स्कूल कैसे आए छात्र, कौन करेगा तय

दिल्ली से सटे नोएडा स्थित एक निजी स्कूल की कक्षा दो की छात्रा रिम्पी (परिवर्तित) बीते दिनों स्कूल से घर लौटते ही एक नयी जिद पकड़ कर बैठ गई। कहने लगी कि कल से मैं स्कूल रिक्शा से नहीं बल्कि जाउंगी बल्कि स्कूल वैन या स्कूल बस से जाउंगी। रिम्पी की मां श्वेता (परिवर्तित) को लगा कि रिम्पी हमेशा की भांति थोड़ी ही देर में यह जिद भी भूल जाएगी, लेकिन रिम्पी थी कि मानने को तैयार ही नहीं हो रही थी। थककर श्वेता ने रिम्पी की बात मान ली और उसे स्कूल वैन अथवा स्कूल बस से भेजने को राजी हो गई। लेकिन उन्होंने रिम्पी से पहले इस जिद का कारण बताने को कहा। दरअसल, रिम्पी का घर स्कूल के पास ही है और उसके घर के पास कोई स्कूल बस भी नहीं आती। यहां तक कि रिम्पी के साथ के अन्य बच्चे भी रिक्शे पर ही स्कूल जाते थे। रिम्पी ने जब अपनी इस जिद का कारण बताया तो श्वेता अवाक रह गई। श्वेता को 7 वर्षीय अपनी पुत्री से इस जवाब की उम्मीद कतई नहीं थी। दरअसल, रिम्पी ने रिक्शा से स्कूल न जाने के पीछे रिक्शा चालक के गरीब, अनपढ़ व बीमार रहने की दलील दी गई थी। नन्हीं रिम्पी के जवाब के बाद श्वेता को समझ में नहीं आया कि क्या उसकी बेटी इतनी बड़ी हो गई है कि गरीबी-अमीरी व पढ़े लिखे व अनपढ़ में भेद कर सके। या फिर उसे किसी ने बहकाया है। दिनभर वह इस उधेड़बुन में रही और रिम्पी के पापा (सर्वेश) के आफिस से लौटने पर सबसे पहले इसी वाकये का जिक्र छेड़ दिया।

सर्वेश को भी सहसा इस बात का यकीन नहीं हुआ कि नन्हीं रिम्पी ने अपनी मां से यह बात कही है। सर्वेश ने रिम्पी को बुलाया और बड़े प्यार से उससे रिक्शावाले के गरीब, अनपढ़ व बीमार होने के बाबत पता चलने का राज पूछा। रिम्पी ने निर्दोष भाव से यह बता दिया कि यह बात उसकी टीचर ने उसे बताया है। इसके साथ ही उसने स्कूल से मिले एक लेटर (सर्कुलर) को भी पापा के हवाले कर दिया। सर्कुलर में स्कूल की तरफ से आदेशात्मक लहजे में अभिभावकों से आग्रह किया गया था कि आगे से वह अपने बच्चों को स्कूल वैन अथवा स्कूल बस से ही भेजें। सर्वेश अभी कुछ समझ पाते तबतक रिम्पी के स्कूल में पढ़ने वाली खुशी पिता दिनेश शर्मा का फोन आया। दिनेश भी खुशी द्वारा किए जा रहे रिम्पी जैसी ही किसी जिद के बारे में पूछ रहे थे। बस फिर क्या था, रात जैसे तैसे कटी अगली सुबह लगभग एक दर्जन अभिभावक स्कूल जा पहुंचे। सभी अभिभावक यही जानना चाहते थे कि आखिर इतने सालों से बच्चे रिक्शा से स्कूल आते रहे और कोई परेशानी नहीं हुई तो फिर अचानक यह सर्कुलर क्यों। लेकिन स्कूल प्रशासन ने उनके किसी भी बात का जवाब देना बेहतर नहीं समझा और बस इतना कहते हुए कि रिक्शावालों के कारण बच्चों पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है इसलिए आगे से बच्चों को रिक्शा से स्कूल न भेजे।

दरअसल, अभिभावकों को इस बात से कतई इनकार नहीं था कि अधिकांश रिक्शा वाले गरीब अथवा अनपढ़ थे, उनकी चिंता तो बस यह थी कि रिक्शा वाला जहां प्रत्येक बच्चों से तीन सौ रूपया महीना वसूलता था वहीं स्कूल वैन वाले आठ सौ से कम नहीं लेते। इसके अतिरिक्त अभिभावकों की एक चिंता यह भी थी कि रिक्शा वाला घर-घऱ से बच्चों को ले जाता है और वापसी में घर पर ही छोड़ जाता है। जबकि स्कूल बस घर से दूर मुख्य मार्ग तक ही आती है और छोटे बच्चे वहां से अकेले नहीं आ सकते। दोनों अभिभावकों के कामकाजी होने की दशा में तो परेशानी और बढ़ जाएगी।

अब स्कूल तो स्कूल है वह भी नामी जहां दाखिला होना ही बड़ा कठिन हैं सो, उसने जो कह दिया सो कह दिया। अभिभावक स्कूल प्रशासन के इस कदम को तानाशाही बताते हुए प्रदर्शन पर बैठ गए हैं और लगभग एक सप्ताह बीत जाने के बाद भी अबतक मामले का समाधान नहीं निकल सका है। हालांकि अभिभावकों के पक्ष में यह बात अवश्य जाती है कि दाखिले के समय ऐसी कोई शर्त स्कूल प्रशासन की ओर से नहीं रखी गई थी वर्ना वे अपने बच्चों का दाखिला उस स्कूल में ही नहीं कराते। यह सही है कि निजी स्कूल होने के नाते स्कूल प्रशासन अपने हिसाब से फैसले ले सकता है लेकिन स्कूल को नए नियम बनाते समय अभिभावकों के हितों को भी ध्यान में रखना जरूरी है।

- अविनाश चंद्र

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