‘तादाद की गुणवत्ता’ और शिक्षा की दुर्दशा

किसी मेहमान के लिए मेज़बान के मूंह पर इतनी बड़ी बात और वह भी बेबाकी से कहने की घटना बिरले ही सुनने में आती है जैसा कि भारत के मेहमान सिंगापुर के डिप्युटी प्राइम मिनिस्टर थर्मन शन्मुगरत्नम ने हमारे देश में भरी सभा में कह दी। दिल्ली के विज्ञान भवन में बोलते हुए उन्होंने कहा कि ‘‘भारत में स्कूलों की भारी कमी है" और "यह वह कमी है जिसे उचित नहीं ठहराया जा सकता है।" बेशक, मेहमान ने कोई नई बात नहीं कही पर जिस संदर्भ में यह बात कही गई वह गौरतलब है। उनका कहना है, ‘‘भारत और ईस्ट एशिया के देशों में सबसे बड़ा अंतर’ ख़ास्ताहाल शिक्षा का है। भारत की मौजूदा शिक्षा व्यवस्था कतई स्वीकार्य नहीं है। इसकी वजह से देश की महत्वाकांक्षा शायद कभी पूरी न हो।

जहां तक ‘तादाद की गुणवत्ता’ का सवाल है बीते दशक की असर (एएसईआर) रिपोर्ट से इसकी दुर्दशा बिल्कुल स्पष्ट हो जाती है। असर 2004 में बताया गया है कि सरकारी स्कूलों के कक्षा 2 से 5 के 10 में चार बच्चे लेवेल 1 के बेसिक टेक्स्ट नहीं पढ़ सकते और 10 में छह से अधिक बच्चे लेवेल 2 के टेक्स्ट नहीं पढ़ सकते। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि 10 में पांच बच्चे घटाव या भाग का गणित नहीं कर सकते। असर 2014 में यह भी उल्लेख है कि कक्षा 5 के 10 में पांच से अधिक - और कक्षा 8 के एक तिहाई से अधिक बच्चे कक्षा 2 के टेक्स्ट नहीं पढ़ सकते। कक्षा 5 के 26 फीसद से कुछ ज़्यादा बच्चे ही गुणा कर सकते और कक्षा 8 के केवल 44 प्रतिशत तीन अंकों का भाग कर सकते हैं। परिणाम जान कर आपके माथे की लकीरें गहराना लाज़मी है। असर रिपोर्ट 2014 में 'प्रथम' के माधव चवन की यह टिप्पणी और कड़वी है कि ‘‘बीते एक दशक में करोड़ों बच्चे पढ़ने और गणित करने की बुनियादी जानकारी हासिल किए बिना स्कूलों से पढ़ कर निकलते रहे।’’

ऐसा नहीं है कि शिक्षा के क्षेत्र में धनराशि नहीं खर्च की जा रही है! दरअसल वर्ष 2004 से लेकर 2014 के बीच केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा कुल मिलाकर 84,111 करोड़ रु. से चौगुना बढ़कर 3,95,000 करोड़ रु. खर्च किए गए। फिर भी भारत में गुणवत्ता और तादात से संबंधित परिणाम में टलते रहे। कोठारी आयोग की सिफारिशें आने के पांच दशक बाद भी ड्रॉपआउट का मसला ज्यों का त्यों बना है। एचआरडी मंत्रालय ने हाल ही में संसद में बताया कि 2013-14 में प्राइमरी लेवेल पर 62 लाख से अधिक ड्रॉपआउट के मामले दर्ज किए गए। यह नाकामी गांव-देहात में अधिक दिखती है जहां 35 फीसद से अधिक लोग आज भी निरक्षर हैं, 14 प्रतिशत को प्राइमरी से नीचे स्तर की शिक्षा है और 100 में केवल तीन लोग ग्रैजुएट हैं।
विडंबना यह है कि सरकार के स्कूलों पर खर्च बढ़ाने के बावजूद अधिक से अधिक माता-पिता बच्चों को प्राइवेट स्कूल में भेज रहे हैं। 2005 में 16 प्रतिशत बच्चे प्राइवेट स्कूल जाते थे और 2015 में यह 30 प्रतिशत हो गया। 2020 तक इसके 50 प्रतिशत होने की संभावना है। एनएसएसओ के अनुसार, हर चौथा बच्चा प्राइवेट कोचिंग क्लास भी जाता है। हालांकि बच्चों को पढ़ाने के सरकारी प्रोग्राम की कोई कमी नहीं है। उदाहरण के तौर पर सर्व शिक्षा अभियान, राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान, राष्ट्रीय उच्च शिक्षा अभियान, पढ़े भारत बढ़े भारत, मॉडल स्कूल स्कीम आदि। 

सरकारी स्कूलों के बच्चों का प्रदर्शन संख्या और गुणवत्ता दोनों मानकों पर हतोत्साहित करता है। जरा सोचिए : भारत के एक लाख से अधिक स्कूलों में केवल एक शिक्षक हैं। मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान में एक शिक्षक वाले स्कूलों की संख्या 48,000 से अधिक है। पूरे भारत में 5 लाख से अधिक शिक्षकों के पद खाली हैं। और जो स्कूलों में शिक्षक हैं भी तो नदारद बताए जाते हैं। वर्ल्ड बैंक के अध्ययन बताते हैं कि चार में एक शिक्षक तो अक्सर गायब रहते हैं। ये स्कूल से गैरहाजिर ही नहीं बल्कि कर्तव्य के प्रति गैरजिम्मेदार भी हैं। उनके स्कूल में मौजूद होने का खास अर्थ नहीं होता क्योंकि उनके सामने बस सिलेबस खत्म करने का लक्ष्य रखा जाता है भले ही बच्चों की पढ़ाई के परिणाम जैसे भी हों।

