रेहड़ी-पटरी विक्रेताओं की सुध किसे

समाज की बसावट और बनावट का स्वरूप कितना भी योजनाबद्ध क्यों न हो उसे अपनी दैनिक जरूरतों की पूर्ति के लिए एक अनियोजित ढंग से विकसित वातावरण की जरुरत होती ही है। फुटपाथ पर लगने वाले छोटे-बड़े ठेले, खोमचे व अस्थायी दुकाने इसी का उदाहरण हैं। हर सोसाइटी, हर मोहल्ले एवं कालोनी के आस-पास के एक फुटपाथ का बाजार स्वत: विकसित हो जाता है। इस बाजार के स्वत: विकसित होने के पीछे दो मूल वजहें हैं जो कारक होती हैं। पहली वजह, वहां रहने वाले लोगों की दैनिक जरूरतों की पूर्ति एवं दूसरी वजह उन जरूरतों की पूर्ति की वजह से रोजगार सृजन के स्थानीय अवसरों की उपलब्धता। फुटपाथ का बाजार स्थानीय समाज की जरूरतों को पूरा भी करता है और उसी समाज के कुछ लोगों को उसी जगह पर रोजगार के अवसर भी देता है।

यह सबकुछ परस्पर सहमति और समझदारी से चलता है ठीक वैसे ही जैसे किसी गली में सब्जी का ठेला लेकर जो-जोर से आवाज देने के बावजूद कोई व्यक्ति इससे खुद को बहुत ज्यादा डिस्टर्ब नहीं महसूस करता। लेकिन शहरी क्षेत्रों में फुटपाथ का कारोबार बेहद मुश्किल काम हो गया है। फुटपाथ पर लगने वाले बाजारों से उपजे चंद समस्याओं को व्यवस्थित करने हेतु निर्धारित कुछ कानूनों की आड़ में गैर-कानूनी हथकंडों से ठेले-खोमचे वालों को स्थानीय पुलिस, प्रशासन के लोगों द्वारा परेशान किया जाता है। हम आए दिन देखते हैं कि आपके आसपास के फुटपाथ बाजार में कई बार कुछ प्राधिकरणों, निगमों के प्रशासन की गश्त लगती है और ठेले वाले अफरा-तफरी में भागते बचते नजर आते हैं। कई बार तो उन्हें अपने सामान और निवेश का नुकसान भी करना पड़ता है।

हालांकि गश्त की यह रवायत गैर-कानूनी ढंग से लगे दुकानों को बंद कराने के लिए होती है, यह सैद्धांतिक पक्ष है। इसका व्यवहारिक पक्ष कुछ और है। दरअसल उन दुकानदारों से स्थानीय पुलिस एवं प्रशासन के लोग थड़ी-ठेले-रेहड़ी लगाने की एवज में रिश्वत वसूलते हैं, मुफ्त की खरीदारी करते हैं। एक दिन डंडे का जोर दिखाकर फिर कई दिनों तक अवैध वसूली काम काम चलता है। ऐसा इसलिए कहना पड़ रहा है क्योंकि जिस फुटपाथ के बाजार पर गश्त के दौरान दुकाने हटाई जाती हैं वहां फिर अगले दिन स्थानीय पुलिस वालों को रिश्वत देकर दुकानें लगी हुई नजर आती हैं। अर्थात, फुटपाथ विकेताओं के लिए बने क़ानून का दुरुपयोग महज दुकानदारों को लूटने के लिए किया जाता है। इसका नुकसान दुकानदार को उठाना पड़ता है, जिसकी भरपाई वह ग्राहकों से कीमतों को बढ़ाकर लेता है। हालांकि 2014 में इस संबंध में क़ानून लाया गया जिसके तहत तमाम प्रावधान किए गए। लेकिन वो कानून भी सैद्धांतिक बनकर रह गए और तमाम जगहों पर पूरी तरह से उनपर क्रियान्वयन भी नहीं हो सका है। 

अगर बात पथ-विक्रेता (आजीविका का संरक्षण और पथ विक्रय का विनियमन अधिनियम 2014) के प्रावधानों पर नजर डालें तो तमाम ऐसे प्रावधान नजर आएंगे जिनका पालन खुद प्रशासन द्वारा नहीं किया जाता है। इस क़ानून के तहत एक प्रावधान है कि एक पथ-विक्रेता को तब तक उसके स्थान से हटाया नहीं जा सकता, जब तक टाउन वेंडिंग कमेटी अपने क्षेत्र के मौजूदा पथ विक्रेताओं का सर्वेक्षण पूरा ना कर ले और सभी पथ विक्रेताओं को विक्रय प्रमाण पत्र/अनुज्ञा पत्र ज़ारी ना कर दे। इसके लिए किसी क्षेत्र विशेष में बैठने वाले पथ विक्रेताओं का सर्वे करना और इन सब के लिए टाउन वेंडिंग कमेटी का गठन करना भी आवश्यक है। लेकिन इसका अनुपालन कितना हो रहा है इसबात को इसी से समझा जा सकता है कि दिल्ली में अभी तक सर्वे भी नहीं हो सका है। जबकि दिल्ली में आए दिन फुटपाथ विक्रेताओं की दुकानों को प्रशासन द्वारा हटाया और गिराया जाता है।

इसी कानून के तहत एक दूसरा प्रावधान यह भी है कि अगर किसी क्षेत्र को नो-वेंडिंग जोन के रूप में घोषित किया जाता है, तो वहां के फुटपाथ-विक्रेताओं को दूसरी जगह आवंटित अवश्य की जायेगी। लेकिन इसका अनुपालन भी नहीं हो रहा है। प्रशासन महज फुटपाथ पर लगी दुकानों को तोड़ देने, हटा देने और नहीं तोड़ने के एवज में रिश्वत ले लेने तक को ही अपना काम समझ रहा है। किसी भी फुटपाथ विक्रेता को हटाने के लिए 30 दिन की पूर्व सूचना दिए जाने का भी प्रावधान है। लेकिन इस प्रावधान को भी व्यवहारिक तौर पर लागू नहीं किया जा सका है, ऐसा आए दिन दिख जाता है। ऐसे में बड़ा सवाल यह उठता है कि आखिर इस कानून से किसे लाभ और किसे नुकसान हो रहा है? इस कानूनों को व्यवहारिक तौर पर लागू कराने में तो शासन सफल नहीं लेकिन उसके मुलाजिम इस कानून की आड़ में फुटपाथ विक्रेताओं से उगाही जरुर कर रहे हैं। 

फुटपाथ पर लगे बाजार और फुटपाथ विक्रेता क़ानून को अगर समझने की कोशिश करते हैं तो ऐसा लगता है कि मानो इस क़ानून को फुटपाथ विक्रेताओं को कानूनी सुरक्षा देने की बजाय उन्हें कानूनी रूप से जटिलताओं में घेरने की कोशिश की गयी हो। आश्चर्य है कि प्रशासन सर्वे करा पाने में जहाँ सक्षम नहीं हो सका हैं वहां भी इस क़ानून का ठीकरा फुटपाथ विक्रेताओं के सर ही फोड़ता नजर आ रहा है। हालांकि गलत ढंग से फुटपाथ विक्रेताओं को परेशान करने वाले अधिकारियों अथवा प्रशासन से जुड़े व्यक्तियों के खिलाफ शिकायत का प्रावधान भी कानूनी रूप से है। लेकिन एक फुटपाथ विक्रेता के लिए पुलिस में जाकर यह शिकायत करना कि पुलिस उसे परेशान कर रही है, बेहद मुश्किल और जोखिम भरा काम है। ऐसी स्थिति में वह शिकायत की बजाय रिश्वत का सरल रास्ता अख्तियार करना उचित समझता है। पारदर्शी ढंग से क़ानून लागू नहीं हो पाने की वजह से फुटपाथ कारोबार से जुड़े हाशिये के लोगों का रोज कितना नुकसान होता है, इसका ठीक-ठाक आंकलन करना मुश्किल है। लेकिन इतना तो तय है कि भारत में फुटपाथ विक्रेताओं के लिए दुकान लगाना एक मुश्किल काम बनता जा रहा है।

 

- शिवानन्द द्विवेदी
लेखक डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन में रिसर्च फैलो हैं एवं नैशनलिस्ट ऑनलाइन डॉट कॉम के संपादक हैं.

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