शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने में डायरेक्ट कैश ट्रांसफर से मिलेगी कामयाबी

संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों में शिक्षा के अधिकार को शामिल किए जाने के बाद एक बार वह पुराना सवाल फिर उठने लगा है। सवाल यह कि देश के सभी बच्चों को एक समान शिक्षा का अधिकार मिलना ही चाहिए। 1935 में जब भारत सरकार अधिनियम के तहत गठित राज्यों की सरकारों को जिन आठ विषयों पर शासन करने का अधिकार तत्कालीन अंग्रेज सरकार ने दिया था, उनमें से एक अधिकार शिक्षा व्यवस्था का भी संचालन था। गांधीजी को तब आने वाली चुनौतियों का पता था, इसीलिए उन्होंने डॉक्टर जाकिर हुसैन की अध्यक्षता में राज्यों की शिक्षा व्यवस्था कैसी हो, इस पर विचार करने की जिम्मेदारी दी थी। गांधी जी ने खुद भी इस पर आधार पत्र लिखा था, जिसके आधार पर 1937 में वर्धा में आयोजित बैठक में जिस बुनियादी शिक्षा व्यवस्था की कल्पना की, उसमें भी सभी बच्चों को प्राथमिक शिक्षा एक समान देने पर जोर था। उस व्यवस्था का मकसद देश के सभी बच्चों को एक समान बेहतर शिक्षा व्यवस्था देना था। आजादी के बाद सरकारी विद्यालयों की संख्या में जो विस्तार हुआ, उसके मूल में भी यही विचार था। लेकिन आजादी के सत्तर साल बाद हालत यह है कि सरकारी विद्यालयों में गुणवत्तायुक्त शिक्षा नहीं मिल रही है। उनकी तुलना में निजी स्कूलों में प्राथमिक शिक्षा कहीं ज्यादा बेहतर तरीके से मिल रही है। ऐसे में सवाल यह है कि जब सरकारी स्कूल बेहतर शिक्षा दे ही नहीं सकते तो उनकी जरूरत ही क्यों होनी चाहिए।

भारत में शासन व्यवस्था चलाने के लिए संविधान में तीन सूचियों का प्रावधान है। संघ सूची के तहत जहां केंद्र सरकार की जिम्मेदारी वाले विषय आते हैं, वहीं राज्य सूची के तहत राज्यों के जरिए व्यवस्था वाले विषय हैं। दोनों ही सूची के विषयों से मिले अधिकारों में केंद्र या राज्य सरकारें अपनी सीमाएं नहीं लांघ सकतीं। लेकिन शिक्षा का विषय तीसरी यानी समवर्ती सूची में शामिल है। यानी शिक्षा की व्यवस्था राज्य और केंद्र अपने-अपने तरीके से कर सकते हैं और अगर विवाद हुआ तो संघ यानी केंद्र सरकार के बनाए कानून और व्यवस्था ही राज्यों पर भी लागू होंगे। बहुरंगी समाज व्यवस्था के चलते संविधान निर्माताओं ने शायद शिक्षा को समवर्ती सूची में रखा, लेकिन आज शिक्षा व्यवस्था में गुणवत्ता के स्तर पर जितना उतार-चढ़ाव है, उसके पीछे कहीं न कहीं इस संवैधानिक व्यवस्था का भी हाथ है।

