वर्तमान ही नहीं भविष्य भी अनिश्चित है सुधारों का

पिछले कुछ समय में यूपीए सरकार की चालढाल देखने के बाद राजनीतिक और आर्थिक क्षेत्रों में यह कहा जा रहा था कि सरकार की निर्णय करने की क्षमता को लकवा मार गया है। कुछ अखबार तो यूपीए को यूनाइटेड पैरालाइजड एलाइंस भी कहने लगे हैं।लेकिन सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु ने जब अमेरिका में एक कार्य़क्रम के दौरान कहा कि अब 2014 के बाद ही आर्थिक सुधार हो पाएंगे तो बवाल मच गया। इसका मतलब यही निकाला गया कि सरकार का प्रवक्ता खुद कह रहा है कि सरकार के बचे हुए कार्यकाल में कुछ नहीं होना है ,जो  होगा वह लोकसभा चुनावों के बाद नई सरकार के आने के बाद ही होगा। बवाल होने पर बसु ने ने सफाई दी लेकिन कमान से निकला तीर ,जुबान से निकली बात को वापस नहीं लौटाया जा सकता।सो बसु की बात से तीखी बहस छिड़ गई। मनमोहन सरकार पर वार करने का कोई मौका न चूकने वाली भाजपा ने इस बयान को लेकर सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया और कहा बसु का बयान इस बात का सबूत है कि सरकार ने निर्णय लेने से कतरा रही है।सरकार के घटक किसी फैसले पर कांग्रेस का साथ देने को तैयार नहीं हैं इसलिए इस सरकार से सुशासन की उम्मीद ही नहीं की जा सकती ।अब लोकसभा चुनावों के बाद ही कुछ हो सकता है।

सरकार की निर्णय लेने में अक्षमता पर केवल सरकार के विरोधी ही सवाल उठा रहे हों ऐसा नहीं है। पिछले हफ्ते राजधानी में ईशऱ अहलूवालिया द्वारा संपादित पुस्तक  -इंडियाज एकानामिक रिफार्म्स एंड डेवलपमेंट-ऐसेज फार मनमोहन - के लोकार्पण के कार्य़क्रम का मौका था जिसमें कई बड़े बड़े अर्थशास्त्रियों ने शिरकत की।कुछ लोगों का यह भी कहना है कि यह  मनमोहन सिंह के मित्रों और शुभेच्छुओं का जमावड़ा था।  लेकिन वहां विचार व्यक्त करनेवाले अर्थशास्त्रियों ने प्रधानमंत्री की तारीफों के पुल बांधने के बजाय उन्हें आगाह किया कि उनकी अपनी सुधार की विरासत खतरे में है। सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी है और विकास को टिकाऊ बनाए रखने के लिए आवश्यक कदम नहीं उठा रही है। इससे देश का आर्थिक माहौल बिगड़ रहा है और निवेश के लिए अनुकूल माहौल बन नहीं पा रहा।शिकागो के अर्थशास्त्री और प्रधानमंत्री के मानद आर्थिक सलाहकार रघुराम जी राजन  ने विद्वत्तापूर्ण वक्तव्य में कहा कि किस तरह 1991 के सुधारों ने भारत का आर्थिक चेहरा ही बदल दिया।लेकिन अब इन विकासोन्मुख सुधारों को लकवा मार गया है।जबकि भारत को उच्चशिक्षा,सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों,भूमि और स्पैक्ट्रम जैसे  संसाधनों के आबंटन के लिए दूसरी पीढ़ी के आर्थिक सुधारों की बेहद आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि 1991 के पूर्व लाइसेंस कोटा राज की जगह  अब रिसोर्स राज आ रहा है यह रिसोर्स राज लाइसेंस कोटा राज के समर्थकों और कुछ आक्रामक उद्यमियों का अशुभ गठबंधन है। इन सुसंपर्कवाले उद्यमियों  और राजनीतिज्ञों ने खूब माल भी बनाया है।

