सूचना का अधिकार का न हो दुरुपयोग

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सर्वोच्च न्यायालय के प्रबल समर्थक निश्चित तौर पर उसे यह श्रेय देंगे कि बीते तीन दशकों के दौरान उसने तीन क्रांतिकारी बदलावों की शुरुआत की। पहला था 1980 के दशक में जनहित याचिका से जुड़ा आंदोलन जिसने देश के हर नागरिक के लिए अदालत के दरवाजे खोले, खासतौर पर उन लोगों के लिए जो अपनी गरीबी, निरक्षरता और पिछड़ेपन के कारण ऐसा करने में असमर्थ थे। लगभग उसी समय न्यायालय ने अपने कुछ फैसलों के जरिए नागरिक अधिकारों की शुरुआत की जो आगे चलकर सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम का आधार बना। तीसरी लहर थी भ्रष्टाचार-निरोधक तंत्र की स्थापना की. इसका अंकुरण भी अदालती कक्षों में हुआ जब हवाला मामलों, 2जी मामलों तथा ऐसे ही बड़े मामलों में उसने कई महत्त्वपूर्ण फैसले दिए.

अन्य तरह की क्रांतियों की भांति ही इनमें भी लक्ष्य से भ्रमित हो जाने तथा अनचाहे परिणामों की ओर अग्रसर होने की प्रवृत्ति रही है। जनहित याचिकाओं की हालत जंगली झाडिय़ों के समान हो गई है और अब न्यायालय उसकी टहनियां छांटने के काम में लगे हैं यानी अब वे अनाधिकार और निरर्थक याचिकाएं दायर करने वालों को दंडित करने का काम कर रहे हैं। बीते सप्ताह, सर्वोच्च न्यायालय ने पाया कि सूचना के अधिकार का भी दुरुपयोग हो रहा है। केंद्रीय बोर्ड और आदित्य के मामले में फैसला सुनाते हुए न्यायालय ने कहा, 'यह अधिकार जिम्मेदार नागरिकों के हाथों में एक ऐसे औजार की तरह होना चाहिए जिसकी मदद से वे भ्रष्टाचार से लड़ सकें और पारदर्शिता और जवाबदेही तय कर सकें।

बहरहाल, उसने चेतावनी दी कि ऐसी जानकारियों को सार्वजनिक करने की अव्यवहारिक मांग जिसका सरकारी कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही लाने तथा भ्रष्टाचार के निवारण से कोई लेना देना नहीं हो वह न केलवल नकारात्मक असर वाली होगी बल्कि इसका प्रशासन के कामकाज पर भी बुरा असर पड़ेगा। इसके चलते कार्यकारी सूचना जुटाने और उसे देने के अनुत्पादक काम में ही लगे रह जाएंगे। न्यायालय ने कहा कि इस अधिनियम के दुरुपयोग की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। वह कहीं देश की एकता और विकास की राह का रोड़ा न बन जाए या फिर नागरिकों के आपसी सौहार्द और शांति के खत्म होने का कारण न बन जाए। इतना ही नहीं इस अधिनियिम को ईमानदार अधिकारियों को दबाने का माध्यम न बनने दिया जाए।

न्यायालय ने आगे कहा, 'हमारा देश ऐसी स्थिति कतई नहीं चाहता जिसमें 75 फीसदी सरकारी अधिकारी अपने समय का 75 फीसदी हिस्सा नियमित काम करने के बजाय सूचना चाहने वालों को के लिए जानकारियां जुटाने में बिता दें। आरटीआई अधिनियम के तहत जुर्माने का भय तथा दबाव इतना नहीं होना चाहिए कि सरकारी अधिकारी अपना रोजमर्रा का काम पीछे छोड़कर सूचना जुटाने को ही प्राथमिकता देना शुरू कर दें।

पिछले वर्ष, न्यायालय ने एक ऐसी अपील खारिज कर दी थी जिसमें आवेदक सभी निचली अदालतों में संपत्ति का एक मुकदमा हार जाने के बाद यह जानना चाहता था कि आखिर किस वजह से न्यायधीशों ने उसके खिलाफ फैसला सुनाया। खानपुरम और प्रशासनिक अधिकारी के इस मामले में दिए गए फैसले में कहा गया, 'कोई न्यायधीश यह बताने के लिए मजबूर नहीं है कि आखिर किस वजह से वह किसी निष्कर्ष पर पहुंचा।

