हरे भरे गांवों से कहीं बेहतर हैं शहरों की मलिन बस्तियां

झुग्गियां हैं उम्मीद, तरक्की और इज्जत का ठिकाना

जनगणना आयोग की नई रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में छह करोड़ 40 लाख लोग, यानी हर छह में एक भारतीय गंदी-संदी झोपड़पट्टियों में रहते हैं, जो इंसानों के रहने लायक नहीं हैं। इस तथ्य को लेकर कई तरफ से आहें-कराहें सुनाई पड़ रही हैं। लेकिन ज्यादातर गांवों में स्थितियां इससे भी बुरी हैं। जानवर पालकर मजे से रह लेने की खुशफहमी वाले लोगों की कल्पना में हरे-भरे गांव शहरी मलिन बस्तियों की तुलना में कहीं अच्छे हैं। लेकिन दसियों लाख लोगों का हर साल गांवों से भागकर इन्हीं गंदी बस्तियों में रहना यह बताता है कि लोग इन्हें आगे बढ़ने के रास्ते की तरह देखते हैं। झोपड़पट्टियां गंदी जरूर हैं लेकिन ये उद्यमशीलता का गढ़ भी हैं। भारत का निर्धन वर्ग इन्हें अवसर और आय की सीढ़ियों की तरह देखता है। इस जनगणना रिपोर्ट में ही यह बताया गया है कि झोपड़पट्टियों के 16.7 प्रतिशत घर असलियत में कारखाना, दुकान या दफ्तर हैं। ये बंद गली जैसी कोई चीज नहीं, चहल-पहल भरे वाणिज्यिक केंद्र हैं।

धारावी की मिसाल

मुंबई की धारावी भारत की सबसे बड़ी झोपड़पट्टी है और एक आकलन के मुताबिक यहां 65 करोड़ डॉलर का कारोबार होता है। न जाने कितने 'स्लमडॉग मिलियनेयर' यह अब तक तैयार कर चुकी है। ऐसी जगहें ईर्ष्या का विषय बननी चाहिए, दया का नहीं। चंद्रभान प्रसाद और मिलिंद कांबले जैसे दलित लेखकों ने इस बात को रेखांकित किया है कि शहर कैसे अवसर और गरिमा का केंद्र हैं। आंबेडकर ने क्रूरता और पूर्वाग्रह के अंधकूप के रूप में गांवों की भर्त्सना की है, जो बिल्कुल ठीक है। कई ग्रामीण इलाकों में ताकतवर जातियां आज भी सामंती शासकों जैसा बर्ताव करती हैं। कई गांवों में सामाजिक बाधाएं दलितों और शूद्रों के लिए सिर उठाकर चलना मुश्किल बना देती हैं। लेकिन एक बार शहर चले जाने के बाद वे जाति आधारित ऊंच-नीच और भूस्वामी पर निर्भरता के चंगुल से छूट जाते हैं। गांवों की तुलना में शहरों में उनकी आमदनी कहीं ज्यादा होती है, और यहां से जो पैसे कमाकर वे अपने घर भेजते हैं, उनके सहारे उनके संबंधी भी गांवों के सामंती माहौल से आजादी हासिल करते हैं।

शहरों का प्रवेश द्वार

झोपड़पट्टियां गरीबों के लिए शहरों का प्रवेश द्वार हैं। पागलपन भरी टैक्स प्रणाली और शहरी भूमि नीति ने रीयल एस्टेट को काले धन का अनंत कोषागार बना दिया है। शहरी जमीनों की कीमतें आसमान छू रही हैं और इनसे होने वाली आमदनी के साथ इनका कोई रिश्ता नहीं रह गया है। गरीबों की तो बात ही छोड़िए, शहरी मध्यवर्ग की हैसियत भी अब अपनी जमीन पर खड़े होने की नहीं रह गई है। भारत में शहरीकरण की धीमी रफ्तार की एक वजह यह भी है। शहरों में गरीब सिर्फ नई झोपड़पट्टियों के रास्ते ही प्रवेश पा सकते हैं। यह गैरकानूनी है लेकिन राजनेताओं की नजर में यह पूरी तरह कानूनी है। यही वजह है कि हर चुनाव से पहले झोपड़पट्टियों को कानूनी रूप दिया जाता है। कोई भी नेता इन्हें उजाड़ने की हिम्मत नहीं करता। इसके बजाय बिजली-पानी पहुंचाकर इनका स्तर सुधारा जाता है। कई झुग्गी-बस्तियां चोरी की बिजली से ही रौशन रहती हैं। इसके लिए उन्हें नेताओं का समर्थन जुटाना होता है और लाइनमैनों की मुट्ठी गर्म करनी पड़ती है।