तो प्रधानमंत्री की घोर विरोधी भाजपा से लेकर प्रधानमंत्री के समर्थकों और शुभचिंतकों तक को यह लगने लगा है कि यूपीए सरकार सुधारों के मामले में अनिर्णय के भंवर में फंस गई है।1991 के आर्थिक सुधारों के मसीहा रहे मनमोहन के प्रधानमंत्री रहते ही सुधारों पर अंकुश लग जाने का वजह हरेक की नजर में अलग –अलग है । बिल्कुल जाकि रही भावना जैसी वाला मामला है। जहां तक कांग्रेस और भाजपा का सवाल है वे तो हमेशा कि तरह तू-तू मैं –मैं पर उतर आते हैं।कांग्रेस के प्रवक्ता मनीष तिवारी इसके लिए विपक्ष को जिम्मेदार ठहराने से नहीं चूकते। वे कहते हैं कि बड़े आर्थिक सुधार हो सकते थे यदि विपक्ष साथ देता। मनीष की बात में कुछ दम तो है ही । खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश के मुद्दे पर भाजपा सरकार के खिलाफ थी ही। इसी तरह जीएसटी के मुद्दे पर भी भाजपा का अड़ियल रूख बाधा बना हुआ है। पहली बार  हाल ही में भाजपा पेंशन बिल के मुद्दे पर सरकार का साथ देने को तैयार हुई है।लेकिन भाजपा की भी अपनी शिकायतें हैं कि सरकार महत्वपूर्ण मामलों पर उससे मशविरा नहीं करती ,और न ही शिकायतों पर ध्यान देना चाहती है।जीएसटी लागू होने पर राज्यों को कुछ समय तक नुक्सान होगा उसकी भरपाई करने के मामले में केंद्र कोई मदद करने को तैयार  नहीं है।

भाजपा और कांग्रेस में आरोप युद्ध तो हमेशा ही चलता रहता है।लेकिन यूपीए की असल समस्या विपक्ष नहीं उसके अपने यूपीए के सहयोगी दल भी हैं। खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश के मुद्दे पर तो सरकार को संसद में जाने की जरूरत ही नहीं थी वह सुधार तो ममता दीदी की दीदीगिरी के कारण रूका।प्रधानमंत्री खुद गठबंधन से पैदा होने वाली समस्याओं का जिक्र कर चुके हैं।कौशिक बसु ने अपनी सफाई में दिए बयान में भी इस बात का जिक्र किया ही है कि गठबंधन सरकारों में आर्थिक सुधारों पर फैसले लेने की गति धीमी हो ही जाती है। इस तरह से प्रधानमंत्री और उनकी सरकार के आर्थिक सलाहकार आर्थिक सुधारों के न हो पाने के लिए गठबंधन की राजनीति को ही जिम्मेदार ठहरा रहे हैं।

इस लेकिन यह निष्कर्ष आंशिक सच ही है। जो कांग्रेस के चरित्र को भलिभांति जानते हैं वे मानते हैं कि सुधारों पर आधारित मनमोहनी अर्थशास्त्र का सबसे ज्यादा विरोध कांग्रेस के अंदर है जो कई कई रूपों में प्रकट होता है।यह सभी जानते हैं कि मनमोहन सरकार का रिमोट सोनिया गांधी के हाथों में है और सोनिया गांधी सुधारों पर आधारित मनमोहनी अर्थशास्त्र से कम और एनजीओ के झोलाछाप अर्थशास्त्रियों के  अर्थशास्त्र से ज्यादा प्रभावित हैं। इस अर्थशास्त्र का आधार यह है कि हर व्यक्ति एक निश्चित सुविधाओं का हकदार है खासकर  रोजगार ,शिक्षा.स्वास्थ्य ,अनाज आदि के मामले में और राज्य का कर्तव्य है कि उसे ये सुविधाएं उपलब्ध कराए ।सर्वशिक्षा अभियान, रोजगार गारंटी योजना ,ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन ,खाद्य सुरक्षा योजना आदि इसी के अलग –अलग रूप हैं। सोनिया गांधी और उनकी राष्ट्रीय सलाहकार परिषद का जोर हमेशा इस तरह के अर्थशास्त्र पर ही रहा है।आम कांग्रेसी भी यह मानता है कि इस तरह की योजनाएं ही कांग्रेस की सफलता का आधार रही हैं।लेकिन बाजारवादी अर्थशास्त्री इसे खैराती अर्थशास्त्र मानते हैं। इसके अलावा आम कांग्रेसी कार्यकर्त्ता नेहरू  और इंदिरा गांधी की विचारधारा में पल कर बड़ा होता है  जो राज्यवाद के पुरोधा रहे हैं उनकी नजर में हर आर्थिक बीमारी का इलाज सरकार है।बाजार,प्रतियोगिता आज भी उनके लिए पराए शब्द हैं।यह बात उनके समझ से परे हैं कि मुक्त व्यापार तथा वैश्विक प्रतियोगिता के लिए दरवाजे खोलकर ही अर्थव्यवस्था की बुनियादों को ज्यादा मजबूत बनाया जा सकता है।यही कारण है कि वे पेंशन ,बैंकिंग और बीमा क्षेत्र के सुधारों को लेकर बहुत उत्साहित नहीं हैं।फिर सार्वजनिक क्षेत्र के साथ उनके हित भी जुड़े हुए हैं इसलिए वे जनता के पैसे से इंडियन एयरलाइंस जैसी घाटा उगलनेवाली हवाई सेवा को भी जारी रखना चाहते हैं। सुधारवादियों का यह दर्शन उनको रास नहीं आता कि आम आदमी का भला और देश का  टिकाऊ विकास सब्सिडी लुटाकर और खैराती कार्य़क्रमों लागू करके  नहीं वरन प्रतियोगिता पर आधारित तीव्र विकास से ही संभव है। जब चीन की तरह निरंतर और तीव्र गति से विकास होता है तो वही लोगोंको गरीबी और बेरोजगारी से निजात दिला सकता है। गरीबी हटाने के नाम पर चलाए जानेवाले अनुत्पादक रोजगार कार्यक्रम न केवल सरकारी खजाने को खोखला करते हैं वरन श्रम बाजार को को भी विकृत करते हैं।

