जोखिम न लेना सबसे बड़ा जोखिम

बजट को लेकर हमारा मीडिया और पूरी फाइनेंशियल इंडस्ट्री ने जो उत्तेजना दिखाई वह चकराने वाली है। हर साल इस मौके पर वे एेसा माहौल बनाते हैं जैसे वित्तमंत्री जब अपना पिटारा खोलकर घोषणाएं करेंगे तो कोई जीवन बदलने वाली घटना हो जाएगी। ज्यादातर भारतीयों को दो बातें जानने के लिए रुचि रहती है कि सस्ता क्या हुआ और क्या टैक्स कटौती से कुछ बचत हुई है? (हर साल उत्तर ‘नहीं’ रहता है, क्योंकि आप ज्यादा कुछ नहीं बचाते हैं और न ही टैक्स में ज्यादा गिरावट आती है।) इसके अलावा, हमें ऐसी घोषणाएं पढ़ना मजेदार लगता है कि कितने आईआईटी संस्थान खुलेंगे या कहीं बड़ी-सी प्रतिमा स्थापित होगी अथवा नहीं।
 
हर भारतीय के लिए यह जानना अनिवार्य है कि हमारी वित्तीय व्यवस्था में क्या चल रहा है? बजट इस बात का ब्ल्यू प्रिंट है कि सरकार कैसे पैसा कमाएगी और कैसे यह पैसा खर्च करेगी। आंकड़ों में बात करें तो केंद्र सरकार एक साल में करीब 12 लाख करोड़ रुपए कमाती है। सरलता से समझना हो तो कल्पना करें कि सरकार गोपी नामक व्यक्ति है जो हर साल 12 लाख रुपए या 1 लाख रुपए महीना कमाता है। गोपी का वेतन अच्छा-खासा बढ़ा है और तीन साल पहले के 9 लाख रुपए सालाना से काफी बढ़ गया है। हालांकि, गोपी हमेशा ही कमाई से ज्यादा खर्च करता है। तीन साल पहले वह 14 लाख रुपए प्रतिवर्ष खर्च करता था। आज वह 18 लाख रुपए सालाना खर्च करता है। हर साल वह इस घाटे की पूर्ति के लिए उधार लेता है और नोट छापता है। इससे दो प्रमुख समस्याएं खड़ी होती हैं। एक तो इससे पैसे की कीमत घटती है, जिससे लगातार महंगाई बढ़ती रहती है। दूसरी बात, इससे हर किसी के लिए ब्याज दरें बढ़ती हैं। इससे बिज़नेस के लिए कर्ज लेना महंगा हो जाता है और उन्हें ज्यादा निवेश करने से रोकता है।
 
महंगाई आमतौर पर नागरिकों के लिए सबसे बड़ा मुद्दा होता है और यह तब तक  नहीं सुलझ सकता जब तक कि आमदनी और खर्च की यह खाई कम नहीं होती। खेद है कि खर्च के मुद्दे पर ज्यादा गुंजाइश नहीं है। सब्सिडी और रक्षा  ऐसे संवेदनशील क्षेत्र हैं कि उन पर होने वाला खर्च घटाया नहीं जा सकता। पूर्व में लिए कर्ज के ब्याज में कटौती नहीं की जा सकती। 
 
इस प्रकार भारत की महंगाई और आर्थिक वृद्धि की समस्याओं को सुलझाने का एक ही तरीका है। वह तरीका है बिज़नेस और उपभोक्ता की मनोदशा को सुधारना। अब तक जिस चीज की कमी थी वह है राजनीतिक इच्छाशक्ति। कम से कम अब तक तो यही माना जाता रहा है। हालांकि, कई लोगों को आश्चर्य हुआ होगा कि मौजूदा सरकार भी कम से कम इस बजट में तो यह नहीं कर सकी। विकास, बिज़नेस, युवा, आर्थिक वृद्धि का समर्थन करने वाली सरकार ने भी ऐसा बजट पेश किया जो क्रांतिकारी होने की बजाय यथास्थिति को कायम रखने वाला ज्यादा है।
 
इससे कुछ प्रश्न उठते हैं। क्या राजनीतिक नतीजों का डर इतना बड़ा है कि पूर्ण बहुमत वाली सरकार भी भारत में चीजें बदलने से घबराए? क्या भारतीय उन नेताओं को पुरस्कृत करते हैं, जो सबकुछ बदलने से बचते हैं? या हम भारतीयों को वाकई लगता है कि बजट गलत चीजों को सुधारने की बजाय खैरात बांटने का समय है? या वाकई हम उन चीजों की परवाह नहीं करते जो महत्वपूर्ण तो है पर हमारा मनोरंजन नहीं करतीं? मसलन, एक प्रतिमा के लिए 200 करोड़ रुपए का आवंटन ट्विटर पर घंटों चला। मुझे यकीन है कि यह विवादास्पद मामला है तथा इस पर और बहस होनी चाहिए।
 
मगर यदि हम गोपी के वेतन के संदर्भ में देखें तो यह ऐसी ही बात है कि जो व्यक्ति साल में 18 लाख खर्च करता है उसके 200 रुपए के खर्च पर हम दिनभर चर्चा करते रहें। यदि नागरिकों को ही अपनी प्राथमिकताओं का पता न हो सरकार क्यों परवाह करेगी? हमें अपनी वित्तीय दुर्दशा का हल तो निकालना ही होगा। जरूरत तो व्यापक व्यावसायिक गतिविधियों को (इसे सरकार व बिज़नेस की सांठगांठ न समझें) समर्थन के ठोस संकेत देेने की है। कम व समान दरों वाले सरल से जीएसटी से बात बन सकती है। कैपिटल गैन्स टैक्स को कम करने या शायद पूरी तरह खत्म करके (इससे राजस्व का जो नुकसान होगा, उससे कहीं ज्यादा फायदा होगा) भारत को निवेश के लिए आकर्षक देश बनाया जा सकता है। दुनिया के श्रेष्ठ वित्तीय केंद्रों जितने ही मुक्त और आधुनिक विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) बनाने से भी मदद मिल सकती है। उदाहरण के लिए यदि हम सीमांध्र को उसके किसी शहर को सिंगापुर जैसा बनाने की इजाजत दें तो यह नए राज्य के लिए अद्भुत तोहफा होगा।
 
फिर सरकार अपनी बेकार पड़ी संपत्तियों को बेच सकती है। मसलन, सरकार इतनी जमीन दबाकर क्यों बैठी है खासतौर पर तब जब यह लगभग कर्ज के दुष्चक्र में फंस चुकी है? क्या सरकार के लिए हर ट्रेन चलाना जरूरी है? यह बजट इन सब चीजों को उस हद तक नहीं समझाता, जितना जरूरी है। 
 
अब उम्मीद ही की जा सकती है कि नियंत्रण बनाए रखने की इच्छा, आमूल बदलाव लाने में झिझक और राजनीतिक नतीजों के डर से उपजी असुरक्षितता सरकार को अपनी पूरी क्षमता से काम करने से रोकेगी नहीं। वास्तविकता तो यह है कि क्रांंतिकारी लेकिन अच्छे फैसलों को परंपरागत व सोशल मीडिया पर जबर्दस्त समर्थन मिलेगा। दो माह पुरानी सरकार बहुत बचकर काम कर रही है। आज जोखिम न लेना, सबसे बड़ा जोखिम है। जाओ, कुछ करके दिखाओ। भारत इंतजार कर रहा है।
 
 
- चेतन भगत ( लेखक अंग्रेजी के प्रसिद्ध युवा उपन्यासकार हैं)
साभारः दैनिक भास्कर