फीस नियंत्रण की बजाए गुणवत्ता युक्त शिक्षा का प्रावधान कीजिए

निजी स्कूलों की मनमानी फीस बढ़ोत्तरी और उस पर उत्तर प्रदेश की योगी सरकार की तरफ से की जा रही कार्रवाई इन दिनों चर्चा में है। बेशक निजी स्कूलों को मनमाने ढंग से फीस में बढ़ोत्तरी को अनुमति नहीं दी जा सकती। लेकिन फीस बढ़ोतरी नियंत्रित कैसे हो इसके तरीके अलग अलग हो सकते  हैं। निजी स्कूलों के फीस नियंत्रण पर चर्चा करने से पहले एक अहम सवाल यह है कि छठवें और सातवें वेतन आयोग के बाद अध्यापकों के वेतन में जो बढ़ोत्तरी हुई है, क्या उसी अनुपात में सरकारी स्कूलों की शिक्षा का स्तर भी बढ़ा है? जब तक इन सवालों पर विचार नहीं किया जाएगा, सरकारी स्कूलों की शैक्षिक व्यवस्था को सुधारा नहीं जाएगा, निजी स्कूलों की फीस बढ़ोत्तरी को सवालों के कठघरे में खड़ा करना भी अनुचित ही माना जाना चाहिए। लेकिन निजी स्कूलों की फीस बढ़ोत्तरी पर हो रहे बवाल के बीच खासकर सरकारी शिक्षा से जुड़े बुनियादी सवालों को लगातार नजरंदाज किया जा रहा है।

बेशक छठवें और सातवें वेतन आयोग के पहले तक भारतीय शिक्षकों का वेतन सम्मानजनक हालत में नहीं था। लेकिन छठवें वेतन आयोग ने शिक्षकों को तनख्वाह के स्तर पर सम्मान जरूर दिया है। यूनिवर्सिटी कॉलेज, लंदन में शिक्षा पर अध्ययन-अध्यापन कर रहीं गीता गांधी किंग्डन ने कुछ देशों की प्रति व्यक्ति आय और वहां शिक्षकों को मिलने वाले वेतन को लेकर अध्ययन किया है। इस अध्ययन के नतीजे बेहद चौंकाने वाले हैं। जापान, ग्रेट ब्रिटेन और संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे विकसित देशों में प्रति व्यक्ति आय के मुकाबले शिक्षकों का वेतन 1.1 गुना से लेकर डेढ़ गुना तक ही है। इसकी तुलना में अपने ही उत्तर प्रदेश राज्य के शिक्षकों का वेतन वहां के स्थानीय निवासियों की तुलना में बारह गुना तक ज्यादा है। ब्रिटेन, जापान या अमेरिका को देखें तो वहां के प्रति व्यक्ति आय से कुछ ही ज्यादा पाने वाला शिक्षक की जितनी जवाबदेही या जितनी जिम्मेदारी है, क्या उसका अंश मात्र भी उत्तर प्रदेश के सरकारी विद्यालयों के शिक्षकों में दिखता है?

इसकी एक बानगी हाल ही में 14 अप्रैल को अंबेडकर जयंती के दिन एक स्कूल में सुभाष चंद्र बोस के फोटो को श्रद्धांजलि देते फोटो के सोशल मीडिया पर वायरल होने पर दिखाई देती है। उत्तर प्रदेश सरकार की शिक्षा में बेहतरीन उदाहरण अपवाद के तौर पर भी कम ही दिखते हैं। दूरदराज के इलाकों की जानकारियां तक ऐसी हैं कि बड़े वेतन के चलते बेरोजगारों को चार-पांच हजार रूपए महीने पर कई नियमित शिक्षकों ने अपनी जगह पढ़ाने का काम दे रखा है। असल शिक्षकों के वेतन का एक मोटा हिस्सा रिश्वत के रूप में जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी, उप निरीक्षक और सहायक उपनिरीक्षकों के साथ ही ग्राम प्रधान को भी दे दी जाती है। शिक्षकों का जो वेतन राज्य के खजाने से दिया जाता है, वह जनता की गाढ़ी कमाई से ही आता है। लेकिन सवाल यह है कि जिस जनता की गाढ़ी कमाई से शिक्षकों को वेतन दिया जाता है, बदले में उस जनता को क्या मिलता है? उसके बच्चों को बदले में शिक्षक से क्या वैसा ज्ञान मिल पाता है, जिसकी सहायता से मौजूदा वैश्विक चुनौतियों से निबटने लायक वह तैयार हो सके?

