जान प्यारी है तो रेल यात्रा करने से पहले कई बार सोचिए

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अगर आप अक्सर रेल यात्रा करते हैं और आपको आपनी जान प्यारी है तो अगली बार आपको रेल में यात्रा करने से पहले दस बार सोचना चाहिए। कम से कम  अनिल काकोडकर समिति की रेलवे सुरक्षितता के बारे में आई रपट के बाद तो आपको चौकन्ना हो ही जाना चाहिए। एक तरह से रेल मंत्रालय के खिलाफ आरोपपत्र है यह रपट कि वह किस तरह रेलयात्रियों की जान के साथ खिलवाड कर रहा है। खराब और दोषपूर्ण रेलवे ट्रेक ,असुरक्षित खस्ताहाल कोच, बरसों पुराने रेलवे पुल,लिकिंग ब्रेक - यह हालत है रेलवे की सुरक्षितता की । तभी तो पचास प्रतिशत ट्रेन दु्र्घटनाएं पटरी से उतरने के कारण होती है तो 36 प्रतिशत अनमैन्ड लेवल क्रासिंग के कारण। इसके बावजूद भी अगर आप सही सलामत अपने गंतव्य तक पहुंच जाते हैं तो यह आपकी खुशकिस्मती है।

एटमी ऊर्जा वैज्ञानिक अनिल काकोडकर की अध्यक्षता में रेलवे की सुरक्षितता पर विचार करने के लिए बनी कमेटी की रपट आने के बाद में  बरसों से घोड़े बेचकर सोए रेलवे मंत्रालय को अब कुछ करना ही पड़ेगा। कमेटी का कहना है कि चाहे मनुष्य बल हो या मशीन,पैसा हो  कामों की पहल हर मामले में रेलवे की सुरक्षितता के साथ समझोता किया जा रहा है। 

रेलवे का सारा आधारभूत ढांचा बहुत पुराना और जर्जर हो चुका है । इसपर उसके नवीनीकरण की  कभी कोशिश  ही नहीं की गई। उससे भी बुरी बात यह है कि रेलवे के विस्तार के नाम पर उन्हीं रेलवे ट्रेकों पर नई-नई  ट्रेनें चलाई जा रही हैं। कमेटी के मुताबिक पिछले पांच सालों में पांच सौ से ज्यादा नई ट्रेनें चलाई गईं। पहले से मौजूद ट्रेनों की फ्रीक्वेंसी बढाई गई और ट्रेनों  में लगे कोचों की संख्या भी बढ़ाई गई। कमेटी का कहना है कि बिना गंभीर विचार किए केवल राजनीतिक कारणों से  हर वर्ष  इतनी बड़ी संख्या में नई ट्रेनें को शुरू करने से रेलवे की सुरक्षितता पर खराब असर पड़ा है।

उनकी अध्यक्षता में बनी  समिति ने अपनी बेबाक रपट में रोजाना भारतीय रेल में सफर करनेवाले एक करोड़ अस्सी लाख लोगों की सुरक्षा को सुनिश्चित करने की रेल मंत्रालय के क्षमता पर सवाल खड़े किए हैं। उसे पढ़ने के बाद लगता है कि इसके बावजूद केवल भाग्य के कारण भारत के रेल यात्री सुरक्षित  रहते हैं। लेकिन यदि रेल मंत्रालय की लापरवाही ऐसे ही बनी रही तो कबतक सुरक्षित रहेंगे।

वैसे पिछले कुछ वर्षों में भारतीय रेलवे की कहानी राजनीतिक हितों की बलिवेदी पर रेलयात्रियों के दूरगामी हितों की बलि चढाने की  कहानी रही है। जबसे यूपीए की सरकार आई है तबसे यह चलन और भी बढ़ गया है। उसके शासनकाल में तो हर रेलमंत्री की एक ही कोशिश रही है कि लोकहितों को नजरंदाज करके केवल लोकलुभावन रेल बजट बनाया जाए। पहले लालू रेलमंत्री थे उन्होंने कई मामलों में रेलभाड़ा कम करके भी रेल विभाग को फायदे में चलाकर दिखाया। लेकिन का फंड़ा यह था कि माल ढुलाई बढ़ा दी उससे रेलवे की आय तो बढ़ी लेकिन मालगाडियों का आवक-जावक बढ़ जाने से पुराने ट्रेक पर बोझ बढ़ गया। वे और भी खस्ताहाल हो गए लेकिन रेलवे को लाभ में दिखाकर उन्होंने खूब वाहवाही लूटी। उन्होने अपने को इस ढंग से पेश किया जैसे उन्होंने भारतीय रेलवे का कायाकल्प कर दिया हो। वे विदेशों में रेलवे व्यवस्थापन पर भाषण देने  के लिए बुलाए जाने लगे। लेकिन उन्होंने न तो रेल यात्रियों की सुरक्षितता को बढाने के लिए कुछ किया न ही  जीर्ण-शीर्ण बुनियादी ढांचे के नवीनीकरण की ही कोशिश की। इस कारण रेलवे अंदर ही अंदर ही दम तोड़ती रही। बचीखुची कसर ममता बनर्जी ने पूरी कर दी। वे रेलमंत्री बनी पर रेल मंत्रालय के बजाय कोलकता में बैठकर अपना कामकाज चलाती रहीं । उनका ध्यान  रेलवे  पर कम और पश्चिम बंगाल के चुनावों पर ज्यादा रहा । फिर सस्ती लोकप्रियता हासिल करना उनकी राजनीति का हिस्सा रहा है सो उन्होंने रेलभाड़ा बढ़ाने से  पूरी तरह परहेज किया। नतीजा यह हुआ कि कभी इतना पैसा नही आ सका कि बुनियादी ढांचे के नवीनीकरण,आधुनिकीकरण,सुरक्षितता में वृद्दि आदि सबसे जरूरी कामों के लिए न पैसा बचा न ही उनकी कभी चिंता की गई। पैसा निकलता भी कैसे ।पिछले कई वर्षों से भाड़े बढ़े ही नहीं जबकि खर्च तो बढ़ता ही जा रहा है।। काकोडकर कमेटी ने अपनी रपट में कहा है कि पिछले दस वर्षों में थोक सूचकांक 300 प्रतिशत बढ़ा लेकिन दूसरे दर्जे का भाड़ा नहीं बढ़ा। यात्री भाड़ा बढाने में इसतरह के परहेज के कारण ही रेलवे की माली हालत लगातार खस्ता होती जा रही है और इसका असर रेलवे सुरक्षितता पर भी पड़ रहा है।

