पंथनिरपेक्ष समाज का हो सृजन
मैं जन्म से हिंदू हूं और आम मध्यवर्गीय माहौल में पला-बढ़ा। मैं अंग्रेजी माध्यम स्कूल में पढ़ा। मेरे दादा-दादी आर्यसमाज से जुड़े थे। हालांकि मेरे पिता ने दूसरा रास्ता अपनाया। इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान वह एक गुरु के प्रभाव में आ गए जिन्होंने ध्यान के माध्यम से भगवान से सीधे साक्षात्कार की संभावना के बारे में बताया। गुरु एक राधास्वामी संत थे, जो कबीर, नानक, मीराबाई, बुल्ले शाह और भक्ति व सूफी संप्रदाय के अन्य संत-कवियों की रचनाएं उद्द्धृत किया करते थे।
हमारे घर में ऊहापोह की स्थिति रहती थी। मेरी दादी हर सोमवार और बुधवार को गुरुद्वारा में मत्था टेकती थीं। मंगलवार और बृहस्पतिवार को मंदिर में दर्शन करती थीं। शनिवार और रविवार को उन्होंने संतों के सत्संग में शामिल होने के लिए आरक्षित कर रखा था, जिनमें शहर में अकसर आने वाले मुस्लिम पीर भी शामिल थे। बीच-बीच में वह आर्यसमाज कार्यक्रमों के लिए भी समय निकाल लेती थीं। जन्म, मरण और शादी-ब्याह के अवसरों पर आर्यसमाज रीतिरिवाजों से ही संस्कार संपन्न होते थे। कमरे में अनेक भगवानों की मूर्तियां और तस्वीरे लगी थीं, खासतौर पर भगवान कृष्ण और राम की। मेरे दादा कहा करते थे कि अगर वह अनुमति देते तो वह अपने व्यस्त कार्यक्रम में से समय निकालकर मस्जिद भी इबादत करने पहुंच जातीं। किंतु व्यावहारिक सोच के मेरे अंकल का मानना था कि असल में वह भगवान तक अपनी फरियाद पहुंचाने के लिए कोई कसर बाकी नहीं छोड़ना चाहती थीं।
इस उदार माहौल में मेरी परवरिश हुई। इस माहौल में संशयवाद और परंपराओं का घालमेल था। मैं यह मानने लगा कि हमारे जीवन का ध्येय राजनीतिक नहीं है। धर्म में ही कल्याण है और जैसे ही यह सार्वजनिक जीवन में प्रवेश करता है, इसकी प्रतिष्ठा गिर जाती है। इस प्रकार, धर्म और राज्य को अलग-अलग रहना चाहिए और इस आस्था में ही पंथनिरपेक्षता निहित है। मैं भारतीय अतीत को महत्वपूर्ण मानता हूं और महसूस करता हूं कि इस अतीत के कारण ही हम आज समृद्ध जीवन जी पा रहे है। इस अतीत में हिंदुत्व, बौद्ध, जैन, इस्लाम, सिख और यहां तक की ईसाइयत के प्रभाव है।
फिर मैं एक उदारवादी हिंदू के रूप में खुद को असहज क्यों महसूस करता हूं? मैं दोनों तरफ से घिरा हुआ महसूस करता हूं। एक तरफ हिंदू राष्ट्रवादी है और दूसरी तरफ पंथनिरपेक्ष लोग। लगता है कुछ गलत हो रहा है। राष्ट्रवादियों ने मेरा अतीत हथिया लिया है। उन्होंने एक राजनीतिक बयान जारी किया है, जिसे हिंदुत्व कहते है। पंथनिरपेक्ष लोग किसी भी पंथिक आस्था का तिरस्कार करते है। वे आस्थावान लोगों को अंधविश्वास के समान मानते है और आम लोगों के विशाल समूह से खुद को काट लेते है। आधुनिक और सफल भारतीय पारंपरिकता को किसी काम का नहीं मानते, जिससे मैं चिपका हुआ हूं।
कुछ वर्ष पहले मैंने अपनी पत्नी से कहा कि मैं समग्र महाभारत पढ़ना चाहता हूं। मैंने पाश्चात्य महाकाव्य पढ़े थे किंतु भारतीय ग्रंथ नहीं पढ़ पाया था। पत्नी ने मुझे संदेह की नजर से देखा और कहा, 'क्या जीवन के झमेलों के बीच अब इसे पढ़ने में देरी नहीं हो गई है?' उन्होंने अपनी मित्रों को यह बात बताई और उस रात डिनर पार्टी में सब इसी मुद्दे पर उपहास कर रहे थे। लोगों ने सवाल उठाए कि पुरानी किताबें पढ़ने का क्या तुक। आप नई किताबें क्यों नहीं पढ़ते है? एक रिटायर्ड आइएएस ने पूछा, 'हमें बताओ कि आप किस तरह की किताबें पढ़ने की सोच रहे हो-वामपंथी या पंथनिरपेक्ष?' मैंने हिचकते हुए कहा कि मैं महाभारत पढ़ने की सोच रहा हूं। उन्होंने चौंककर कहा, 'कहीं आप भगवा रंग में तो नहीं रंग गए?'
