बच्चोँ को बेहतर शिक्षा उपलब्ध कराने हेतु स्कूल वॉउचर क्यूँ है सबसे अच्छा जरिया!

“एपीजे अब्दुल कलाम की नई पीढ़ी को आगे बढ़ने का अवसर” देने के लिए द टाइम्स ऑफ इंडिया ने 400 छात्रोँ के लिए स्कॉलरशिप की शुरुआत की है ताकि उन्हे बेहतरीन शिक्षा हासिल हो सके। यह एक सराहनीय कदम है, लेकिन देश की बढ़ती आबादी और शिक्षा प्राप्त करने के उम्मीदवार छात्रोँ को संख्या की तुलना में यह बेहद कम है। यहाँ यह कहना भी जरूरी है कि हमारे देश की आने वाली युवा पीढ़ी अच्छी शिक्षा हासिल करने और अपनी क्षमताओँ के अनुकूल अवसर पाने हेतु धर्मार्थ पर निर्भर नहीं होनी चाहिए। यह सरकार की जिम्मेदारी होनी चाहिए।

सरकारी फंड के वितरण का तरीका भी भारत के तमाम बच्चोँ का भविष्य बदल सकता है। खासतौर से, बच्चोँ के माता-पिता को डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी) अथवा स्कूल वाउचर जारी करके हर योग्य बच्चे को स्कॉलरशिप दी जा सकती है। इसके जरिए बच्चोँ को जारी वॉउचर की लिमिट में फीस लेने वाले तमाम स्कूलोँ में से अपने लिए बेहतरीन स्कूल चुनने का अवसर मिलेगा।

इसी तरह से अगर वाउचर फंडिंग शुरु हो जाए तो देश के शिथिल पड़े सरकारी स्कूल और वहाँ के शिक्षकोँ की भी जवाबदेही बढेगी, क्योंकि इन स्कूलोँ और इनके टीचर्स की सैलरी को भी स्कूल की फंडिंग से जोडा जाएगा और इससे बच्चोँ और उनके परिजनोँ के इनके प्रति आकर्षण से इनकी क्षमता का पता स्वतः ही लगाया जा सकेगा।

फंडिंग की मौजूदा व्यवस्था में सरकारी प्राथमिक स्कूलोँ में बच्चे टिकते नहीं है, तमाम स्कूल खाली पडे हुए हैं: डीआईएसई (डाइस) के आधिकारिक डाटा के अनुसार वर्ष 2011-2016 के बीच सरकारी स्कूलोँ में होने वाले कुल दाखिलोँ में 13 मिलियन की गिरावट आई है, वहीं निजी स्कूलोँ में इस संख्या में 17.5 मिलियन की वृद्धि हुई है। इस निष्क्रमण के चलते बहुत सारे सरकारी स्कूल शैक्षणिक व आर्थिक रूप से अलाभकारी बने हुए हैं। कुल सरकारी स्कूलोँ में से 40% में छात्रों की संख्या 50 से भी है।

डीबीटी के तहत, सरकार को हर बच्चे के पैरेंट्स को एक वाऊचर देना होता है जो कि एक इकरारनामा होता है और उसकी राशि इसमें लिखी होती है। अगर इस वाऊचर में 500 रुपये प्रति माह के रुप में फिक्स किया जाता है, तो इसका मतलब है कि पैरेंट्स अपने बच्चे को किसी भी ऐसे स्कूल में दाखिला दिला सकते हैं जहाँ मासिक फीस 500 रुपये तक ली जाती है, लेकिन अगर कोई इससे अधिक फीस वाले स्कूल में अपने बच्चे को भेजना चाहता है तो बाकि के पैसे अपनी जेब से वहन कर सकता है। इस व्यवस्था के तहत पैरेंट्स के पास स्कूल के चयन का भी अधिकार रहता है जिससे वह सरकारी, निजी अथवा एडेड किसी भी प्रकार के स्कूल में बच्चे को भेज सकते हैं।

तमाम देश स्कूल वाउचर योजना को लागू कर बेहतर परिणाम दिखा चुके हैं, जैसे कि कोलम्बिया, चिली, नीदरलैंड, न्यूजीलैंड, यूएस आदि। युनिवर्सल डीबीटी योजना के तहत सभी बच्चोँ को वाऊचर प्राप्त करने का अधिकार होगा, जबकि टारगेटेड योजना के तहत सिर्फ चयनित ग्रुप के बच्चे जैसे कि ‘आर्थिक रूप से कमजोर तबके’ के बच्चे ही इस लाभ के लिए योग्य माने जाएंगे।

इस तरह की पब्लिक स्कॉलरशिप बच्चोँ को शिक्षा का मौलिक अधिकार प्रदान करने का एक अलग तरीका है। मौजूदा समय में सरकारी ग्रान्ट सीधा स्कूल को मिलता है, लेकिन वाऊचर स्कीम के तहत यह पैसा पैरेंट्स के माध्यम से स्कूल को मिलेगा। दूसरा, वाउचर स्कीम के तहत स्कूल को प्रति बच्चे के हिसाब से पैसा मिलेगा जबकि मौजूदा स्कीम में हर सरकारी-फंडेड स्कूल को एकमुश्त राशि मिलती है (जो आमतौर पर शिक्षकोँ की कुल तनख्वाह के बराबर होती है) न कि छात्रोँ की संख्या के आधार पर, जो कि अक्षमता का एक बड़ा कारण है।

