसतन सत्तर हजार करोड़ की बड़ी राशि खर्च कर रही है लेकिन इससे किसानों की बजाय फर्टिलाइजर कंपनियों के वारे न्यारे ज्यादा होते हैं। देश में यूरिया की कीमतें पड़ोसी देशों के मुकाबले कम हैं लिहाजा पड़ोसी देशों को इसकी तस्करी होने लगी। फर्टिलाइजर एसोसिएशन ऑफ इंडिया के मुताबिक देश में बिकने वाले यूरिया का करीब बीस फीसदी हिस्सा तस्करी के जरिए नेपाल, बांग्लादेश पहुंच जाता है। इसकी सीधी चपत हमारी सरकार को लगती है। इसी को देखते हुए सरकार ने अब यूरिया को नियंत्रणमुक्त कर इसकी सब्सिडी को किसानों के खाते में डालने का फैसला किया है। धीरे धीरे यहां भी किसानों को आत्मनिर्भर बना सरकार सब्सिडी खत्म करने की ओर बढ़ रही है।

सरकार सब्सिडी खत्म करने की दिशा में सही कदम उठा रही है लेकिन कुछ मूलभूत बातों का ध्यान रखना जरूरी है। ऐसे गरीब लोग जो अनाज नहीं खरीद सकते हैं उन्हें ही खाद्य सब्सिडी मिलनी चाहिए लेकिन उसे लुभावने चुनावी नारे के रूप में प्रचारित करने पर रोक लगनी चाहिए। ऐसी कानूनी व्यवस्था की जानी चाहिए जे किसी पार्टी विशेष के सत्ता में आने और जाने से प्रभावित ना हो। इसमें भी आधार कार्ड के जरिये सीधे राशि जरूरतमंदों के बैंक खाते में पहुंचाने की व्यवस्था होनी चाहिए ताकि जितनी जरूरत उन्हें अनाज की है उतना वो खरीद सके। इससे अनाज की बर्बादी तो रुकेगी ही बीच की कमीशनखोरी पर भी लगाम लगेगी।

सरकार का प्रयास यह भी होना चाहिए कि योजना का लाभ वास्तविक लाभार्थी को ही प्राप्त हो सके। इसे एक और उदाहरण से समझा जा सकता है; सरकार गरीब किसानों के नाम डीजल पर भारी भरकम सब्सिडी प्रदान करती है, लेकिन इस सब्सिडी का सबसे अधिक फायदा बड़ी बड़ी कारों में घूमने वाले सक्षम लोग उठाते हैं। इससे एक तरफ जहां सरकार को नुकसान उठाना पड़ता है और पर्यावरण प्रदूषित होता है वहीं आवश्यकता के समय वास्तविक लाभार्थियों को इसकी सुविधा नहीं मिल पाती है। यदि डीजल पम्पिंग सेट की सहायता से सिंचाई करने वाले किसानों की पहचान (आधार संख्या की सहायता से) कर सब्सिडी की राशि सीधे उनके खाते तक पहुंचा दी जाए और बाजार में डीजल गैर सब्सिडाइज्ड रेट पर उपलब्ध करायी जाए तो हजारों करोड़ रूपए की बचत की जा सकती है। हालांकि ऐसी स्थिति में आदर्श तरीका यह होता है कि सरकार स्वयं डीज़ल बेचने की बजाए निजी कंपनियों को ऐसा करने के लिए माहौल तैयार करे और स्वस्थ प्रतिस्पर्धा की स्थिति पैदा करे ताकि उपभोक्ताओं को कम से कम कीमत पर सेवा प्राप्त हो सके।

- नवीन पाल (लेखक वरिष्ठ टीवी पत्रकार हैं)

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