एक कडुवी सच्चाई यह है कि मनमोहन सिंह को भले ही आर्थिक सुधारों का मसीहा कहा जाता हो लेकिन असल में कांग्रेस को यह प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहा राव  की देन हैं जिन्हें उनकी कई तमाम उपलब्धियों के बावजूद कांग्रेस नेतृत्व और  आम कांग्रेसी बहुत पसंद नहीं करते। मनमोहन सिंह भले ही आर्थिक सुधारों के कितने ही बड़े समर्थक क्यों न रहे हों लेकिन यदि नरसिंहा राव का सूझबूझ और चतुराईपूर्ण मार्दर्शन और पूरा सहयोग उन्हें न मिला होता तो उनके लिए सुधारों को अंजाम दे पाना मुश्किल था।मनमोहन सिंह आर्थिक सुधार अभियान के चंद्रगुप्त थे तो नरसिंहा राव चाणक्य।लेकिन आम कांग्रेसी जिस तरह राव की बाकी विरासत को हिकारत की नजर से देखता है वैसे ही इस विरासत को भी हेय समझता है।वह नेहरू और इंदिरा गांधी के समाजवादी स्वर्ग में लौट जाना चाहता है जहां उच्च टैक्स दरों ,उच्च व्याज दरों का बोलबाली हो ,माई –बाप सरकार जनता पर खूब खर्च करती है भले ही राजकोषीय घाटा क्यों न बढ़ता रहे।जनकल्याण योजना की गंगा बहाने पर  खुले दिल से खूब खर्च करती है भले ही  यह गंगा भर्ष्ट्राचार के रेगिस्तान में सूख जाने के कारण  लोगों तक पहुंच ही न पाती हो।लेकिन आम कांग्रेसियों का यह मानना है कि ऐसी जनोन्मुख योजनाओं के कारण ही जनता पार्टी की झोली वोटों से भर देती है।ऐसे माहौल में आर्थिक सुधारों को अंजाम देना पाना संभव नहीं है। फिर मनमोहन सिंह जुझारू योद्धा किसम् के राजनेता  भी नहीं है जो अपनी सरकार की राजनीतिक स्थिरता को खतरे में जालकर अर्थिक   सुधार की लड़ाई लड़े।उन्होंने केवल एक बार अपनी सरकार को खतरे में डाला वह भारत अमेरिका एटमी संधि के लिए।

बसु भले ही 2014 के बाद की आर्थिक सुधारों की गति तेज होने की बात कर रहे हैं लेकिन इसका आधार क्या है यह कह पाना मुश्किल है।यदि कांग्रेस सत्ता में आती है तो भी अगली बार मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री रहें इसकी संभावना नहीं है। जब मनमोहन सिंह जैसा व्यक्ति सुधारों को अंजाम नहीं दे पाया तो बाकी किसी से क्या उम्मीद की जा सकती है।यदि गैर कांगेसी और क्षेत्रीय दल आए तो सुधार का अधर में लटक जाना लाजिमी है हालांकि सभी क्षेत्रीय दल सुधार विरोधी नहीं हैं।उनमें राकांपा ,बीजू जनता दल,अकाली दल,तेलुगुदेशम जैसी  पार्टियां हैं जो सुधार समर्थक हैं। तो सपा और तृणमूल जैसी सुधार विरोधी पार्टियां भी हैं लेकिन खिचड़ी सरकार में किसकी चलेगी यह कह पाना मुश्किल है। भाजपा के नेतृत्ववाली राजग कम से कम अभी तो सत्ता से बहुत दूर नजर आ रही है लेकिन वह भी सुधारों के मुद्दे पर ढुलमुल ही रही है।संघ की स्वदेशी समर्थक लाबी उसे तेजी से सुधार नहीं करने देगी। कुल मिलाकर सुधारों का वर्तमान ही नहीं भविष्य भी  बहुत अनिश्चित ही नजर आ रहा है।यह अलग बात है कि सरकार कोई भी आए  और  देरसबेर गहराता आर्थिक संकट उसे सुधारों की शरण में जाने को मजबूर कर सकता है।

- सतीश पेडणेकर

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