प्रेरित करने वाले गुरुओं की जरूरत

 

क्रिकेट के इंडियन प्रीमियम लीग में फिक्सिंग घोटाला हमारे राष्ट्रीय जीवन के बीमार और कभी खत्म न होने वाले राष्ट्रीय पतन की एक और अपमानजनक कहानी है। हम प्रशासन और कानूनी संस्थाओं पर आरोप लगाने के इतने अभ्यस्त हो चुके हैं कि हम भूल गए कि हमारी दयनीय शिक्षा प्रणाली भी इसके लिए जिम्मेदार है। और हां, माता-पिता भी दोषी हैं, क्योंकि घर हमारे नैतिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। फिर भी एक प्रेरणादायक शिक्षक एक युवक के नैतिक मूल्यों में परिवर्तन ला सकता है। यह निष्कर्ष है 33 वर्षीय हार्वर्ड अर्थशास्त्री राज शेट्टी का, जिन्हें कुछ समय पहले ही दूसरा नोबेल पुरस्कार कहलाने वाला प्रतिष्ठित क्लार्क पुरस्कार मिला है।

हममें से कुछ लोग खुशकिस्मत हैं, जिन्हें युवावस्था में ऐसे शिक्षकों का सानिध्य मिलता है। वे हमारी जिज्ञासा की भूख बढ़ाते भी हैं और उसे पोषण भी देते हैं। जब हम कुछ गलत करते हैं तो सही दिशा दिखाते हुए हल्के से कोहनी भी मारते हैं। जब हम बड़े होते हैं, अपने चरित्र के बल पर ही परिणाम हासिल क रते हैं। एक अच्छा शिक्षक यह हमें उपदेश से नहीं, बल्कि आदर्श अनुकरण से सिखा सकता है।

भारत के करीब 20 प्रतिशत बच्चे आज बेहतरीन शिक्षा पाते हैं, लेकिन बाकी लोगों की कहानी निराशाजनक है। सकारात्मक नजर से देखें तो 97 प्रतिशत बच्चे स्कूल में प्रवेश लेते हैं। लेकिन एक साल बाद 43 प्रतिशत ही अक्षर पहचान पाते हैं। कक्षा 5 में आने के बावजूद आधे बच्चे कक्षा 2 की पाठ्यपुस्तक नहीं पढ़ पाते और तीन चौथाई तो साधारण गुणा-भाग भी नहीं कर पाते। दसवीं कक्षा तक भारतीय बच्चे नीचे से दूसरी पायदान पर आ जाते हैं, किर्गिस्तान से ऊपर। ऐसा अभी 74 देशों के विद्यार्थियों के अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम में परीक्षा से पता चला। यह त्रासदी है! हमारा शिक्षा प्रतिष्ठान इससे इंकार करता नजर आता है और शिक्षा का अधिकार कानून पढ़ाई के नतीजे पर खामोश है।

इस घटिया प्रणाली की सबसे कमजोर कड़ी थके हुए और सनकी शिक्षक हैं। अगर उनमें कोई चमक थी भी तो वे दशकों पहले बुझ चुके हैं। बहुत कम शिक्षक अध्यापन को धर्म मानते हैं। कितने हैं जो सुबह उठकर आईने में देखकर कहते हैं, आज मैं अपनी क्लास के कम से कम एक विद्यार्थी को प्रेरणा दूंगा। हमारे किसी राजनेता में भी वैसा साहस नहीं, जैसा अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा ने टीवी पर कुछ साल पहले दिखाया था, यह कहकर कि खराब शिक्षक बर्खास्त कर दिए जाएंगे।

इस धुंधले परिदृश्य में भी उम्मीद की हरियाली कोंपल हैं। हाल के दिनों में शिक्षकों के वेतन बढ़े हैं। इसका मतलब है सही किस्म के व्यक्ति इस पेशे की ओर आकर्षित होंगे। प्रौद्योगिकी भी बहुत कुछ संभावनाएं जता रही है। बच्चे आजकल विश्व के बेहतरीन शिक्षकों को ऑनलाइन पढ़ाते देख रहे हैं। यहां तक कि अपने मोबाइल फोन पर भी। शाहीन मिस्त्री का टीच फॉर इंडिया कार्यक्रम आश्चर्यजनक है।

टीच फॉर अमेरिका से प्रेरित यह कार्यक्रम सर्वश्रेष्ठ कॉलेज स्नातकों को लेकर उन्हें गरीब स्कूलों में पढ़ाने का मौका देता है, जहां वे जल्द ही रोल मॉडल बन जाते हैं। मुंबई जैसे शहरों में बदलाव आ गया है, जहां विफल म्युनिसिपल स्कूलों को एनजीओ के हवाले कर विश्व का बेहतरीन तरीका अपनाया गया है।

