गरीब की थाली कितने की?

सी. रंगराजन कमेटी द्वारा गरीबी रेखा के संबंध में प्रस्तुत रिपोर्ट को लेकर विवाद मचना तय था। 30 रुपए, 32 रुपए, 35 रुपए और 47 रुपए को गरीबी का पैमाना मानना कहीं से भी तर्कसंगत प्रतीत नहीं होता है लेकिन गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले लोगों को मिलने वाली सरकारी सहायता और सब्सिडी का बाजार मूल्य निकालें तो अवश्य ही आंकड़ा 47 रुपए से कई गुना अधिक बढ़ जाएगा। यह भी सोचने वाली बात है कि आखिर "वेलफेयर" (भोजन का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, रोजगार का अधिकार, मुफ्त चिकित्सा सुविधा) के नाम पर इतना खर्च होने के बाद भी गरीबों के हाथ कुछ नहीं लगता तो क्यों न उस सिस्टम (पीडीएस/अन्य सरकारी प्रणालियों) की आलोचना की जाए जो गरीबी को मिटाने की बजाए गरीबी बढ़ाने का काम कर रही है। 
पूर्व यूपीए सरकार के दौरान तेंदुलकर कमेटी द्वारा गरीबी रेखा संबंधित रिपोर्ट प्रस्तुत किए जाने के बाद जाने माने स्तंभकार स्वामीनाथन अय्यर द्वारा लिखित यह आलेख गणितिय गणना को सरल बनाने का काम करता है। पुनर्प्रकाशित इस लेख को कृपया पढ़ें और अपने विचार प्रकट करें..   
 
एक गरीब व्यक्ति के भोजन पर कितना खर्च आता होगा? एक राजनेता का कहना है- पांच रुपए, दूसरे का कहना है- 12 रूपए। सस्ते खाने की कीमत पता करने के लिए टीवी चैनल वाले शहर के सारे ढाबों की पड़ताल कर लेते हैं। हैरत की बात नहीं कि उन्हें सस्ते से सस्ते ढाबे में भी 20-25 रूपए से कम कीमत में खाना नहीं मिला। और भारतीय वास्तविकताओं से अनभिज्ञ असंवेदनशील राजनेताओं की आलोचना शुरू हो गई। खुलासा बहुत मनोरंजक था। लेकिन हाय! इसने भी कई तथ्यों को नजर अंदाज कर दिया, और सरल लेकिन प्रमुख गणितीय गलतियां कीं।
 
इसके पूर्व, योजना आयोग के ताजा आंकड़ें 2004-05 के 37 फीसद की तुलना में देश में वर्ष 2011-12 में गरीबी के अनुपात में 22 फीसद की कमी को दर्शाते हैं। इसने एकदम से 13.80 करोड़ लोगों को अत्यंत गरीबी के स्तर से उपर उठा दिया। यह गरीबी कम करने के इतिहास के सबसे बड़े कारनामों में से एक है।
 
टीवी चैनलों के एंकर और विपक्षी नेताओं ने इसे ‘आंकड़ों की बाजीगरी’ बताया। तेंदुलकर कमेटी द्वारा गरीबी के निर्धारण के लिए शहरी क्षेत्र में रहने वाले पांच सदस्यों के परिवार की मासिक आय पांच हजार रूपए और ग्राणीण क्षेत्र में निवास करने वाले परिवार के लिए चार हजार रुपए तय की गई है। एंकर बोला, ‘विचित्र रूप से कम और अवास्तविक’।
 
मीडिया ने तेंदुलकर कमेटी की आय के मासिक स्तर का मतलब शहरी क्षेत्र में 33 रुपए प्रतिदिन प्रति व्यक्ति के रूप में लगा लिया। टीवी कैमरे यह पता करने के लिए उस ढाबे की तलाश में जुट गए जहां 33 रूपए में दो समय का खाना मिल सकता था। लेकिन जैसी कि उम्मीद थी, हर जगह जवाब ‘ना’ में ही मिला।
 
इसलिए टीवी एंकर योजना आयोग की इस निर्दयता, अज्ञानता और ठगी के लिए आलोचना करने लगे। अधिकांश ने तेंदुलकर रेखा को कूड़ा बकवास बताया।
 
तेंदुलकर की गरीबी रेखा उस विश्व बैंक की गरीबी रेखा के लगभग बराबर है जिसका प्रयोग संयुक्त राष्ट्र सहित 180 देशों द्वारा किया जाता है। वे सभी खाने की कीमत को लेकर अज्ञान नहीं हो सकते। स्पष्ट तौर पर इसका मतलब यह है कि भारतीय टीवी एंकरों की गणना में कुछ चूक अवश्य हुई है। हो सकता है कि कुछ पाठकों ने इस चूक को पकड़ लिया हो।
 
पहला, आमतौर पर ढाबे में खाने वाला व्यक्ति अकेला प्रवासी मजदूर होता है जो परिवार के साथ नहीं रहता। दिल्ली में गैर प्रशिक्षित मजदूर की न्यूनतम मजदूरी 297 रूपए प्रतिदिन सरकार द्वारा निश्चित है। आमतौर पर बाजार में न्यूनतम मजदूरी से अधिक मजदूरी ही मिलती है। इस प्रकार, एक प्रवासी मजदूर महीने में 25 दिन कार्य कर 7,500 रुपए कमाता है।
 