जनगणना रिपोर्ट में झुग्गियों को 'मानव जीवन के लिए अनुपयुक्त' कहा जाना पूरी तरह भ्रामक है। रिपोर्ट केआंकड़े ही यह साबित करते हैं कि ये बस्तियां गांवों से कहीं बेहतर हालत में हैं। यहां 70 प्रतिशत घरों में टीवी है,जबकि सकल भारतीय आंकड़ा 47 फीसदी का ही है। बिहार में टीवी वाले घर 14.5 फीसदी और यूपी में 33.2फीसदी हैं। नरेंद्र मोदी के शाइनिंग गुजरात (51.2 फीसदी) और शरद पवार के महाराष्ट्र (58.8 फीसदी) में भीटीवी मालिकाने की दर हमारी झोपड़पट्टियों से नीचे है। यह सही है कि 34 प्रतिशत झुग्गियों में टॉयलेट नहीं है।लेकिन ग्रामीण भारत में तो यह अनुपात 69.3 फीसदी का है। ग्रामीण झारखंड (90 फीसदी) और बिहार (82फीसदी ) के आंकड़े सबसे बुरे हैं, लेकिन गुजरात (67 फीसदी) और महाराष्ट्र (62 फीसदी) का हाल भी शहरी मलिन बस्तियों से खराब ही है।

ऐसे में किसी को अचानक इस नतीजे पर नहीं पहुंच जाना चाहिए कि जनगणना रिपोर्ट का इरादा मलिनबस्तियों को कलंकित करने का है। इसमें झुग्गियों की जीवनदशा को अस्वच्छ और ठुंसी हुई बताया गया है, औरइसे सुधारने की जरूरत को रेखांकित किया गया है। लेकिन इस रिपोर्ट ने ऐसे बहुत सारे आंकड़े भी दिए हैं, जिनसेपता चलता है कि झोपड़पट्टियों का जीवन गांवों से बेहतर है। कुछ मामलों में तो इन बस्तियों के निवासीअपेक्षाकृत अमीर नगरवासियों से भी अच्छी हालत में हैं। रिपोर्ट का कमजोर पहलू यह है कि इसमें झोपड़पट्टियोंके कारोबारी पहलू को, यहां पनप रहे हजारों काम-धंधों को कुछ खास तवज्जो नहीं दी गई है और गांवों में मौजूदजातिगत और सामंती उत्पीड़न से मुक्ति में इनकी भूमिका को सिरे से अनदेखा कर दिया गया है।

इज्जत से जीने का मौका

गंदी बस्तियों को लेकर आंसू बहाना भूल जाइए और इन्हें शहरी अवसरों के प्रवेश द्वार की तरह देखिए। देखिए किकिस तरह ये बस्तियां दलितों और शूद्रों को इज्जत से जीने का मौका दे रही हैं। इन्हें बढ़ती आमदनी औरमालिकाने के केंद्र के रूप में देखिए, जहां से कुछ करोड़पति भी पैदा हो चुके हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि हमें औरज्यादा झोपड़पट्टियों की, अवसर के और ज्यादा केंद्रों की आवश्यकता है। शहरी कुलीन वर्ग इन बस्तियों कोजमींदोज कर देना चाहता है, लेकिन उसकी यह सोच पूरी तरह गलत है। इसके बजाय हमें झोपड़पट्टियों कोसाफ-सुथरा बनाना चाहिए, उनमें पानी की आपूर्ति सुधारनी चाहिए और कूड़े-कचरे को ठिकाने लगाने कीसही-व्यवस्था बनानी चाहिए। हमें ज्यादा सुधरी हुई, ज्यादा ऊंचे स्तर की झोपड़पट्टियों की जरूरत है। लेकिनझोपड़पट्टियां तो हमें हर हाल में चाहिए होंगी।

- स्वामीनाथन एस. अंकलेसरिया अय्यर
साभारः नवभारत टाइम्स