व्यवहार का अर्थशास्त्र

अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कार को लेकर इस बार भारतीयों की उत्सुकता कुछ ज्यादा थी। संभावित विजेता के रूप में रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन का नाम चर्चा में आ जाने की वजह से इस पर बहुत से लोगों का ध्यान अटका था कि देखें, उन्हें यह पुरस्कार मिलता है या नहीं। दिलचस्प बात यह रही कि जब अमेरिकी अर्थशास्त्री रिचर्ड थेलर का नाम घोषित हो गया और यह स्पष्ट हो गया कि रघुराम राजन को यह पुरस्कार नहीं मिला है, तब फिर बिल्कुल अलग रूप में लेकिन ठेठ भारतीय संदर्भ में यह फैसला चर्चा में आ गया। कुछ लोगों ने इस तथ्य को प्रचारित करना शुरू किया कि नोबेल पुरस्कार उस अर्थशास्त्री को मिला है जिसने मोदी सरकार के नोटबंदी वाले फैसले का समर्थन किया था। कुछ अन्य लोग यह बताने में लग गए कि उक्त प्रचार कितना झूठा है, और यह कि दो हजार का नोट छापे जाने की सूचना मिलते ही इस अर्थशास्त्री ने उस फैसले की भर्त्सना की थी।

बहरहाल, जाने-अनजाने नोबेल पुरस्कार का अवमूल्यन करने वाले इन सतही अभियानों से अलग हटकर देखें तो रिचर्ड थेलर के जिस योगदान को इस पुरस्कार ने सम्मानित किया है वह आज के दौर में खासतौर पर महत्वपूर्ण है। थेलर ने इस पारंपरिक धारणा को सफलतापूर्वक चुनौती दी कि लोगों का आर्थिक व्यवहार तर्कों और सिद्धांतों से बंधा होता है। अपने शोध के जरिए उन्होंने यह स्थापित किया कि लोगों की अपनी धारणाओं का, नैतिकता संबंधी उनकी मान्यताओं का, उनकी अपनी जरूरतों, सुविधाओं वगैरह का उनके आर्थिक फैसलों पर खासा असर होता है। यह भी कि ये फैसले अक्सर सभी स्थापित तर्कों को दरकिनार करके लिए जाते हैं। नोबेल कमिटी के शब्दों में कहा जाए तो थेलर का बड़ा योगदान यह है कि ‘उन्होंने अर्थशास्त्र को मनोविज्ञान से जोड़ा, इसे अधिक मानवीय बनाया।’ बहरहाल, थेलर का एक निष्कर्ष यह भी है कि अगर आप चाहते हैं कि लोग किसी खास व्यवहार को अपनाएं, तो उसे आसान बनाइए। मौजूदा दौर में, जब स्वच्छता जैसी स्वैच्छिक मुहिम के पीछे भी बल प्रयोग की मानसिकता बलवती होती दिखने लगी है, तब हमारी सरकार के लिए उनका यह सुझाव खास तौर पर उपयोगी हो सकता है।

साभारः नवभारत टाइम्स
https://navbharattimes.indiatimes.com/opinion/editorial/economics-of-beh...

प्रकाशित: 
लेखक: 
Category: