देश के लिए हानिकारक है रुपए का चढ़ना

चुनाव में मोदी की जीत की संभावना भारतीय बॉन्डों और शेयरों में डॉलरों की बाढ़ का सबब बन गई है। इसके चलते रुपया मजबूत हुआ है और डॉलर के साथ उसका विनिमय मूल्य 60 रुपया प्रति डॉलर की दहलीज से भी नीचे आ गया है। रुपए की यह मजबूती अगर निर्यात में उछाल से पैदा होती तो यह सभी के लिए खुशी की बात थी। लेकिन हकीकत इससे अलग है। रुपया चढ़ने की मौजूदा वजह मोदी की जीत पर लगे सट्टे में पैसा झोंके जाने जैसी है। इस तरीके से मजबूत हुआ रुपया भारत की निर्यात संभावनाओं में पलीता लगा देगा और देश को इससे कुछ भी स्थायी लाभ नहीं होगा।
 
कुछ निवेश बैंकों का अंदाजा है कि रुपया आगे और मजबूत होकर 58 रुपया प्रति डॉलर तक आएगा। सिटीग्रुप के एडम गिलमोर तो मोदी की जोरदार जीत की स्थिति में इसके 40-45 रुपया प्रति डॉलर तक पहुंच जाने की बात कह चुके हैं। लेकिन ऐसा हुआ तो यह भारतीय निर्यात की प्रतियोगी क्षमता और भुगतान संतुलन के लिए घातक सिद्ध होगा।
 
गिरने से क्या डरना
आम भारतीयों को रुपए का मजबूत होना काफी अच्छा लगता है। लेकिन मजबूत रुपए को राष्ट्रीय गौरव के समतुल्य मानना गलत है। जो बात मायने रखती है, वह यह कि भारत के निर्यात दुनिया के अन्य देशों के साथ बराबर की होड़ कर सकें और चालू खाते का घाटा नियंत्रित रहे। मजबूत रुपए के साथ अगर ये दोनों पहलू जुड़े हों, तो बहुत अच्छा। लेकिन इन दोनों बातों के लिए अगर रुपए को कमजोर करने की जरूरत पड़े तो इसमें भी कोई बुराई नहीं है। याद रहे, विनिमय दर खुद में कोई साध्य नहीं है। यह सिर्फ एक साध्य के साथ जुड़ा हुआ साधन है।
 
पिछले साल वित्त मंत्रालय की प्राची मिश्रा, मोहिनी मलकानी और अन्य ने यह हिसाब लगाया कि डॉलर के बरक्स रुपए की विनिमय दर अभी 58 से 60 रुपया प्रति डॉलर ही ठीक है। कुछ न कुछ किंतु-परंतु ऐसी सभी गणनाओं के साथ जुड़े होते हैं, लेकिन कई विदेशी विश्लेषकों का नजरिया भी इस बारे में ऐसा ही है। बहरहाल, भारत और बाकी दुनिया की मुद्रास्फीति में चलता आ रहा भारी फर्क यह बताता है कि आज उसी मॉडल से 60-62 रुपया प्रति डॉलर की विनिमय दर को भी तार्किक माना जा सकता है। भारत में मुद्रास्फीति नीचे आनी शुरू तो हुई है, लेकिन विदेशी दरों की तुलना में यह आज भी काफी ऊंची है। ऐसे में 2014 के अंत तक 63 से 65 रुपया प्रति डॉलर की विनिमय दर को प्रतियोगी माना जा सकता है।
 
हाल में डॉलरों की आवक पर गौर करें तो निराशाजनक तस्वीर उभरती है। जनवरी महीने से अब तक देश में आए कुल 8 अरब डॉलरों में से कम से कम 6 अरब सरकारी बॉन्डों में आए हैं। भारतीय ब्याज दर बाकी दुनिया के मुकाबले काफी ऊंची है। यहां कम अवधि वाले बॉन्ड 8.5 फीसदी तक का रिटर्न देते हैं। पिछले साल रुपए के अवमूल्यन के चलते इन पर मिलने वाला भारी लाभ भ्रामक सिद्ध हुआ था। मगर, आज तो विदेशियों को अच्छी ब्याज दर के साथ-साथ रुपये के चढ़ने का फायदा भी मिल रहा है। इससे उनका कुल लाभ 10 फीसदी तक पहुंच जाता है। आश्चर्य नहीं कि वे दौड़े चले आ रहे हैं। लेकिन चालू खाता घाटा कम करने का यह तरीका ठीक नहीं है।
 
आरबीआई को दो साल से कम अवधि के लिए आने वाली उधारी आवक को हतोत्साहित करना चाहिए। दो साल के सरकारी बॉन्ड पर ब्याज की दर तीन महीने की ट्रेजरी के मुकाबले थोड़ी ही ज्यादा है, मगर इसमें एक्सचेंज रेट का जोखिम होता है। दो साल में रुपए का अवमूल्यन होने के आसार बहुत ज्यादा रहते हैं। तीन महीने वाली आवक रिस्की पूंजी लेकर आती है जो मनमाफिक चुनाव नतीजे न आने पर छूमंतर हो जाएगी। इसके बरक्स दो साल वाली आवक भरोसेमंद होती है। अतीत के अनुभवों ने साबित किया है कि विदेशी मुद्रा संकट को लेकर भारत काफी संवेदनशील रहा है। इससे बचने का सबसे अच्छा उपाय यही है कि आयात को कम रखते हुए निर्यात को ज्यादा प्रतियोगी बनाया जाए, उत्पादकता लगातार बढ़ाई जाए और इस तरह चालू खाता घाटे को काबू में रखा जाए।
 
उधारी डॉलर नहीं चाहिए
लेकिन यह आदर्श स्थिति है। ऐसा न होने पर भी दो तरीकों से सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है। पहला, निर्यात में अपना पलड़ा हल्का हो और चालू खाता घाटे को काबू में रखना जरूरी हो तो रुपए को गिरने दें। दूसरा तरीका यह है कि डॉलरों की अपेक्षाकृत स्थिर आवक को बढ़ावा दें और अस्थिर आवक को हतोत्साहित करें। बाहर से आने वाले डॉलरों का सबसे अच्छा रास्ता एफडीआई का है। इनका शेयरों में आना भी ठीक है। लेकिन उधारी की शक्ल में आने वाले डॉलरों को प्रोत्साहित नहीं किया जाना चाहिए और कम अवधि की विदेशी उधारी को, चाहे वह डॉलरों की शक्ल में हो या फिर रुपए की, पूरी सख्ती से हतोत्साहित किया जाना चाहिए। रुपये की मजबूती के नाम पर डॉलरों की ऐसी आवक की इजाजत हरगिज नहीं दी जानी चाहिए, जो भारतीय निर्यात को दुनिया में खड़ा होने लायक ही न रहने दे। 
 
 
- स्वामीनाथन एस अंकलेसरिया अय्यर
साभारः नवभारत टाइम्स