गुणवत्ता युक्त शिक्षा की फिक्र किसे!

कहते है आईटी और आईआइएम में दाखिला लेना आसान है बनिस्पत अच्छे नर्सरी स्कूलों के। क्योंकि आईआईटी और आईआईएम में दाखिले के लिए इम्तिहान छात्र देते है और निजी स्कूलों में उनके अभिभावक। किस्मत और आपकी जेब इसका फैसला करतीहै कि आपका बच्चा फलां स्कूल में जाने लायक है भी या नही। कितने सूटकेस में पैसा और सिफारिशी पत्र आपने सलंग्न किये है दाखिला इसपर निर्भर करता है। इतने जतन प्रयत्न के बाद अगर दाखिल मिल जाये तो अभिभावक की स्थिति एक बंधक की भांति हो जाती है जो स्कूलो के सही गलत सब नियम मानने को मजबूर हो जाते हैं। हर साल कितनी फीस बढ़ेगी, किताबे कहाँ से आएंगी, वर्दी और  यहां तक की जूते भी स्कूल द्वारा बताए गए स्टोर से लेने के प्रावधान होते हैं। किस्मत और बुरी है तो स्कूल से ट्रांसपोर्ट और नाश्ता लेना भी अनिवार्य है।

ये जितनी बातें लिखी हैं ये आज लाखों अभिभावकों के ज़िन्दगी में रोजमर्रे का हिस्सा है। भारत मे नर्सरी की पढ़ाई इंजीनियरिंग या डॉक्टरी की पढ़ाई करने से कई गुना महंगी पड़ती है। आपको जानकर हैरानी होगी नर्सरी में कई स्कूलों की फीस 20-20 हज़ार रुपए प्रतिमाह तक पहुंच जाती है। इस समस्या से निपटने में कई बार अदालतें और सरकार आगे आईं है और कड़े निर्देश भी दिए है मगर स्कूल वाले हैं मनमानी का कोई न कोई रास्ता निकाल ही लेते है।

हाल ही में उत्तर प्रदेश सरकार स्कूली फीस के संबंध में एक नया विधेयक लेकर आई है, जिसका नाम है उत्तर प्रदेश स्ववित्तपोषक शुल्क निर्धारण विधेयक। इसके तहत शुल्क लेने के नये बिंदू तय किए गए हैं। ऐसा दावा किया जा रहा है इससे स्कूल पारदर्शी तरीके से फीस ले सकेंगे और किसी प्रकार की गड़बड़ी की आशंका नहीं रहेगी। इससे पहले दिल्ली में केजरीवाल सरकार भी अभिभावकों के हितों के लिए आगे आई थी और इसी का परिणाम है पिछले कुछ सालों में स्कूल संचालक मनमाने तरीके से फीस नही बढ़ा पाए ये बात और है इसके दूसरे रास्ते तलाश लिए गए। स्कूलो को स्पष्ट निर्देश है कि सिर्फ एनसीईआरटी की किताबें ही पढ़ाई जाएंगी जिसकी गुणवत्ता और कीमत सरकार ने तय की है मगर स्कूलों में धड़ल्ले से निजी प्रकाशकों की दस बीस पेजों वाली किताबे 400 से 500 रुपए में मिलती हैं। आपके पास कोई रास्ता नही सिवाए इन्हें खरीदने के।

अब बात देश मे शिक्षा के वर्तमान हालात पर करते है। पिछले साल लोकसभा में एक एक विधेयक पारित हुआ है जिसके अनुसार 31 मार्च 2019 तक सभी सरकारी ग़ैरसरकारी शिक्षकों को बीएड की डिग्री हासिल करनी है अन्यथा वे कहीं पढ़ाने योग्य नहीं रहेंगे। जरा तस्वीर का दूसरा पहलू भी देखें। देश में वर्तमान में 10 से 12 लाख शिक्षकों की कमी है। आपको याद होगा कुछ समय पहले प्रधानमंत्री ने एक सवाल किया था कि आखिर युवा शिक्षक क्यों नहीं बनना चाहते हैं? देश में शिक्षकों की भारी कमी है और युवा शिक्षक बनना नहीं चाहते ये दोनों बातें एक साथ कैसे मुमकिन है। बाजार का सिद्धांत कहता है जहां मांग होती है वहीं आपूर्ति होती है लेकिन इस मामले में विरोधाभासी परिणाम क्यों हैं?