ममता बनर्जी की जगह पर आए उनकी ही पार्टी के मंत्री दिनेश त्रिवेदी के पास इन सारी समस्याओं का कोई समाधान नहीं है। उसपर ममता दीदी का उनको यह निर्देश है कि रेलभाड़ा कतई न बढ़ाया जाए। ऐसे में उनके पास रेलवे के विकास के लिए सरकार से पैसा मांगने के अलावा कोई रास्ता ही नहीं बचा है। सबसे अजीब बात तो यह है कि वह भाड़ा बढ़ाकर संसाधन नहीं जुटाना चाहते और उम्मीद करते हैं कि वित्तमंत्री उनकी आर्थिक मदद करे । लेकिन वित्तमंत्री लगातार इससे इंकार कर रहे हैं। जबकि रेलमंत्री का तर्क यह है कि जो सरकार अमीरों की विमान सेवा एअर अंडिया को दीवालियापन से उबारने के लिए 17000 करोड रूपये  दे सकती है वह आम आदमी के परिवहन के साधन रेलवे को 5000 करोड़ क्यों नहीं दे सकती।

सुनने में यह तर्क बहुत अच्छे लग सकते हैं लेकिन  हकीकत से मुंह मोड़नेवाले हैं दिनेश त्रिवेदी भाड़ा बढ़ाकर संसाधन जुटाना नहीं चाहते और इस तरह से जनता को राहत देना चाहते हैं लेकिन सरकार उन्हें रेलवे के वित्तीय संकट से बचाने के लिए पैसा दे भी दे तो भी सरकार का वह पैसा तो उन्हीं टैक्सों से आनेवाला है जो वह जनता से वसूलती है। यानी सरकार को तो इस मद में नहीं तो किसी दूसरे मद में टैक्स लगाकर पैसा जुटाना ही पड़ेगा। यानी जनता पर तो बोझ पड़नेवाला है । अच्छा तो यही होगा कि जो लोग रेलवे का इस्लेमाल कर रहे हैं वही उसका बोझ भी उठाए। यूं भी यात्रियों पर भाड़े का बोझ ज्यादा न पड़े यह जितना जरूरी है उतना ही जरूरी यह है कि  चो रेलवे अपनी उद्घोषणाओं में रोजाना यात्रियों की यात्रा मंगलमय होने की कामना करती है वह यात्रा सचमुच मंगलमय हो और उनकी सुरक्षितता खतरे में न पड़े । ऐसा न हो कि रेलवे यात्रियों को गंतव्य के बजाय परलोक पहुंचानेवाला वाहन  बन जाए। यह सही है यात्री कम खर्चे में यात्रा करना चाहते हैं लेकिन वे जान जोखिम में डालकर यात्रा नहीं करना चाहते ।वे अपने चीवन की सुरक्षा के लिए थोड़ा ज्यादा पैसा खर्च कर ही सकते हैं। यूं भी  यदि रेलवे एक उद्योग के तौरपर अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती है तो उसे अपने संसाधनों से पैसा जुटाना चाहिए। यदि सरकारी उद्योग इसीतरह राजनीतिक अवसरवाद और नौकरशाही लापरवाही का शिकार होते रहे तो सरकार किस-किस उद्योग को संकट से उबारेगी आखिर सरकार के आर्थिक संसाधनों की एक सीमा तो है ही। लेकिन नेताओं को देश के आर्थिक हितों की तुलना में अपने राजनीतिक हित ज्यादा प्यारे होते है इसलिए उनसे किसी बुद्धिमानीपूर्ण फैसले की उम्मीद करना बेकार है। राजनीतिक हल्कों में चर्चा है कि पहले रेलमंत्री यह धमकी दे रहे थे यदि वित्तमंत्री उन्हें रेलवे के कायाकल्प के लिए पैसा नहीं दिया तो वे इस्तीफा दे देंगे। अब काकोड़कर समिति की रपट आने के बाद उसे अपना हथियार बना रहे हैं। वे काकोडकर समिति द्वारा रेलयात्रा की सुरक्षितता को सुनिश्चित करने के लिए  तुरंत रेलवे का आधुनिकीकरण करने की सिफाऱिश किए जाने के मुद्दे को उठाकर सरकार पर बड़ा पैकेज मांग रहे हैं। हो सकता है मजबूरी में  वित्तमंत्री को यह पैकेज देना पड़े लेकिन रेल के हालात हमें यह बताते है कि सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए रेलवे के दूरगामी हितों और यात्रियों की सुरक्षितता को जोखिम में डाला जा रहा है।

- सतीश पेडणेकर