तमाम समस्याओँ के बीच, शैक्षिक सिस्टम को सबसे पहले ठीक करने की जरूरत है

- सरकार खुद यह स्वीकार कर चुकी है कि आधार कार्ड के इस्तेमाल से 60,000 करोड रुपये बचे हैं, इसका मतलब है कि सिस्टम में तमाम खामियाँ हैं। 
- सरकार हर बच्चे की स्कूलिंग पर साल में कम से कम 25,000 रुपये खर्च करती है। इसके बावजूद सरकारी स्कूल अच्छी शिक्षा देने में असफल हैं, इसके लिए डिलिवरी सिस्टम ही जिम्मेदार है।

1.3 बिलियन आबादी के साथ भारत की समस्या भी काफी बडी है, यहाँ 1 बिलियन लोग प्रतिदिन 2 डॉलर्स से कम कमाते हैं, 30 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं, नवजात मृत्यु दर प्रति 1000 बच्चोँ के जन्म पर 45 है और मातृत्व मृत्यु दर 1,00,000 जन्म पर 175 है।इन सारी समस्याओँ का समाधान सिर्फ सरकार ही कर सकती है जो कुल जीडीपी का 18% टैक्स के रूप में वसूल करती है। राज्य और केंद्र द्वारा हर साल 40 लाख करोड रुपये खर्च किया जाता है। सरकार के पास प्रमुख समस्याओँ के समाधान हेतु पर्याप्त संसाधन हैं लेकिन खर्चँ के प्रभावी सिस्टम के अभाव, सरकारी खर्चोँ की उत्पादकता में कमी और सिस्टम में व्याप्त भ्रष्टाचार के चलते ऐसा नहीं हो पा रहा है। तमाम मदोँ में किए जाने वाले सरकारी खर्चे सिर्फ इसलिए जरूरतमंद लोगोँ तक नहीं पहुंचते क्योंकि उन्हे सही ढंग से खर्च नही किया जाता है। सरकार खुद यह बात स्वीकार करती है कि आधार कार्ड के इस्तेमाल से 60,000 करोड रुपयोँ की बचत हुई है, जो कि सिस्टम में व्याप्त बडे स्तर के भ्रष्टाचार की पुष्टि है। अगर पिछ्ले 10 वर्षोँ के इस लीकेज का हिसाब लगाया जाय तो यह राशि बहुत अधिक मात्रा में होगी।

समाज कल्याण हेतु खर्च के मामले में कारोबारियोँ द्वारा कॉर्पोरेट सोशल रेस्पॉन्सिबिलिटी (सीएसआर), धर्मार्थ और व्यक्तिगत रुप से लोगोँ द्वारा किए जाने वाले खर्चे कभी सरकारी खर्चोँ का विकल्प नहीं हो सकते हैं, और न ही कोई कॉर्पोरेट अथवा कोई व्यक्ति कभी भी स्टाफ अथवा पैसोँ की ताकत के मामले में सरकार का मुकाबला कर सकता है। राज्य और केंद्र सरकारोँ के तहत  2.5 करोड लोग कार्य कर रहे हैं। ऐसे में कोई भी प्राइवेट पहल सिर्फ सागर में एक बूंद गिरने के समान ही हो सकती है, इसलिए हमेँ इनसे बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं लगानी चाहिए। ये कभी भी भारत की चुनौतियोँ का समाधान नहीं बन सकते हैं। यहाँ तक कि, अगर कोई व्यक्ति अपनी आधी सम्पत्ति दान करने का संकल्प लेता है, तब भी यह मतलब नहीं है वह अपना आधा धन लोक कल्याण पर खर्च कर देगा, बल्कि वह ट्रस्ट जैसे संस्थान बनाएगा जहाँ वह अपनी सम्पत्ति को रख सके, किसी तरीके से वह इस संस्थान को नियंत्रित करेगा और सम्पत्ति का कुछ हिस्सा जनकल्याण पर खर्च करेगा। अगर कोई 10,000 करोड धर्मार्थ कार्य में खर्च करने का संकल्प लेता है तो इसका मतलब है कि वह व्यक्ति पहले ट्रस्ट बनाएगा और अपना पैसा उसमेँ रखेगा। इससे सालाना 500-600 करोड रिटर्न कमाएगा और उसमे से 400-500 करोड सालाना खर्च करेगा।