अब जरा बानगी  देखिए, मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा पिछले वर्ष जारी एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि देश मे एक लाख 5 हज़ार से ज्यादा स्कूल ऐसे है जो सिर्फ एक शिक्षक के भरोसे चल रहे है। स्थिति साफ है सरकार अपने स्कूलों को बेहतर कर पाने में लाचार साबित हुई है मगर निजी स्कूलों को कैसे बर्बाद किया जाए इसमें भी कोई कसर नही छोड़ी है। इसकी शुरुआत शिक्षा के अधिकार के कानून से शुरू हुई। मंशा पर कोई शक नहीं है लेकिन जो तौर तरीके अपनाए गए वो ही गले की हड्डी बन गए। कुछ एक उदाहरणों को छोड़ दें तो प्रत्येक किलोमीटर के दायरे में प्राथमिक स्कूल खोलने का लक्ष्य अधूरा रह गया। जहां स्कूल खुलें वहां भी बेहतर और सुचारू ढंग से व्यवस्था कैसे हो इसपर काम नही किया गया। कहीं कहीं एक ही गांव में कई स्कूल खुल गए और ग्रामीणों ने अपनी सुविधानुसार ब्राह्मणों, दलितों के स्कूलों में बांट लिया।

कुछ वर्ष पहले शिक्षा व्यवस्था पर अपनी एक रिपोर्ट बनाने के दौरान मुझे स्वयं ऐसे वाक्ये देखने को मिलें। मास्टरजी राम भरोसे निकले। कहने को शिक्षा मित्र थे मगर दुश्मन ज्यादा नज़र आये। यही हालत उत्तर प्रदेश के भी स्कूलों की थी जहाँ प्राथमिक शिक्षक इसी तर्ज पर रखे गए थें। दिल्ली में भी पिछले कुछ सालों में कई सरकारी स्कूलों को सिर्फ इसलिए बंद करना पड़ा क्योंकि छात्रों की संख्या बेहद कम थी। यानी ये स्थितियां दर्शाती हैं कि लोगो का सरकारी स्कूलों से मोह भंग हुआ है। अपने आसपास कई रिक्शा चलाने वाले या ठेले पर समान बेचने वालों से बात करने पर पता चलता है कि उनके बच्चे किसी प्राइवेट स्कूल में पड़ते हैं। ऐसा करने में उनकी आमदनी का बड़ा हिस्सा खर्च होता है मगर सरकारी स्कूलों में मिलने मुफ्त शिक्षा की तरफ नज़र नही उठाते है। यह तब है जबकि ऐसे स्कूलों में वर्दी, जूते, मध्याह्न भोजन आदि भी निशुल्क प्रदान किए जाते हैं। अब आरटीई पर एक बार फिर आते हैं। इनमें कुछ जरूरी शर्ते है निजी स्कूल संचालकों के लिए जैसे माध्यमिक या प्राथमिक स्कूल का भूखंड कितना हो, कितने भवन हों, लाइब्रेरी कैसी हो यानी लंबी चौड़ी लिस्ट मौजूद है। उसपर तुर्रा ये है कि अध्यापकों को सरकार द्वारा तय वेतनमान भी देना है जो काफी अधिक है। 

दिल्ली के एक स्कूल संचालक और आरटीआई कार्यकर्ता चंद्रकांत सिंह कहते हैं "हम अपने स्कूलों में प्रवेश स्तर की कक्षा में 30 बच्चों का जैसे तैसे कर एडमिशन लेते हैं। सबसे 500-700 रूपए फीस लेते हैं। कुल 15 से 17 हज़ार  एक क्लास से आता है जिसमें से अध्यापक को सरकार द्वारा निश्चित 30 हज़ार वेतन देना है। स्कूल के दूसरे खर्च निकालने हैं, चपरासी, आया व अन्य स्टाफ को वेतन देना है। क्या ये संभव है? हमारी लाचारगी की आप कल्पना भी नही कर सकते हैं।"

