शिक्षा में गुणवत्ता सुधार की मंशा सुखद

निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से लागू किए गए शिक्षा का अधिकार कानून के कारण देश यूनिवर्सल इनरॉल्मेंट के लक्ष्य के करीब तो पहुंच गया लेकिन गुणवत्ता युक्त शिक्षा अब भी हमारे यहां दूर की कौड़ी है। छात्रों के सीखने के स्तर व गुणवत्ता को जांचने वाले अंतर्राष्ट्रीय‘प्रोग्राम फॉर इंटरनेशनल स्टूडेंट असेसमेंट (पिसा)’कार्यक्रम में भारत 74 प्रतिभागी देशों में 72वें स्थान पर रहा। एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (एएसईआर) के मुताबिक वर्ष 2010 में सरकारी स्कूलों के चौथी कक्षा के 55.1 फीसदी बच्चे कम से कम घटाव के सवाल हल कर लेते थे, लेकिन 2014 में यह आंकड़ा घटकर 32.3 फीसदी हो गया। पांचवी कक्षा के छात्र जो भाग के सवाल लगा लेते थे उनकी संख्या 33.9 फीसदी से घटकर 20.7 फीसदी हो गई। कक्षा 5वीं और 6वीं के छात्रों द्वारा पहली और दूसरी कक्षा की हिंदी की किताब न पढ़ पाना ऐसे तमाम आंकड़ें हैं जो देश में शिक्षा की गुणवत्ता को आईना दिखाने का काम करते हैं।

ऐसे में यह जानना अत्यंत सुखद है कि देश का 88वां बजट प्रस्तुत करते हुए वित्तमंत्री शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के लिए अच्छे नियत से प्रयास करते दिखे। हालांकि नोबेल पुरस्कार विजेता प्रख्यात अर्थशास्त्री मिल्टन फ्रीडमैन के अनुसार किसी योजना की सफलता के लिए महज अच्छी नियत नहीं अच्छी नीति की आवश्यकता होती है। इसप्रकार, 2019 में होने वाले लोकसभा चुनावों के पहले अंतिम पूर्ण बजट प्रस्तुत करते समय वित्तमंत्री द्वारा की गई घोषणाएं निसंदेह अच्छी नियत की पुष्टि करती हैं लेकिन उनमें कड़े नीतिगत फैसले का आभाव भी स्पष्ट दिखाई पड़ता है। यह तब है जबकि आम धारणा यह है कि वर्तमान केंद्र सरकार लोकलुभावन फैसलों की बजाए‘कड़वी गोली’वाले फार्म्युले पर ज्यादा विश्वास करती है।

हम यह ऐसा इसलिए कह पा रहे हैं क्योंकि बजट पेश करने के दौरान वित्तमंत्री अरुण जेटली शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार पर ध्यान केंद्रीत करने की जरूरत पर जोर देते तो दिखें लेकिन इसकी प्राप्ति के लिए वह इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार के प्रयास तक ही सिमट कर रह गए। बजट में नवोदय विद्यालयों की तर्ज पर उन्होंने आदिवासी बहुल्य क्षेत्रों में एकलव्य स्कूलों’की स्थापना के प्रावधान किए वहीं 600 नए सेकेंडरी स्कूलों को खोलने की बात कही। 100 नए गर्ल्स हॉस्टलों के निर्माण की व्यवस्था की तो 4.5 लाख अध्यापकों व प्राधानाचार्यों की इन-सर्विस ट्रेनिंग का प्रावधान भी किया। इसके साथ ही 18 नए आईआईटी व एनआईटी खोलने व बीटेक के छात्रों को आईआईटी से पीएचडी करने के लिए प्रधानमंत्री रिसर्च फेलोशिप देने का प्रावधान भी किया। बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री ने स्कूलों में टेक्नोलॉजी के प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए चरणबद्ध तरीके से ब्लैक बोर्ड से डिजिटल बोर्ड की ओर शिफ्ट होने की बात कहते हुए शिक्षण संस्थानों में अनुसंधान एवं संबंधित बुनियादी ढांचे में निवेश बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया। इसके लिए रिवाइटेलाइजिंग इंफ्रास्ट्रक्चर ऐंड सिस्टम्स इन एजुकेशन (RISE) नामक पहल की भी घोषणा।