उच्च न्यायालयों को भी ऐसी याचिकाएं मिलती हैं जिनमें अप्रसांगिक जानकारी मांगी गई होती है या फिर जो सरकारी अधिकारियों से बदला लेने के प्रयासो से दायर की जाती हैं। दिल्ली उच्च न्यायालय ने हाल ही में  पारदर्शिता पब्लिक फाउंडेशन और भारत सरकार के मामले में एक गैर सरकारी संगठन ने नगरपालिका निगम के उपायुक्त  की कथित यौन समस्याओं, डीएनए परीक्षण तथा कथित रूप से बवासीर की बीमारी और नसबंदी से संबंधित अस्पताल के रिकॉड्र्स मांगे थे। यह मांग की पूरी सूची का आधा हिस्सा ही है। जाहिर तौर पर यह मामला केवल अधिकारी को शर्मिंदा करने की कोशिश का हिस्सा था। उच्च न्यायालय ने मामला खारिज कर दिया और उसका पूरा खर्चा भी संगठन से वसूल कर उसे नेत्रहीन राहत संघ में जमा कराने के निर्देश दिया। न्यायलय ने फैसले में कहा कि यह याचिका अभद्र होने के साथ-साथ संविधान के अनुच्छेद 21 में वर्णित निजता के अधिकार का भी अतिक्रमण करती थी। न्यायालय ने कहा कि यह एक उदाहरण है कि कैसे आरटीआई अधिनियम के प्रावधानों का दुरुपयोग करने की कोशिश हो सकती है।

बीते सप्ताह सर्वोच्च न्यायालय का एक फैसला परीक्षार्थी के अपनी मूल्यांकित उत्तर पुस्तिका को देखने के अधिकार के बारे में आया। न्यायालय ने कहा कि विद्यार्थियों के पास इस बात का अधिकार है कि वह अपनी उत्तर पुस्तिका देख सके क्योंकि वह ‘सूचना’ है। यह अधिनियम के तहत संरक्षित की श्रेणी में नहीं आता। कलकत्ता उच्च न्यायालय ने भी पहले इस अपील पर यही निर्णय दिया था। बहरहाल, ऐसे ही एक मामले में झारखंड उच्च न्यायालय की राय अलग है। झारखंड लोक सेवा आयोग और झारखंड राज्य के मामले में उसने फैसला दिया कि मूल्यांकित उत्तर पुस्तिका को सार्वजनिक करना खतरनाक है। इससे परीक्षकों, पर्यवेक्षकों और परीक्षा की प्रक्रिया से जुड़े अन्य लोगों के नाम भी सामने आ जाएंगे। इससे उन की जान तथा सुरक्षा को खतरा हो सकता है। चंडीगढ़ उच्च न्यायालय ने भी सूचना अधिकारी के उस निर्णय को बरकरार रखा जिसमें उसने उन पुलिस कांस्टेबलों की उत्तर पुस्तिका नहीं दिखाने को कहा था जो विभागीय पदोन्नति परीक्षा में शामिल हुए थे।

उच्च न्यायालय ने कहा कि ऐसा खुलासा अन्य प्रतिभागियों की स्थिति के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। पटना उच्च न्यायालय ने हाल में एक अन्य मामले में कहा कि पुलिस प्रयोगशाला सहायकों की भर्ती के साक्षात्कार बोर्ड के सदस्यों के नामों का खुलासा किया जा सकता है लेकिन उनकी तस्वीरें अथवा उनके घर का पता किसी को नहीं बताया जाना चाहिए। संभव है उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश सर्वोच्च न्यायालय उन न्यायाधीशों के मुकाबले अपने-अपने इलाकों की जमीनी हकीकतों से कहीं बेहतर ढंग से परिचित हों, जो पूरी तरह अव्यावहारिक नजर आते हैं।

- एम जे एंटनी

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