ताकि कम हो सके अदालतों का बोझ

डेनमार्क की पहचान आमतौर पर यूरोप के खूबसूरत देश के तौर पर हैं लेकिन यहां की एक खासियत एक और है जिसे कम ही लोग जानते हैं। यहां दुनिया में सबसे तेजी से अदालती कार्रवाई पूरी होती है। डेनमार्क ही नहीं उसके पड़ोसी देश नॉर्वे और फिनलैंड की गिनती भी ऐसे ही देशों में होती है जहां तेजी से मुकदमों का निपटारा होता है।

फोर्ब्स की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया का सबसे बेहतरीन न्यायिक सिस्टम डेनमार्क का है जहां एक समय सीमा में केसों का निपटारा कर दिया जाता है। दूसरा नंबर नॉर्वे का है। नॉर्वे की सरकार प्रत्येक सूचना को नागरिकों के साथ साझा करती है। अपराध ना के बराबर है जिससे कोर्टों में केसों की संख्या ज्यादा नही हैं। इस सूची में स्वीडन तीसरे, फिनलैंड चौथे, नीदरलैंड पांचवें, न्यूजीलैंड छठे, ऑस्ट्रिया सातवें, ऑस्ट्रेलिया आठवें और जर्मनी और सिंगापुर क्रमश नौंवे और दसवें नंबर पर हैं। हांलाकि ये सभी देश छोटे हैं और यहां जनसंख्या का दवाब काफी कम है। जैसे जैसे इन मुल्कों की जनसख्या बढ रही है उसी अनुपात में अदालतें और जज बढ़ रहे हैं

इसके उलट 1950 में जब सुप्रीम कोर्ट की शुरुआत हुई तब उसमें आठ जज थे। उस समय 1215 मामले थे जिन पर सुनवाई चल रही थी। इस तरह एक जज के पास करीब 150 केस थे। 1960 के दशक में सुप्रीम कोर्ट के जजों की संख्या आठ से बढ़कर चौदह हो गई तो केसों की गिनती भी तीन हजार 247 तक पहुंच गई। 1977 में जजों की संख्या को बढ़ाकर 18 कर दिया गया तो लंबित मामले भी बढ़कर 14 हजार 501 हो गए। 1986 में सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या 26 कर दी गई वहीं मामले बढ़कर 27 हजार 881 हो गए। 2009 में देश की सर्वोच्च अदालत में जज 26 से बढ़कर 31 हो गए तो केसों की संख्या 77 हजार को पार कर गई। मौजूदा समय में सुप्रीम कोर्ट में 31 जज हैं जिन्हें 81 हजार से ज्यादा मामलों की सुनवाई करनी है।

देश के मुख्य न्यायधीश तीर्थ सिंह ठाकुर न्यायपालिका पर बढ़ते काम के बोझ की बात कई बार कह चुके हैं लेकिन सरकार इस पर अपनी गति से ही काम कर रही है। इस साल स्वतंत्रता दिवस पर लालकिले की प्राचीर से जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश को संबोधित किया तब भी उन्होंने न्यायपालिका के लिए दो शब्द नहीं कहे। चीफ जस्टिस ठाकुर ने कहा भी कि भाषण अच्छा था लेकिन न्यायपालिका के लिए कोई बात नहीं थी। इससे पहले भी चीफ जस्टिस देश में जजों की कमी के मुद्दे पर मुख्यमंत्रियों और न्यायधीशों के सम्मेलन में प्रधानमंत्री के सामने भावुक भी हो चुके हैं।

कहा जा रहा है कि आबादी के हिसाब से जजों की संख्या कम है। 1987 में विधि आयोग ने 10 लाख की आबादी पर 50 जजों की अनुशंसा की है जबकि वास्तविकता में दस लाख लोगों पर एक जज है। अमेरिका में ये अनुपात सात गुना कम है। देश में जजों की कमी के कारण नतीजा ये है कि सालों तक केस लटके रहते हैं। कहा जाता है कि न्याय में देरी न्याय ना मिलने के बराबर ही है। आबादी के हिसाब से देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद हाईकोर्ट में ही दस लाख से ज्यादा केस पैंडिंग हैं। देश के कुल 24 हाईकोर्टो में लंबित केसों की संख्या दो करोड़ को पार कर गई है।