उक्त सभी की व्यवस्था के लिए बजट में कुल 85010 करोड़ रूपए का प्रावधान किया गया है जो कि पिछले वर्ष की तुलना में 3141 करोड़ रूपए अधिक है। अगले चार वर्ष के दौरान 1,00,000 करोड़ का निवेश कर उच्च शिक्षा के बुनियादी ढांचे में वृद्धि करने की भी बात कही गई है। आगामी वित्त वर्ष के लिए स्कूली शिक्षा के लिए 50 हजार करोड़ का प्रावधान किया गया है जो पिछले वर्ष की तुलना में 3 हजार करोड़ अधिक है। बाकि 35,100 करोड़ रूपए की व्यवस्था उच्च शिक्षा के मद में की गई है। सर्व शिक्षा अभियान के लिए 26,128 करोड़ की राशि का प्रावधान किया गया है जो पिछले वर्ष के 23,500 करोड़ 628 करोड़ ज्यादा है। इसी प्रकार, राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान को भी पिछले वर्ष की तुलना में 300 करोड़ रूपए अधिक देते हुए इसकी राशि को 4,213 करोड़ करने का प्रावधान किया गया है। मिड डे मिल के लिए भी 10500 करोड़ का प्रावधान किया गया है जो गत वर्ष की तुलना में 500 करोड़ अधिक है।

उच्च शिक्षा में आईआईटी को मिलने वाले कोष को 8,244.8 करोड़ से घटाकर 6,326 करोड़ कर दिया गया है। आईआईएम और यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन के बजट में भी कटौती की गई है। डिजीटल लर्निंग पर जोर होने क बावजूद ई-लर्निंग के मद में गत वर्ष किए गए 518 करोड़ की धनराशि के प्रावधान को भी कम कर 456 करोड़ किया गया है।

किसी भी समाजवादी व्यवस्था में उपरोक्त चीजें फीलगुड कराने के लिए पर्याप्त हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि अर्थव्यवस्था एक वर्ग से लेकर दूसरे वर्ग को देने जैसे रॉबिन हुड वाले प्रयासों से मजबूत नहीं होती। दुर्भाग्य से सरकारें, विशेषकर चुनावी वर्ष के दौरान ऐसा करने में ही विश्वास रखती हैं। कहने को जेटली ने बजट में कोई नया कर नहीं लगाया है किंतु चोर दरवाजे से एक प्रतिशत एजुकेशन व हेल्थ सेस के नाम पर अतिरिक्त वसूल लिया। पूर्व में यह 3 प्रतिशत था। इससे सरकार को 11 हजार करोड़ रूपए प्राप्त होने का अनुमान है।

दूसरी कक्षा से लेकर 12वीं तक की शिक्षा को एककृत करने की भी बात बजट पेश करने के दौरान की गई। इसके लिए नई योजना शुरू की जा सकती है। वर्तमान में पहली से आठवीं कक्षा तक की शिक्षा की व्यवस्था सर्वशिक्षा अभियान के तहत की जाती है, 9वीं और 10वीं के लिए राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान है। जबकि 11वीं और 12वीं के लिए अलग से कोई योजना नहीं है। नए प्रावधान के तहत पहली से 12वीं तक की शिक्षा को एक एकीकृत योजना के तहत लाया जाएगा। हालांकि 1 अप्रैल 2019 से इस योजना को लागू करने के लिए 15 मार्च से पहले कैबिनेट द्वारा मंजूर किया जाना आवश्यक होगा।

बजट में शिक्षा के क्षेत्र में निजी निवेशकों की सहायता लेने का भी जिक्र किया गया लेकिन विस्तार से इस पर कुछ भी नहीं कहा गया है। अच्छा होता यदि सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर और निजी एक्सपर्टीज को साथ लाने का प्रयास किया जाता जिससे वास्तव में गुणवत्ता युक्त शिक्षा प्रदान करने का सपना पूरा होने में मदद मिलती। इससे कर के दायरे में आने वाली राशि पर एक प्रतिशत अतिरिक्त सेस लगाने से बचने में सहायता मिलती। रिवाइटेलाइजिंग इंफ्रास्ट्रक्चर ऐंड सिस्टम्स इन एजुकेशन (RISE) को वित्तीय सहायता देने के लिए हायर एजुकेशन फाइनेंसिंग एजेंसी (एचईएफए) की मदद ली जाएगी जिसका गठन कुछ माह पूर्व ही किया गया था। यह देखना रोचक होगा कि सरकारी उच्च शिक्षा संस्थानों को कोष उपलब्ध कराने के लिए नॉन-बैंकिंग फाइनेंसिलयल कंपनी के तौर पर लाया गया एचईएफए इस पर किस प्रकार खरा उतरता है।

- संपादक

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