उसकी लागत? कमरे का मासिक किराया- 2,500 रुपए। दो बार का भोजन 30-40 रुपए प्रति भोजन की दर से – 1,800-2,400 रुपए प्रति माह। छोटे मोटे कुछ अन्य खर्चे जैसे जलेबी, फिल्म, शराब और बीड़ी – 1,000 रुपए। इसके बावजूद उसके पास 1,000-2,000 रुपए अतिरिक्त बचते हैं जिसे वह अपने घर भेजता है। (ध्यान रहेः महंगा परिवहन खर्च कुछ मामलों में बचत को समाप्त कर सकता है) कीमते शहर दर शहर अलग हो सकती हैं – यह गणना दिल्ली के एक मकान मालिक द्वारा प्रवासियों को उपलब्ध कराए जाने वाले कमरे के किराए के बाबत दी गई जानकारी पर आधारित है।
 
‘रियालिटी टीवी’ द्वारा किए जा रहे इस खुलासे से कि गरीब खाना खाने में असक्षम हैं, वास्तविक तस्वीर इतनी जुदा क्यों है? क्योंकि टीवी चैनल ये भूल गए कि प्रायः अकेले व्यक्ति ही ढाबे में खाने जाते हैं। एक अकेला व्यक्ति जो तेंदुलकर रेखा के हिसाब से 5,000 प्रति माह (औसतन 167 रुपए प्रतिदिन) कमाता है, टीवी चैनलों द्वारा बताए जा रहे 33 रुपए से पांच गुना ज्यादा कमाता है।   
 
अनेक गरीब शहरों में पूरे परिवार के साथ रहते हैं। लेकिन ऐसे परिवार आमतौर पर घर पर ही खाना पका कर खाते हैं ना कि ढाबे में। तेंदुलकर रेखा बहुत ही साधारण कैलोरी उपभोग लगभग 2,000 कैलोरी/प्रतिदिन /प्रतिव्यक्ति प्रदर्शित करता है। इसके लिए 400 ग्राम गेंहू/चावल और सौ ग्राम दाल की जरूरत पड़ती है। खुले बाजार में गेंहू की कीमत 22 रुपए प्रति किग्रा और चने के दाल की कीमत 40 रुपए प्रति किग्रा है। इस प्रकार कुल लागत 12.80 रुपए प्रतिदिन होती है जो 33 रूपए से बहुत कम है और सब्जी व ईंधन खर्च भी इसमें आराम से शामिल हो सकता है। यह जरूर है कि 5,000 प्रतिमाह में पांच सदस्यों का एक परिवार शिष्ट और जीवन यापन नहीं कर सकता। यह केवल वर्ल्ड बैंक के अति गरीबी के स्तर को पार करता है। लेकिन यह भोजन करने में असमर्थ जैसा भी नहीं है।
 
ढाबा संचालन एक व्यवसाय है। इसके संचालकों को सभी आवश्यक वस्तुएं सब्सिडी रहित मूल्य पर खरीदनी पड़ती है। अन्य लागत जैसे- किराया, कर्मचारी, नगर निगम की देनदारी, पुलिस का हफ्ता व स्वयं का लाभ भी इसमें शामिल होता है। इसलीए ढाबे के खाने की कीमत घर पर तैयार खाने से 4-5 गुना ज्यादा महंगा होता है। मैंने किसी भी टीवी चैनल के खुलासे में इन मौलिक बिंदुओं को शामिल करता नहीं देखा।
 
घर पर पकाए गए भोजन के कीमत की मेरी गणना खुले बाजार की मूल्यों पर आधारित है। लेकिन गरीबों को सब्सिडी युक्त वस्तुएं प्राप्त होती हैं। दिल्ली में, अंत्योदय (अत्यधिक गरीब) परिवार को गेंहू 2 रूपए प्रति किग्रा व अन्य बीपीएल परिवार को 4.50 रुपए प्रति किग्रा की दर से प्राप्त होता है। बीपीएल की कीमतों पर, रोज के गेंहू उपभोग का खर्च महज 1.80 रूपए और अंत्योदय की दर केवल 80 पैसे पड़ता है।  
 
कई राज्य आजकर चावल एक रूपए प्रति किलो की दर से प्रदान कर रहे हैं। इस प्रकार 400 ग्राम चावल प्रतिदिन की कीमत केवल 40 पैसे होती है। यदि सस्ते अनाज की मात्रा केवल आधे महीने के लिए ही पर्याप्त हो, तो भी ढाबे के 33 रूपए के खाने की तुलना में काफी सस्ता होगा।
 
टीवी एंकरों को इस बात पर बहस करनी चाहिए कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली कामयाब नहीं है इसलिए गरीबों को सब्सिडी युक्त खाद्य पदार्थ प्राप्त नहीं होते हैं। यदि ऐसा है तो, उन्हें खाद्य सुरक्षा बिल की भी कड़ी आलोचना करनी चाहिए। लेकिन अधिकांश बिल की जय जयकार करते हैं जैसे कि यह एक उद्धारक हो और हर हाल में फायदा पहुंचाएगा ही। यदि वे ऐसा मानते हैं तो उन्हें अपना सुर बदल लेना चाहिए और यह कहना चाहिए कि खाद्य सुरक्षा बिल पांच हजार प्रतिमाह कमाने वाले पांच सदस्यों वाले शहरी परिवार के लिए पर्याप्त (केवल महंगी मुंबई इसका अपवाद होगी) है। यह मौलिक और इमानदार गणित होगा।
 
 
 
- स्वामीनाथन एस. अंकलेसरिया अय्यर (लेखक जाने माने स्तंभकार हैं)