हमें अच्छे गुरुओं की जरूरत है। निस्संदेह हम किसी प्रेरणादायक शिक्षक के स्वर्ग से टपकने का इंतजार तो नहीं कर सक ते। न ही उच्चस्तर पर मौजूद भ्रष्टाचार को कोस सकते हैं। नैतिक बुनियाद तो घर में पड़ती हैं इसलिए बच्चों को नैतिक व्यवहार की शिक्षा देने की जिम्मेदारी माता-पिता को लेनी होगी। लेकिन माता-पिता को स्कूलों से भी जुडऩा होगा।

शोध बताता है कि जहां माता-पिता ने स्कूलों में रुचि लेनी शुरू की, वहां की पढ़ाई का स्तर ऊंचा उठा है। गरीब माता-पिता भी अंतर ला सकते हैं। हालांकि शिक्षा का अधिकार समितियों के माध्यम से माता-पिता को स्कूल की गतिविधियों में शामिल होने का अधिकार देता है, लेकिन लालची यूनियनों और लापरवाह नौकरशाहों की बेदर्द प्रणाली में यह इतना आसान नहीं है, लेकिन इसे करना ही होगा।

ऐसा लगता है कि शिक्षा में सुधार हमारे स्कूलों का माहौल प्रेरणादायक शिक्षकों को लाने और उन्हें फलने-फूलने लायक  बनाने से ही होगा। भारत में मध्यम वर्ग के लोग अपने बच्चों को निजी स्कूलों में और गरीब अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में भेजते हैं। लेकिन अब गरीब तक अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों से निकालकर सौ से 250 रुपए तक की कम फीस वाले निजी स्कूलों में डाल रहे हैं।

भले ही निजी स्कूलों के शिक्षकों का वेतन कम हो, वे कम पढ़े-लिखे हों, सर्वे में बच्चे और माता-पिता कहते हैं कि वे कम से कम स्कूल में रहते तो हैं और कुछ न कुछ सिखाने की कोशिश तो करते हैं। इसलिए वे निजी स्कूलों को प्राथमिकता देते हैं। सरकारी स्कूलों में शिक्षक बिना पढ़ाए दूर रहते हैं, उन्हें मालूम है देखने वाला कोई नहीं, निरीक्षक भी शिक्षक संघों से खौफ खाए रहते हैं।

शिक्षण का स्तर बढ़ाने के लिए निजी और सरकारी स्कूलों के बीच का दोहरापन खत्म करना होगा। पहली से पांचवीं कक्षा तक भारत के सभी स्कूली बच्चों को छात्रवृत्ति देनी चाहिए और उनके माता-पिता को मर्जी का स्कूल चुनने का अधिकार हो। सरकार को स्कूल नहीं चलाने चाहिए, उससे बची राशि वह छात्रवृत्ति के रूप में दे।

तब शिक्षकों का वेतन सरकार नहीं देगी, बल्कि छात्रवृत्ति के रूप में मिली राशि में से बच्चों के माता-पिता देंगे। इससे स्कूल भी यह छात्रवृत्ति पाने के लिए प्रतिस्पर्धा करने को मजबूर होंगे। इस प्रतिस्पर्धा के लिए वे अच्छे शिक्षक रखेंगे। बदले में शिक्षक भी अपना सर्वश्रेष्ठ देंगे। अंत में वाउचर्स पाने के लिए स्कूलों के बीच होने वाली प्रतिस्पर्धा स्कूलों को सुधरने पर मजबूर कर देगी।

अगर कोई शिक्षक  बच्चे को पीटता है तो उसके माता-पिता आसानी से उसे दूसरे स्कूल में डाल सकेंगे। जब भी कोई बच्चा स्कूल छोड़ेगा, खराब शिक्षक  को अपनी आय और सम्मान गंवाना पड़ेगा। स्कूल बच्चों के माता-पिता की इच्छा के अनुसार चलेंगे, स्कूल के समय में लचीलापन रहेगा। स्कूल अच्छे शौचालयों के लिए भी प्रतिस्पर्धा करेंगे। पोषक मध्याह्न भोजन उनके ग्राहकों के वाउचर बढ़ाएंगे। स्कूल वाउचर नामक इस योजना का कई देशों में सफल प्रयोग हो चुका है। भारत में हमारे प्राइमरी स्कूलों की हालत इतनी खराब है कि उसे सुधारने के लिए हम प्रयोग के तौर पर हर राज्य के कम से कम एक जिले में तो शुरू कर ही सकते हैं।

 

गुरचरण दास, (लेखक आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ हैं)

साभारः दैनिक भास्कर

 

 

गुरचरण दास

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