भारतीय संविधान के मुताबिक शासन तीन सूचियों के तहत मिले राज्यों और केंद्र के अधिकारों के तहत चलाया जाता है। शिक्षा समवर्ती सूची का विषय है। इसलिए इस पर राज्य और केंद्र-दोनों का हक है। इसलिए इस विषय पर राज्य और केंद्र सरकारें अपने-अपने ढंग से कानून और स्थानीय जरूरतों के मुताबिक व्यवस्था बना सकती हैं। हालांकि इसे लेकर भी जानकारों में मतभेद है। कुछ लोगों का कहना है कि शिक्षा जैसे विषय काफी महत्वपूर्ण है। इसलिए इसे केंद्रीय यानी संघीय सूची में रखना चाहिए था। 2009 में पास होने वाला शिक्षा का अधिकार कानून ऐसा पहला कानून है, जिसे संसद ने पारित किया है। जो 1 अप्रैल 2010 से देश में लागू है। जानकार मानते हैं कि अगर इस कानून को ही सम्यक प्रावधानों के साथ पारित किया जाता तो सरकारी शिक्षा में भी जवाबदेही लाई जा सकती थी।

सम्मानजनक वेतन के बावजूद अगर देश की सरकारी शिक्षा बेहतर और जवाबदेह नहीं बन पाई है, तो इसकी एक बड़ी वजह सरकारी कानून भी हैं। शिक्षा का अधिकार कानून के जरिए इसे बेहतर बनाया जा सकता था बशर्तें कि शिक्षा के अधिकार कानून की जगह गुणवत्ता युक्त शिक्षा के अधिकार का कानून पारित किया जाता। बेशक मनमोहन सिंह की सरकार इस कानून में गुणवत्ता की व्यवस्था का प्रावधान करने से चूक गई, लेकिन मौजूदा सरकार चाहे तो इसमें यह जरूरी बदलाव ला सकती है। अगर ऐसा हुआ तो निश्चित तौर पर सरकारी स्तर की शिक्षा में भी सुधार होगा, क्योंकि गुणवत्ता युक्त शिक्षा ना देने के चलते सरकारी स्कूल और उनके अध्यापकों की भी जवाबदेही ठीक उसी तरह तय होगी, जिस तरह निजी स्कूलों की होती है।

अगर ऐसा हुआ तो फिर निजी स्कूलों की मनमानी फीस का सवाल भी नहीं उठेगा। निजी और सरकारी स्कूलों में प्रतियोगिता भी बढ़ेगी। अभी हालत यह है कि जितनी संख्या में गुणवत्ता युक्त स्कूलों की मांग है, उतने स्कूल हैं ही नहीं। अगर गुणवत्ता युक्त शिक्षा का अधिकार कानून बना तो सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता में बढ़ोत्तरी होगी क्योंकि तब अध्यापकों की जवाबदेही तय की जा सकेगी। जिसकी वजह से बेहतर स्कूलों की बढ़ी मांग पूरी हो सकेगी। तब शायद फीस बढ़ोतरी में मनमानी सहित कई बेवजह के सवाल पीछे चले जाएंगे।

- उमेश चतुर्वेदी (लेखक वरिष्ठ टीवी पत्रकार हैं)

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