उनकी टिप्पणी से मेरा मूड खराब हो गया। मैंने खुद से पूछा कि हमने किस तरह की पंथनिरपेक्षता का सृजन किया है जिसने मेरी बौद्धिक विरासत के दावे को हर लिया है। मैं बड़ा परेशान हुआ कि मुझे अपने पंथनिरपेक्ष मित्रों की असहिष्णुता से डरना पड़ेगा, जो महाकाव्य पढ़ने को राजनीतिक गतिविधि बताते है। मुझे चेन्नई में एक पाश्चात्य विचारों की महिला याद आती है। वह नियमित रूप से अपने घर के पास एक शिव मंदिर में जाती थीं, किंतु बाद में पंथनिरपेक्ष मित्रों के डर के मारे उन्होंने मंदिर जाने की बात छिपानी शुरू कर दी। महिला को डर था कि कहीं लोग उन्हे भगवा ब्रिगेड का न समझ लें।
पंथिक कट्टरता के फैलते जाने से अपनी आस्था को खुलकर अभिव्यक्त करना भी कठिन हो गया है। उदारवादी हिंदू खुद को हिंदू स्वीकार करने में इसलिए हिचकने लगे है कि कहीं उन्हे आरएसएस से जोड़कर न देखा जाने लगे। उदारवादी ईसाइयों और मुसलमानों को भी यही आशंका है। इसका एक कारण यह भी है कि पंथनिरपेक्षता को लेकर भारत में गलत धारणाएं प्रचलित है। कभी देश में पंथनिरपेक्षता की वकालत करने वाले मार्क्सवादी थे। वे न केवल भगवान में विश्वास नहीं रखते, बल्कि नफरत भी करते है। प्रत्यक्षवादी होने के कारण वे पंथ के केवल स्याह पक्ष ही देख पाते है जैसे असहिष्णुता, राष्ट्रवाद आदि। उनकी आम भारतीयों के रोजमर्रा के जीवन से कोई सहानुभूति नहीं है, जिसके प्रत्येक क्षण को धर्म से सार्थकता मिलती है। क्योंकि पंथनिरपेक्ष लोग ऐसी भाषा बोलते है, जो विशाल बहुसंख्या नहीं समझती, इसलिए वे सांप्रदायिक हिंसा की भर्त्सना तो कर सकते है किंतु इसे रोक नहीं सकते।
इस समस्या का एक कारण अनभिज्ञता भी है। हमारे बच्चों को स्कूल-कॉलेजों में प्राचीन ग्रंथ, साहित्य, दर्शन नहीं पढ़ाए जाते। कुछ भारतीय सौभाग्यशाली है कि उन्हे दादी-नानी से सहज ही यह ज्ञान मिल जाता है। अगर हम अपने प्राचीन महान साहित्य को स्कूल-कॉलेज के पाठ्यक्रम में नहीं शामिल करेगे तो हम अपनी परंपरा को गंवा बैठेगे। पंथनिरपेक्षतावादियों को महाभारत जैसे ग्रंथों से चिढ़ क्यों है? यह सच है कि महाभारत में भगवान कृष्ण समेत अनेक भगवानों का चित्रण है, किंतु दांते, मिल्टन, होमर के साहित्य में भी तो भगवान का वर्णन है। जब इटली, इंग्लैंड और ग्रीस में इन लेखकों को पाठ्यक्रम में शामिल किया जा सकता है, तो भारत में महाभारत क्यों नहीं।
भारत में पंथनिरपेक्षता के बीज बोते समय हम भारतीयों को सांप्रदायिक और पंथनिरपेक्ष के बीच नहीं बांट सकते। पंथनिरपेक्ष समाज बनाने के लिए विभिन्न पंथों के लोगों को एकदूसरे के पंथों की आस्थाओं को सहने के साथ-साथ नास्तिकों के अनीश्वरवाद को भी स्वीकार करना होगा। राष्ट्रवादियों को हमारे पंथिक अतीत के हरण और इसे वोटों में बदलने का विरोध करना होगा। पंथनिरपेक्षतावादियों को आम भारतीयों के तर्क से परे भावातीत जीवन की जरूरतों का सम्मान करना होगा। तभी पंथनिरपेक्षता भारत में स्थापित हो सकेगी।
-गुरचरन दास
साभार: जागरण
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