बेशक सरकारी स्कूलों में योग्य अध्यापक हैं, उन्हें वेतन आयोग की सिफारिशों के मुताबिक वेतन भी मिलता है। जो कई बार निजी शिक्षा संस्थानों के मुकाबले कई गुना तक ज्यादा होता है। लेकिन उनके यहां शिक्षा व्यवस्था बेहद खराब है। इतनी खराब है कि आज दिहाड़ी तक पर काम करने वाला आम भारतीय भी सरकारी विद्यालयों में अपने बच्चों को डालने से बच रहा है। दिल्ली सरकार एक बच्चे पर कितना खर्च करती है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 2015-16 के आंकड़ों के मुताबिक उसने प्रति बच्चा 24 से लेकर 30 हजार रूपए सालाना खर्च किए। ध्यान रहे, इस खर्च में बिल्डिंग निर्माण या बिजली बिल जैसे खर्च शामिल नहीं हैं। इसी तरह महाराष्ट्र सरकार ने इसी सत्र में प्रति छात्र 95-96 हजार सालाना खर्च किए। पश्चिम बंगाल और बिहार जैसे राज्य भी पंद्रह से लेकर बीस हजार सालाना तक प्रति छात्र अपने बजट का खर्च कर रहे हैं। इसके बावजूद इन स्कूलों से निकले ज्यादातर बच्चों का शैक्षिक स्तर बेहतर नहीं है। राज्यों के कुछ एक सरकारी स्कूलों को बतौर अपवाद छोड़ दें तो ज्यादातर का शैक्षिक रिकॉर्ड और उनसे निकले बच्चों का स्तर निजी स्कूलों के बच्चों के मुकाबले कमतर है। 

यह सच है कि रोजी-रोजगार में अंग्रेजी की बढ़ती मांग के चलते गली-मुहल्ले या सुदूर देहाती इलाके तक में खुले कथित पब्लिक स्कूलों की मांग बढ़ी है। लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि सरकारी स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था में गिरावट और अध्यापकों में बढ़ती गैर जिम्मेदारी ने भी इन स्कूलों को बढ़ावा मिला है। ऐसे में सवाल यह है कि करदाताओं के पैसे खर्च होने के बावजूद अगर अच्छी शिक्षा नहीं मिल पा रही हो तो क्या उपाय किया जाना चाहिए। सेंटर फॉर सिविल सोसायटी जैसे संगठन इसके लिए नायाब सुझाव दे रहे हैं। जिस तरह सब्सिडी में बढ़ते भ्रष्टाचार पर काबू पाने के लिए सरकार ने सीधे नकद स्थानांतरण यानी डाइरेक्ट टैक्स ट्रांसफर का तरीका विकसित किया, उसी तर्ज पर अब बच्चों को भी सरकार की तरफ से सीधे कैश ट्रांसफर की सुविधा देने की मांग की जा रही है। शिक्षा में दलितों और पिछड़े वर्ग के छात्रों की छात्रवृत्ति की रकम को सीधे कैश ट्रांसफर के जरिए देने वाली व्यवस्था कामयाब रही है। इसका असर यह हुआ है कि सही और जरूरत मंद तक छात्रवृत्ति पहुंच रही है और उसमें कोई कटौती नहीं हो पा रही है। इसके साथ ही व्यवस्था में पारदर्शिता भी आई है।

सेंटर फॉर सिविल सोसायटी के विशेषज्ञों का तर्क है कि अगर फीस की रकम भी सीधे छात्रों या उनके अभिभावकों को दी जाएगी तो वे उसी पैसे का इस्तेमाल अपने बच्चे के लिए बेहतर स्कूल का चुनाव करने में करेंगे। फिर सरकारी स्कूलों की फीस भी निजी स्कूलों जितनी की जा सकती है। इसके बाद सरकारी स्कूलों को भी निजी स्कूलों से स्वस्थ प्रतियोगिता के लिए प्रेरित किया जाना होगा। उन्हें तरजीह देने की नीति पर पुनर्विचार करना होगा। तब सरकारी स्कूलों में दाखिला घटेगा तो उनके यहां भी गुणवत्ता युक्त शिक्षा देने का  दबाव बढ़ेगा। इससे निश्चित तौर पर शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार होगा। तब कर दाताओं की रकम का सही इस्तेमाल भी हो सकेगा और जिस ज्ञान आधारित भारतीय समाज बनाने का सपना देखा जा रहा है, उसे बनाना भी आसान होगा।

- उमेश चतुर्वेदी
लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं।