सुशासन और अप्रासंगिक कानूनों का समापन

भारत दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्रों में से एक है जहां लोकतांत्रिक व्यवस्था का उद्देश्य सुशासन के लिए काम करना होता है। वह सुशासन जो प्रमुख रूप से आठ अव्यवों से मिलकर
तैयार होता है। ये अव्यव हैंः
विधि का शासन अर्थात rule of law
समानता एवं समावेशन अर्थात equity and inclusiveness
भागीदारी अर्थात participation
अनुक्रियता अर्थात responsiveness
बहुमत या मतैक्यता अर्थात consensus oriented
प्रभावशीलता व दक्षता अर्थात effectiveness and efficiency
पारदर्शिता अर्थात transparency
उत्तरदायित्व अर्थात accountability
और निष्पक्ष आंकलन
आज बात विधि के शासन अर्थात Rule of law की।

सरल शब्दों में कहें तो कानून या विधि का मतलब है मनुष्य के व्यवहार को नियंत्रित और संचालित करने वाले नियमों, हिदायतों, पाबंदियों और हकों की संहिता। संविधानसम्मत आधार पर संचालित होने वाले उदारतावादी लोकतंत्रों में ‘कानून के शासन’ की धारणा प्रचलित होती है। इन व्यवस्थाओं में कानून के दायरे के बाहर कोई काम नहीं करता, न व्यक्ति और न ही सरकार। इसके पीछे कानून का उदारतावादी सिद्धांत है जिसके अनुसार कानून का उद्देश्य व्यक्ति पर पाबंदियाँ लगाना न हो कर उसकी स्वतंत्रता की गारंटी करना है।

उदारतावादी सिद्धांत मानता है कि कानून के बिना व्यक्तिगत आचरण को संयमित करना नामुमकिन हो जाएगा और एक के अधिकारों को दूसरे के हाथों हनन से बचाया नहीं जा सकेगा। इस प्रकार जॉन लॉक की भाषा में कानून का मतलब है जीवन, स्वतंत्रता और सम्पत्ति की रक्षा के लिए कानून। उदारतावादी सिद्धांत स्पष्ट करता है कि कानून के बनाने और लागू करने के तरीके कौन-कौन से होने चाहिए। उदाहरणार्थ, कानून निर्वाचित विधिकर्त्ताओं द्वारा आपसी विचार-विमर्श के द्वारा किया जाना चाहिए। दूसरे, कोई कानून पिछली तारीख़ से लागू नहीं किया जा सकता, क्योंकि उस सूरत में वह नागरिकों को उन कामों के लिए दण्डित करेगा जो तत्कालीन कानून के मुताबिक किये गये थे।

इसी तरह उदारतावादी कानून क्रूर और अमानवीय किस्म की सज़ाएँ देने के विरुद्ध होता है। राजनीतिक प्रभावों से निरपेक्ष रहने वाली एक निष्पक्ष न्यायपालिका की स्थापना की जाती है ताकि कानून की व्यवस्थित व्याख्या करते हुए पक्षकारों के बीच उसके आधार पर फ़ैसला हो सके। लेकिन, लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में बदलते समय के साथ अप्रासंगिक हो गये या न्यायपूर्ण न समझे जाने वाले कानून को रद्द करने और उसकी जगह नया बेहतर कानून बनाने की माँग करने का अधिकार भी होता है।

यदि इस प्रश्न का जवाब देश के भीतर खोजने का प्रयास किया जाए तो अनिश्चितता एवं भ्रम की स्थिति देखने को मिलती है। कई ऐसे क़ानून जो कभी इतिहास की जरूरत थें, आज भी कायम हैं। कई ऐसे क़ानून जो वर्तमान के अनुकूल बदलने या खत्म होने चाहिए, आज भी पुराने प्रारूप में ही लागू हैं। कई ऐसे क़ानून जिनके विरोधाभाषी क़ानून समय के साथ-साथ लागू किये गए लेकिन पुराना क़ानून आज भी कायम है, उन्हें खत्म किया जाना चाहिए। कानून की किताब में आज भी ब्रिटिश हुकूमत के दौरान विशेषरूप से भारतीय नागरिकों को नियंत्रित करने वाले कानून न केवल भरे पड़़े हैं बल्कि लागू भी होते हैं। जैसे कि क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट 1924। इस कानून के तहत कुछ जनजातियों को अपराधी घोषित किया गया है और पुलिस को उन्हें बिना कोई नोटिस दिए गिरफ्तार करने का अधिकार भी दिया गया है। दिल्ली में कार्यरत थिंकटैंक सेंटर फॉर सिविल सोसायटी, जनहित याचिकाओं के लिए कार्यरत कानूनी पहल आई-जस्टिस, एनआईपीएफपी व विधि लीगल पॉलिसी सेंटर द्वारा गहन शोध के बाद तैयार किए गए 100 कानूनों की सूची में कई हास्यास्पद और आश्चर्यजनक कानूनों का विवरण मिलता है।