अदालतों मे बढ़ते केसों के कारण जजों के पास मुकदमा सुनने के लिए महज दो से पांच मिनट का ही वक्त होता है। एक जज के पास हजार से ज्यादा मुकदमों के कारण सुनवाई का समय मिनटों में सीमित कर दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट में हर एक केस में जज औसतन पांच मिनट देते हैं वहीं हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान ये अवधि ढाई मिनट तक सिमट जाती है जबकि प्रत्येक केस में सुनवाई की औसत अधिकतम समय सीमा पन्द्रह मिनट है। यही वजह है कि ज्यादातर केसों में अगली तारीख मिल जाती है जिससे इंसाफ में देरी होती है। दुनिया में सबसे ज्यादा लंबित मामलों का बैकल़ॉग हमारे पास है। इसकी जो वजह बताई जाती है उसमें एक है जजों की कमी लेकिन क्या इसके लिए केवल एक वजह ही जिम्मेदार है?

थिंकटैंक सेंटर फॉर सिविल सोसायटी के एक जनहति न्यायिक पहल आई-जस्टिस ने दिल्ली की अदालतों में न्यायाधीशों की उपस्थिति से संबंधित एक अध्ययन कराया और एक रिपोर्ट तैयार की है। रिपोर्ट में यह बताया गया है कि अदालतों में जजों की उपस्थिति, भोजन विश्राम और विभिन्न कार्यों के लिए समय के निर्धारण में एकरूपता देखने को नहीं मिलती है। रिपोर्ट में जजों के द्वारा औसतन तीन से साढ़ें तीन घंटे कोर्ट रूम में बिताने जबकि न्यूनतम डेढ़ घंटे की उपस्थिति का भी वर्णन है। अधिवक्ता प्रशांत नारंग कहते हैं कि अध्ययन में कई जजों को निर्धारित घंटों से काफी कम समय तक मामलों की सुनवाई करते पाया गया। हालांकि वे यह भी कहते हैं कि जज बाकी समय अपने चेम्बर में किसी केस की स्टडी में लगे थे अथवा वहां से चले गए थे यह बात स्पष्ट रूप से नहीं कही जा सकती। इस प्रकार, यह कहा जा सकता है कि यदि न्यायाधीशों के कार्य घंटों को लेकर एकरूप नियम निर्धारित कर उनका अनुपालन किया जाए तो इससे लंबित मामलों में कमी अवश्य देखने को मिलेगी।

इसके अतिरिक्त हमारे देश की निचली और बड़ी अदालतों में जितने केस चल रहे हैं उसमें बड़ी तादात सिविल मामलो के होते हैं। अनाधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक ऐसे मामले जिनमें सरकार भी एक पार्टी है, की संख्या कुल मामलों की संख्या की लगभग दो तिहाई है। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में ऐसे मामलों की संख्या ज्यादा है। अधिकांश ऐसे मामले कानून की अस्पष्टता के कारण देखने को मिलते हैं। अतः यदि कानून की किताब में से अनावश्यक व अप्रासंगिक कानूनों को निकाल दिया जाए ताकि सरकार ऐसे मामलों में ना फंसे और कोर्ट पहुंचने की जरूरत ना पडे तो लंबित मामलों में बड़ी कमी देखने को मिलेगी। साथ ही पंचायतों और नगर निगमों को ज्यादा अधिकार दिए जाने की जरूरत है ताकि छोटे मोटे मामले स्थानीय स्तर पर ही निबटाए जा सकें। हमें याद रखना चाहिए कि सरकार का काम मुकदमों में फंसना नहीं बल्कि शासन चलाना है।  