भारतीय सरकारें शिक्षा की दुर्दशा के लिए पिछले कई दशकों से एक के ऊपर एक बहाने ढूंढ़ती रही हैं जैसे कि देश में विविधता, जटिलता और फिर अथाह जनसंख्या यहां तक कि संसाधनों का अभाव भी। लेकिन थाइलैंड और इंडोनेशिया जैसी हम से बहुत छोटी अर्थव्यवस्थाओं ने हम से कम संसाधन रहते हुए भारत को शर्मिंदगी का अहसास करा दिया है। इन दोनों देशों की साक्षरता दरें क्रमशः 94 प्रतिषत और 84 प्रतिषत हैं और ये आंकड़े नए मिलेनियम की शुरुआत से बहुत पहले के हैं। जहां तक अथाह आबादी की बात है चीन की साक्षरता दर 1980 में भी आज के भारत से अधिक थी। और बात संसाधन की भी नहीं है जो भारत में ही केरल मॉडल से साबित हो गया है। इस राज्य ने तो हर दशक में न केवल भारत बल्कि चीन को पीछे छोड़ा है। 

शिक्षा परिदृष्य में सड़ांध पैदा होने की दो साफ वजहें हैं - जिम्मेदारी से मुंह मोड़ना और ऑटोनोमी का अभाव। व्यवस्थाजन्य समस्याएं इस वजह से और बढ़ जाती हैं कि शिक्षा को कंकरेंट लिस्ट में रखा गया है। प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग (1966) का यह अवलोकन था कि संविधान के तहत राज्य सरकार के कंकरेंट लिस्ट में मौजूद विषयों पर केंद्र सरकार की भूमिका एक ‘पॉयनियर, गाइड, सूचना प्रसारक, प्लानर और इवैल्युएटर’ की हो। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और शिक्षा को कंकरेंट लिस्ट में रख दिया गया। जहां तक स्कूलों के परिचालन की बात है सीखने के परिणाम पर ध्यान देने की बजाय पूरा ध्यान बिल्डिंग और बजट पर दिया गया। इस बीच राज्यों और स्कूलों की ऑटोनोमी की बार-बार मांग उठने लगी। जिम्मेदारी और ऑटोनोमी का तर्क मान लिया गया और अन्यत्र इसकी सफलता से यह तर्क सत्यापित भी हो गया। पर बदलाव का प्रयास कुंद कर दिया गया। 

शिक्षा व्यवस्था की भयानक नाकामी के कई कारण हैं - राजनीतिक गुटों के लापरवाह अंदाज से लेकर बच्चों के ज्ञान का स्तर निर्धारित करने की जटिल समस्याएं। बीते दषक की नाकामी के मद्देनजर लोगों की मनोदषा यही कहती है कि सरकार इस कारोबार से हाथ खींच ले। लेकिन इस दिषा में सही कदम के रूप में हमारा पहला सिद्धांत संरचनात्मक त्रुटियों को दूर करना हो। केंद्र को चाहिए कि राज्यों को पॉलिसी के मामले में ऑटोनोमी दे। इससे सीखने के बेहतर परिणाम आसानी से मिलेंगे। राज्य सरकारें भी यह ऑटोनोमी स्थानीय सरकारों को दें ताकि यह लक्ष्य जमीनी स्तर पर पूरा हो। 

जहां तक काम-काज की बात है स्कूलों, शिक्षकों और सरकारों को तकनीकी अपनानी होगी। स्कूलों से शिक्षकों का नदारद रहना तो लगा रहेगा पर वर्चुअल टीचिंग इस समस्या का करारा जवाब होगा। इस उद्देष्य से बच्चों का ध्यान रखने के लिए स्थानीय लोग नियुक्त किए जा सकते हैं। और कितना अच्छा हो कि स्कूल करिकुलम में स्किल्स ट्रेनिंग को जगह मिल जाए?
स्कूलों और शिक्षकों को इंसेंटिव देना भी इस दिशा में बड़ा कदम हो सकता है? आज भाजपा की सरकार दर्जन भर राज्यों में है। यह सुनहरे भविष्य के लिए निवेश करने का इसके लिए अवसर है। और नीति आयोग से भी तो मदद ले सकते हैं? इन राज्यों के मुख्य मंत्रियों पर दबाव बनाया जा सकता है कि वे इनोवेशन के मॉडल तैयार करें ताकि ज्ञान का अधिक से अधिक प्रचार-प्रसार हो। 

महत्वाकांक्षा अच्छी बात है। रिफॉर्म, परफॉर्म और ट्रांसफार्म की हो तो और अच्छा! और इसके लिए शिक्षा जगत से बेहतर क्या हो! यहां मोदी सरकार को लेकर शन्मुगरतनम की एक टिप्पणी का उल्लेख आवष्यक है। उन्होंने खुले मन से कहा कि मोदी सरकार विकेट पर डटी है पर अब जरूरत एक-एक रन लेने की नहीं बल्कि चौके-छक्के लगाने की है। धीरे-धीरे कदम बढ़ाने की जगह बुनियादी बदलाव लाने के इस सुझाव के पीछे शन्मुगरतनम की निस्संदेह एक अच्छी मंशा है और इससे अच्छा अवसर भी भला क्या हो!

शंकर अय्यर, ‘एक्सिडेंटल इंडिया : ए हिस्ट्री ऑफ द नेशंस पैसेज़ थ्रू क्राइसिस एण्ड चेंज़’ के लेखक हैं।
साभारः द न्यू इंडियन एक्सप्रेस

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