रूसी ‘चुनाव’ : सिर्फ धांधली का खेल

चार दिसंबर को रूस में “चुनाव” हुए। मैंने मतदान में हिस्सा नहीं लिया, क्योंकि यह महज समय की बर्बादी थी, जबकि केंद्रीय चुनाव आयोग इसे “स्टेट ड्यूमा के लिए चुनाव” बता रहा था। उस दिन तक यह स्वयंसिद्ध तथ्य की तरह था कि सत्तारूढ़ यूनाइटेड रशिया पार्टी की झोली में 10.8 करोड़ मतदाताओं में से 4.5 से 5 करोड़ वोट गए। अब इसे मजाक बनाया जा रहा है और यहां तक कहा जा रहा है कि कुछ जिलों में तो उसे मतदाताओं की संख्या से भी ज्यादा वोट मिले।

चार दिसंबर को मेरे जिन साथियों ने मतदान करने का फैसला किया, वे मुझसे बेहतर जानते थे कि ये वोट उन्होंने डाले या अधिकारियों ने। यूनाइटेड रशिया पार्टी के खिलाफ ढेरों वोट पड़ने के बावजूद उनकी संख्या 50 फीसदी से भी कम रह गई। इसीलिए मैंने इस सरकारी “चमत्कार” के खिलाफ 5 दिसंबर को हुए पहले प्रदर्शनों में हिस्सा लेने का फैसला किया। इस पर लगभग आम सहमति थी कि पूर्व चुनावों में यूनाइटेड रशिया पार्टी को मिले वास्तविक समर्थन और चुनावी धांधली में शामिल होने की सरकारी क्षमता को लेकर अतिशयोक्तिपूर्ण अनुमान लगाए थे। अब यह साफ हो गया है कि सत्तारूढ़ दल लोगों के बीच अपनी लोकप्रियता के चलते सत्ता में नहीं है।

यूनाइटेड रशिया ने देश की मुख्य राजनीतिक शक्ति के तौर पर अपनी छवि को गंवा दिया है। उसका यह दावा कतई खोखला है कि वह बहुमत की इच्छा का प्रतिनिधित्व करती है। जो कुछ हो रहा है वह अस्थाई झटका या दुर्घटना नहीं है, जिसकी बाद में भरपाई की जा सके। यह एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था बनाने की कोशिशों का नतीजा है, जिसे वे “नियंत्रित” या “संप्रभु” जनतंत्र का नाम देते हैं। इस कथित चुनाव के नतीजों ने भी यह दिखाया कि रूस को “यूनाइट” रशिया जिस डगर पर ले जा रही है, वह अधिकतर रूसियों को मंजूर नहीं है- स्पष्ट रूप से बहुमत का इसे समर्थन हासिल नहीं है।

घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर मतदाताओं की इच्छा के नाम पर किया गया कोई भी काम अब कतई मानने योग्य नहीं है। सरकार की राय भी रूस में चल रहे तमाम विचारों में से एक मानी जाएगी, इसे “रूस की राय” मानने का तो कोई कारण ही नहीं है। सत्ता पर एकाधिकार की बात अब गुजरा कल है।

चलिए इस कथित चुनाव के तकनीकी ब्योरों पर नजर डालते हैं। उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि मतदाताओं की पसंद के साथ जमकर धोखाधड़ी हुई है। अंतिम आंकड़ो और क्षेत्रीय चुनाव आयोगों के आंकड़ों का मिलान दर्शाता है कि यूनाइटेड रशिया के पक्ष में दसियों लाख वोट बढ़ा-चढ़ाकर दिखाए गए हैं। कम से कम यह मानने की कोई गुंजाइश ही नहीं है कि उन मतदाताओं के यूनाइटेड रशिया के पक्ष में 35 फीसदी से ज्यादा वोट गए हैं, जो वास्तव में हैं और जिन्होंने खुद पोलिंग बूथ पर जाकर पार्टी और इसके उम्मीदवार के लिए वोट डाला है।

इसके अलावा कई क्षेत्रों के मतदान के नतीजे बाकी रूस से इतने अलग हैं कि इनको किसी भी तरह से साबित नहीं किया जा सकता है। इसका कोई स्पष्टीकरण नहीं है कि उन क्षेत्रों में हो क्या रहा है। तीसरा, मास्को में पर्यवेक्षकों की रिपोर्टों से भी पता चलता है कि चुनाव में बड़े पैमाने पर धांधली हुई है। यह गड़बड़ी दूरदराज के इलाकों में ही नहीं, बल्कि रूस के सबसे घनी आबादी वाले क्षेत्रों में भी की गई है। इनका ड्यूमा के कामों पर भी सीधा असर पड़ेगा। अब केंद्रीय चुनाव आयोग द्वारा घोषित नतीजे आपराधिक जांच के दायरे में हैं। विश्लेषण से पता चलता है कि सत्तारूढ़ पार्टी के पक्ष में गिने गए करीब डेढ़ करोड़ वोट मौजूदा रूसी अधिकारियों द्वारा किए गए धोखाधड़ी और जालसाजी जैसे आपराधिक कृत्यों का नतीजा हैं। इन अधिकारियों की कमान प्रधानमंत्री व्लादिमीर पुतिन और राष्ट्रपति मेदवेदेव के हाथ में है।