आश्चर्य की बात यह है कि कई राज्यों की सरकारों को भी नहीं पता कि ऐसे कानून अस्तित्व में हैं और उनके राज्य में लागू होते हैं। उदाहरण के लिए पंजाब विलेज एंड स्मॉल टाउंस पेट्रोल एक्ट 1918 जो कि दिल्ली में भी लागू होता है, के मुताबिक यहां के गांवों और कस्बों में व्यस्क पुरूषों को रात में बारी बारी पेट्रोलिंग करना आवश्यक है। ऐसा न करने पर जुर्माने का भी प्रावधान है। द मद्रास लाइव स्टॉक इम्प्रूवमेट एक्ट 1940 के मुताबिक गाय का बछड़ा आगे चलकर बैल बनेगा अथवा सांड यह तय करने का अधिकार पशुपालक को नहीं बल्कि सरकार को है। सरकार द्वारा जारी लाइसेंस के अनुसार ही पशुपालक बछड़े को सांड या बैल के तौर पर अपने पास रख सकता है। सन 1916 में लागू एक ऐसा ही कानून है पंजाब मिलेट्री ट्रांसपोर्ट एक्ट। इस एक्ट के तहत सेना को यह अधिकार है कि वह परिवहन के लिए राज्य के नागरिकों के जानवर, वाहन, नाव आदि वस्तुओं को जबरन कब्जे में ले सके। मद्रास गिफ्ट गुड्स एक्ट 1961 के मुताबिक किसी व्यक्ति के पास वनस्पति तेल व दूध पाउडर की निर्धारित मात्रा से अधिक मात्रा पाए जाने पर उसके खिलाफ कार्रवाई का प्रावधान है।

सूचना का अधिकार क़ानून, बांस को पेड़ मानते हुए उसे काटने पर पाबंदी लगाने वाला क़ानून अथवा तांबे के पतले तारों को घर में रखने को अवैध मानने वाला क़ानून सहित तमाम उदाहरण हैं जो या तो अब प्रयोग में नहीं हैं अथवा नए कानूनों के तहत उनकी विस्तृत व्याख्या की जा चुकी है। इसके बावजूद ऐसे कानून कानून की किताब में जगह घेरे बैठे हैं। जिसका फायदा अगर कोई संबंधित अधिकारी गलत ढंग से उठाना चाहे तो उठा सकता है।

समय समय पर सरकारों द्वारा ऐसे कानूनों के समापन को लेकर कदम उठाए भी गए हैं। ऐसे कानूनों के खात्में की गंभीर शुरूआत वर्ष 2001 की भाजपा नीत एनडीए सरकार के दौरान देखने को मिली थी जिसे बाद में यूपीए एक व दो ने भी जारी रखा था। इसे जनता व नागरिक संगठनों के बीच बहस और शोध का मुद्दा बनाने का श्रेय वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी को जाता है। नरेंद्र मोदी ने अपने चुनावी भाषणों के दौरान पुराने व उपयोगी कानूनों को समाप्त करने का वचन दिया था और सरकार के गठन के बाद से लगभग 12 सौ कानूनों को समाप्त भी किया है। चूँकि देश में गैर-जरुरी कानूनों का मकडजाल बेहद उलझा हुआ है लिहाजा एकबार में सबको समाप्त करना बेहद मुश्किल काम है।

तमाम शोधार्थी इस विषय पर अपने सुझाव प्रस्तुत कर चुके हैं। बड़ा सवाल है कि आखिर क़ानून बनाने की प्रक्रिया में ही सुधार क्यों न हो? क़ानून बनाते समय क्यों न उससे जुड़े भविष्य और लागत सहित व्यवहारिक शोध को भी तरजीह दी जाए। कोई क़ानून लागू होने के बाद किस ढंग से काम करेगा इसको लेकर उससे जुड़े कुछ बहुआयामी पूर्व-शोध कार्यों पर क्यों न गौर किया जाय। क़ानून की ड्राफ्टिंग टीम में शोधार्थियों को भी तरजीह देकर एक स्वायत्त प्री-रिसर्च भी कराया जाना चाहिए। जिस क़ानून को लाया जा रहा है, उसका प्रमुख उद्देश्य क्या है, यह स्पष्ट शब्दों में तय होना चाहिए और उन्हीं उद्देश्यों के मानदंडों पर आगे चलकर उस क़ानून का सतत मूल्यांकन भी किया जाना चाहिए। क़ानून अपने तय उद्देश्य को प्राप्त कर रहा है अथवा नहीं कर रहा है, इसका समय-समय पर मूल्यांकन करके ही उसको आगे जारी रखना ठीक प्रतीत होता है। क़ानून को लागू कराने में लागत के सवाल पर कभी गंभीरता से चर्चा नहीं होती है। लागत का प्रश्न इसलिए कि हमें यह स्पष्ट पता हो कि क्या देकर क्या हासिल करने की नीति हम बनाने जा रहे हैं।

लागत का सही मूल्यांकन किए बिना हम क़ानून को सफल नहीं बना सकते हैं। ये तमाम सुझाव आई-जस्टिस टीम द्वारा दिए जा रहे हैं। हालांकि सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी ने 26 नवम्बर को ‘नेशनल रिपील ऑफ लॉ डे’ के तौर पर मनाने की मांग रखी है। यानी कि वर्ष में एक दिन विशेष रूप से निर्धारित हो जिस दिन कानून के निर्माता (कार्य पालिका), उसके संरक्षक (न्याय पालिका) व अनुपालन (व्यवस्थापिका) के जिम्मेदार लोग एक साथ बैठें और अप्रासंगिक एवं बेकार पड़े कानूनों को खत्म करने पर विचार करें। एक तरीका कानून बनाते समय उसके लागू रहने की समयावधि तय करने की भी है जिसे कानूनी भाषा में सनसेट क्लॉज के नाम से जाना जाता है। इस प्रावधान के तहत कानून बनने के एक निश्चित समय सीमा के बाद वह निष्प्रभावी हो जाता है। यदि सरकार को लगता है कि उक्त कानून की प्रासंगिकता बरकरार है तो वह उसे संसद में एक्सटेंड कर सकती है।

- अविनाश चंद्र (आकाशवाणी के इंद्रप्रस्थ चैनल पर प्रस्तुत वार्ता से उद्धृत)