भारतीय न्यायिक प्रणाली की एक और समस्या उसमें पारदर्शिता की कमी है। ये देखा गया है कि सूचना के अधिकार को पूरी तरह से कानून प्रणाली से बाहर रखा गया है। इसलिए न्यायपालिका के कामकाज में महत्वपूर्ण मुद्दों, जैसे न्याय और गुणवत्ता को ठीक से नहीं जाना जाता है। जबकि यूएस व यूके सहित दुनिया के 45 से अधिक देशों ने पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए कई कदम आगे जाकर अदालती कार्रवाईयों की वीडियो रिकॉर्डिंग तक कराने की व्यवस्था कर रखी है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायधीश और कुछ वरिष्ठ वकीलों का कहना है कि पारदर्शिता हमारे लिए समय की जरूरत है। सूचना प्रोद्योगिकी के युग में जब हर ओर पारदर्शिता की वकालत की जा रही हो कोर्ट उससे क्यों दूर रहें। उनका कहना है कि पारदर्शिता के साथ अगर जजों की जवाबदेही तय की जाती है तो इससे अदालतों में बढ़ते केस कम करने में मदद मिलेगी।

उधर, आई-जस्टिस के अधिवक्ता प्रशांत नारंग के मुताबिक वर्तमान में भारतीय अदालतों में भारी तादात में मामले पहुंचते हैं। इनमें बड़ी संख्या में ऐसे मामले होते हैं जिन्हें कोर्ट के बाहर ही निबटाया जा सकता है। उनके मुताबिक अभी विवाद की स्थिति में लोग मामले को लंबा खींचने के लिए अदालत पहुंच जाते हैं, किंतु यदि इन्सेंटिव और पनिशमेंट का तरीका अपनाया जाए तो इसमें कमी लाई जा सकती है। उन्होंने 'विनर्स बिवेयर' नामक अध्ययन का हवाला देते हुए बताया कि यदि दो लोगों के बीच सिविल विशेषकर आर्थिक मामले को लेकर विवाद है तो एक तरीका यह हो सकता है कि एक पक्ष उसके निबटारे के लिए अपनी ओर से क्षतिपूर्ति का प्रस्ताव रखे। उदाहरण के लिए यदि A और B के बीच 10 लाख रूपए के हिसाब का विवाद है और A विवाद के निबटारे के लिए 6 लाख रूपए B को देने को तैयार है। फिर भी यदि B उस प्रस्ताव को ठुकराते हुए अदालत में जाता है तो अदालत में एक सील बंद लिफाफे में कोर्ट के बाहर के प्रस्ताव को जमा कराना होगा जिसपर A और B के हस्ताक्षर होंगे। अदालत उस सीलबंद प्रस्ताव को फैसला आने से पूर्व तक नहीं देखेगी। अब यदि सुनवाई के बाद कोर्ट B को 6 लाख रूपए से कम की क्षतिपूर्ति प्रदान किए जाने का फैसला सुनाती है तो इसका अर्थ यह हुआ कि कोर्ट के बाहर A द्वारा दिया गया प्रस्ताव ज्यादा अच्छा था और B को उसे ले लेना चाहिए था। ऐसी स्थिति में अब कोर्ट के समय और A के द्वारा पूरी प्रक्रिया में किए गए खर्च का भुगतान भी B को करना पड़ेगा। इसी प्रकार, यदि सुनवाई के बाद कोर्ट B को 6 लाख रूपए से अधिक की राशि क्षतिपूर्ति के रूप में प्रदान करने का फैसला सुनाती है तो A को कोर्ट के समय और B के द्वारा पूरी प्रक्रिया में किए गए खर्च का भुगतान करना पड़ेगा। इस प्रकार, लोगों को अधिक से अधिक विवादों को कोर्ट के बाहर सुलझाने का इंसेंटिव मिलेगा और वे हर मामले को लेकर कोर्ट जाने से बचेंगे। 

- नवीन पाल (लेखक वरिष्ठ टीवी पत्रकार हैं)

नवीन पाल