अब थोड़े से स्टैंडर्ड स्कूल की बात करते है जहां नियमानुसार उसको 25 प्रतिशत निम्न आय वर्ग के लोगो को मुफ्त शिक्षा देनी है। सरकार थोड़ा बहुत वहन करती है। आपको जान कर ताज़्ज़ुब होगा 25 प्रतिशत निम्न आरक्षित वर्ग के छात्रों की फीस का भार 75 प्रतिशत निम्न माध्यम वर्ग के छात्रों के अभिभावको की जेबो पर पड़ा है। क्योंकि स्कूलों के मालिको की नीयत साफ है, वो अपने प्रॉफिट पर आंच नही आने देना चाहते।

यानी जो सरकार अपने सरकारी सकूलो के हालात को ठीक नही कर पाई वो निजी स्कूलों को बद्दतर जाने अनजाने में बनाती जा रही है। जहां तक सरकारी स्कूलों की बात है वहां भी सर्वोदय, केंद्रीय ,सैनिक स्कूल, प्रतिभा विद्यालय, नवोदय जैसे भागो में बांटा हुआ है। सरकारी स्कूलों में एक रूपता भी नही है फिर दुनियाभर के बोर्ड्स है। क्या नवोदय, केंद्रीय, या प्रतिभा विद्यालयों में आरटीई के नियम पूरे होते हैं? बगल में रहने वाले को क्या वहां दाखिला मिल जाता है? और यदि नवोदय या प्रतिभा विकास विद्यालयों में लिखित परीक्षा के आधार पर दाखिल मिलता है तो क्या ये नियमो के खिलाफ नही है। स्कूल का मतलब बड़ा भूखंड बड़ी बिल्डिंग लाइब्रेरी होता तो कब का सरकारी स्कूलों का बेड़ा पार हो जाता लेकिन सरकार ने बुनियादी बातों को छोड़कर इसपर ही अपना ध्यान केंद्रीत रखा, नतीज़ा सामने है। जबकि निजी स्कूलों ने कम संसाधनो के बावजूद उम्दा प्रदर्शन किया है मगर सरकार के इस तरह के बेसिर पैर के नियम इसको खत्म कर देंगे।

दिल्ली के रामलीला मैदान में प्राइवेट बजट स्कूलो के संघ नीसा ने हज़ारो स्कूलों के संचालकों, उनके शिक्षकों और अभिभावकों के साथ व्यापारिक प्रदर्शन किया था जिसका उद्देश्य ऐसे छोटे बजट स्कूलो की रक्षा करना था जो आरटीई  कानून की विसंगतियो की वजह से बंद होने के कगार पर है। आदर्श स्तिथि तो ये होती कि समुदाय अपना स्कूल अपनी देख रेख में चलाते सरकार सिर्फ निगरानी करती या छात्रों को हर माह छात्रवृती देते जिससे वो अपना स्कूल अपनी मर्ज़ी से चुनते। अभी भी प्रत्येक छात्र पर सालाना 20 से 30 हज़ार रुपए सरकार औसत खर्च करती है भले ही आपका बच्चा किसी निजी स्कूल में पड़ता हो। सरकार को गंभीरता से सोचना है कि उसको नियामक बना कर दूर खड़े होकर निगरानी करनी है या हवाई जहाज, ट्रेन, स्कूल चला कर उसकी बेचारगी का रोना रोना है उसके घाटे की भरपाई के लिए दुनियाभर के टैक्स लगाने हैं। मगर शिक्षण संस्थानों के प्रति सरकारों का रुख देख कर यही कहा जा सकता है इस सूरत में अहित छात्रों का ही होगा।

- सिद्धार्थ झा (लेखक लोकसभा टीवी से संबद्ध हैं) लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। 

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