वाऊचर स्कीम की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह पैरेंट्स को चयन का अधिकार देती है। अगर वे स्कूल से असंतुष्ट होंगे तो इसके जरिए वे अपने बच्चे कभी भी एक स्कूल से निकाल कर दूसरे स्कूल में डाल सकते हैं, जिससे स्कूल को मिलने वाला पैसा भी बन्द हो जाएगा, ऐसे में स्कूलोँ की जवाबदेही बढ़ती है। स्कूल बच्चोँ और उनके पैरेंट्स का आकर्षण बनाए रखने के लिए अच्छे रिजल्ट देने को बाधित होंगे।
वाऊचर स्कीम के तहत शिक्षा में समानता भी बढ़ेगी, क्योंकि इसके तहत कम आयवर्ग के बच्चोँ के लिए अधिक कीमत वाले वाऊचर की व्यवस्था होगी, न कि सभी बच्चोँ के लिए एक युनिफॉर्म वाऊचर दिया जाएगा।

शिक्षा में डीबीटी लागू करने को लेकर सरकार की दो मुख्य आपत्तियाँ हैं। पहली आपत्ति इसलिये है, क्योंकि सरकार का मानना है कि पिछ्ड़े ग्रामीण इलाकोँ के स्कूल सरकारी वाउचर फंडिंग के लोभ में भी आगे नहीं आएंगे। हालांकि यह डर बेबुनियाद है। नेशनल सैम्पल सर्वे डाटा 2014-15 के अनुसार गैर सहायता प्राप्त निजी प्राथमिक स्कूलोँ की औसत फीस ग्रामीण इलाकोँ में 292 रुपये प्रति माह और शहरी इलाकोँ में 542 रुपये प्रति माह थी। इस सर्वे के मुताबिक भारत के गैरसहायता प्राप्त स्कूलों में पढ़ने वाले 25% बच्चोँ ने 200 रुपये प्रति माह से कम फीस भरी थी, (57% ने 500 प्रति माह से कम फीस भरी थी, 82% ने 1000 प्रति माह से कम फीस भरा था और सिर्फ 3.6% ने 2,500 रुपये प्रति माह से अधिक फीस भरी थी)। इसका मतलब है कि 25% निजी स्कूल 200 रुपये प्रति माह से कम फीस ले रहे हैं, जो कि 500 रुपये कीमत के वाउचर की तुलना में बेहद कम है। ऐसे में ग्रामीण इलाकोँ के स्कूलोँ के लिए इस योजना में शामिल होना फायदेमंद होगा और वे अपने स्कूल की शिक्षा व्यवस्था को और सुदृढ़ बना सकेंगे।

मानव संसाधन विकास मंत्रालय की डीबीटी योजना को लेकर जो दूसरी समस्या है, वह है सरकारी स्कूलोँ का खाली होना-सरकार का मानना है कि जिन सरकारी स्कूलोँ मे बेहद कम बच्चे हैं, उनको डीबीटी के तहत बहुत कम पैसा मिल पाएगा और ऐसे में वे अपने शिक्षकोँ की तनख्वाह भी नहीं दे सकेंगे। दूसरी ओर केंद्र व राज्य सरकारेँ पहले ही स्कूलोँ के एकीकरण पर विचार कर रही हैं, छोटे स्कूलोँ को नजदीक के बड़े स्कूल के साथ मिलाने और जहाँ कम बच्चे हैं उन स्कूलोँ के शिक्षकोँ को अधिक बच्चोँ वाले स्कूलोँ में नियुक्त करने की बात चल रही है।

हालांकि परिवर्तन काल में कुछ समय तक शिक्षकोँ के वेतन हेतु वाउचर से होने वाली आय के अतिरिक्त भी प्राकृतिक क्षति (रिटायरमेंट) के साथ भुगतान करना पड़ सकता है लेकिन वक्त के साथ यह समस्या खत्म हो जायेगी। एक दूसरा समाधान यह है कि सरकारी और निजी स्कूलोँ के लिए अलग-अलग कीमत के वाउचर फिक्स किए जाएँ, चूंकि सरकारी स्कूलोँ का खर्च 2017-18 में प्राथमिक स्तर पर 2,500 प्रति छात्र/माह और उच्चतर प्राइमरी स्कूलोँ में प्रति छात्र/माह 3,300 रुपये का खर्च है (देखेँ तमिलनाडु का जुलाई 2017 का गैजेट), जो कि औसत प्राइवेट स्कूलोँ की फीस से कई गुना अधिक है।
कठिन समस्याओं के समाधान के लिए बोल्ड कदम उठाने पडते हैं। मौजूदा सिस्टम में जोड़-तोड़ करने से स्कूली शिक्षा में सुधार नहीं आने वाला है और न ही अच्छे संसाधन (संसाधन और प्रशिक्षित स्टाफ) मुहैया कराने से ही कोई खास असर दिखने वाला है। समस्या का समाधान सम्भव होगा स्कूल और शिक्षकोँ की जवाबदेही तय होने से और डीबीटी वाउचर फंडिंग इस समस्या को सुलझा सकती है, साथ ही इसके जरिए देशभर जे बच्चोँ को स्कॉलरशिप मुहैया हो सकती है।

- प्रो. गीता गांधी किंगडन

https://blogs.timesofindia.indiatimes.com/toi-edit-page/a-scholarship-fo...

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