चुनाव में इतने बड़े पैमाने पर हुई धांधली की चर्चा करने या प्रशासन का दुरुपयोग करने या मतदाताओं पर दबाव डालने और यहां तक कि मतों की गलत गिनती की बात से भी इंकार करना, जो कुछ भी हो रहा है, उसमें अधिकारियों की भूमिका अप्रत्यक्ष रूप से साबित होती है। इस हालत में धांधली का फायदा उठाने वाली यूनाइटेड रशिया यह दावा नहीं कर सकती कि उसे ड्यूमा में बहुमत हासिल है। चूंकि यह दावा पहले से ही किया जा रहा है, ऐसे में अगली ड्यूमा की वैधता भी सवालों के घेरे में है। अधिकतर रूसी मतदाता ड्यूमा के फैसलों को कतई वैध नहीं मानेंगे, भले ही कितने ही ड्यूमा सदस्यों ने इनके पक्ष में वोट दिया हो। कोई भी “गठबंधन सरकार” संभव नहीं हैः इस “विधायिका” के द्वारा अनुमोदित किसी भी रूसी सरकार को पूरा जनसमर्थन नहीं मिलेगा। ऐसी सरकार एक गैरकानूनी संसद द्वारा चुनी जाएगी और वह आबादी के कितने प्रतिशत हिस्से का प्रतिनिधित्व करेगी, इसकी कोई जानकारी नहीं है।

अगली बार फिर इसी समय चुनाव होंगे। इनमें भी 2011, 2007 और काफी हद तक 2003 में हुए ड्यूमा चुनावों की झलक हो सकती है। हालांकि वे चुनाव बेहद अलग स्थितियों में होंगे। उस वक्तद मतदाता अधिक जागरूक होंगे कि सभी चीजें पूर्वनिर्धारित हैं और सत्तािरूढ़ दल बिना बड़े पैमाने पर धांधली किए नहीं जीत सकेगा। गैर-प्रणालीगत विपक्ष को बढ़ने से रोकने का सबसे सही रास्ताक यही है कि राजनीतिक गतिविधियों पर लगी पाबंदियों को हटा लिया जाए और प्रभावी रूप से अतीत में लौटते हुए वर्ष 1999 की यथास्थिति को लागू कर दिया जाए। नेता सत्ताी पर से एकाधिकार खो रहे हैं। यदि वर्ष 2012 के राष्ट्रसपति चुनाव 2011 के ड्यूमा चुनाव की तरह हुए तो इनसे लोगों के बीच कट्टरपंथी विचारधारा का अधिक विकास होगा और वे विकास को लेकर कम सोचेंगे। अभी हम हजारों में कहीं दस ठहरते हैं, लेकिन कहीं ऐसा न हो कि हम हजारों में सैकड़ों ठहरने लगें। उस स्थिति में बहुत देर हो चुकी होगी। वर्ष 2011 के ड्यूमा चुनाव के नतीजों को रद कर और बिना धांधली के नए चुनाव के साथ तमाम समस्यावओं को टाला जा सकता है। यह अगले साल और इसके आगे होने वाले राष्ट्रधपति चुनावों के लिए भी सुगम रास्ताक तैयार कर देगा।

बतौर उदारवादी मैं कभी नहीं चाहूंगा कि संसदीय चुनाव में मुझे किन्हींष चार चोरी की बीमारी से पीडि़त और तीन समाजवादियों के बीच चुनाव करना पड़े। निश्चित ही मैं करीब-करीब सनकी वामपंथियों और हिंसक प्रदर्शनों के पक्षकारों के बीच लोकतांत्रिक मूल्यों  को लेकर प्रतिबद्धता का प्रदर्शन नहीं करना चाहता। यही वजह है कि परंपरागत उदारवादियों और उदारवादी दलों को चुनावी प्रक्रिया से बाहर छोड़ दिया जाता है। इसके बाद चोरी करने की बीमारी से पीडि़त और सनकी आधिकारिक विपक्ष के बीच चुनाव का विकल्पस बचता है। सही चुनावी नीति का एक नतीजा यह होगा कि उससे समझदार व्यनक्तियों के बीच राजनीतिक प्रतिस्पपर्धा के लिए फिर द्वार खुल जाएंगे। निश्चित ही इससे रूस के लोगों और उसके पड़ोजसियों को फायदा होगा।

- दमित्री बुतरिन, मुख्य संपादक, आर्थिक विभाग,
स्तंभकार, कॉमरसांट डेली InLiberty.ru के लिए

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