वास्तविक समाधान के लिए यह सुनिश्चित करना होगा कि सरकारी खर्चे प्रभावी तरीके से होँ। उदाहरण के तौर पर, स्वास्थ्य क्षेत्र में, खासतौर से विशेषीकृत देखभाल में, सरकार एक सार्वभौमिक स्वास्थ्य बीमा की व्यवस्था कर सकती है, जिससे लोगोँ को अपनी मर्जी के अस्पताल में जाकर इलाज कराने की शक्ति मिलेगी। इससे प्रतिस्पर्धा बढेगी, सेवाएँ सस्ती होंगी, और लोगोँ के पास वहन करने की क्षमता बढ्ने से मार्केट का आकार भी बढेगा। अगर सरकारी अस्पतालोँ को भी ट्रस्ट बनाकर चलाया जाता और वे पूरी तरह से इंश्योर्ड बेसिस पर शुल्क लेते तो इन अस्पतालोँ की गुणवत्ता अच्छी होती और इन्हे चलाने के लिए सरकार के ग्रांट पर नहीं निर्भर नहीं रहना पडता, बल्कि अच्छी सेवाएँ देकर ये मरीजोँ को अपनी ओर आकर्षित कर संचालन का खर्च निकाल लेते।

आजकल, सरकारी स्कूलोँ के बारे में तमाम शिकायतेँ आती हैं, किये अच्छी शिक्षा नहीं दे पा रहे। इसकी वजह य कतई नहीं है कि सरकार शिक्षा क्षेत्र पर कम खर्च कर रही है। पूरे भारत में, सरकार हर साल एक स्कूली बच्चे पर कम से कम 25,000 रुपये खर्च करती है। इतने खर्चे के बावजूद शिक्षकोँ की गैरहाजिरीबहुत ज्यादा है, बच्चोँ का प्रदर्शन खराब है और स्थिति में सुधार की कोई गुंजाइश नहीं दिखाई दे रही है। साल दर साल खर्चे बढ रहे हैं, लेकिन परिणामोँ में गिरावट आ रही है। अगर बच्चोँ को वाउचर दिया जाता और वे उसी खर्च में अपनी मर्जी का स्कूल चुनने के लिए स्वतंत्र होते तो सरकारी स्कूल भी अच्छी पढाई कराकर बच्चोँ को आकर्षित करते, और तब स्थिति कुछ और होगी।

हम एक ऐसे सरकारी सिस्टम का सामना कर रहे हैं जहाँ डिलिवरी सिस्टम खराब है, खर्चे बढ रहे हैं, भ्रष्टाचार है, उत्पादकता कम है और अधिक खर्च के बावजूद गरीब लोग सरकारी कर्मचारियोँ के भंवरजाल में उलझे रहने को मजबूर हैं। इस समस्या को ठीक करने का एक ही उपाय है, सिस्टम को प्रतिस्पर्धा के लिए मुक्त कर दिया जाय और लोगोँ को सीधे लाभ पहुंचाया जाए, सरकारी सिस्टम को सेवा प्रदाताओँ का एक हिस्सा बनाया जाय न कि उन्हे एकमात्र सेवा प्रदाता के तौर पर देखा जाए। अधिकतर क्षेत्रोँ में सरकार तीन प्राथमिक भूमिकाएँ निभाती है: सभी नागरिकोँ के लिए नियम बनाकर नीति निर्माता के रूप में, लेकिन क्या यह नीति सही काम करती हैं, नियामक के तौर पर जहाँ सेवाओँ की गुणवत्ता सुनिश्चित करने की बात आती है वहाँ रेकॉर्ड एवरेज हैँ; और सेवा प्रदाता के तौर पर ओ स्थिति बेहद खराब है। इसके मुख्य कारण हैं, भूमिकाओँ को विभिन्न प्रक्रियाओँ के दौरान स्पष्ट न कर पाना, क्योंकि सरकार न तो कभी अपने संस्थानोँ को नियंत्रित कर पाने में अक्षम रही है और न ही यहाँ स्टैंडर्ड सुनिश्चित कर पाने में। ऐसे में अन्य सेवा प्रदाताओँ को भी इनके अनुसरण का मौका मिलता है और नतीजतन भ्रष्टाचार को बढावा मिलता है। एक सेवा प्रदाता के तौर पर, सेवा की गुणवता को सुनिश्चित करने की स्थिति बेहद खराब है, पर्याप्त निरीक्षण का अभाव है और फोकस की कमी है।

जहाँ भी सरकारी क्षेत्र सेवा प्रदाता का हिस्सा है वहीँ चुनौतियाँ हैं। इसे सिर्फ तभी ठीक किया जा सकता है जब भरपूर प्रतिस्पर्धा हो और जनता के पास चयन का अधिकार हो, जिसके लिएडायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी) को जरिया बनाया जा सकता है। अगर जनता आर्थिक तौर पर सशक्त होगी, तो वह उस सेवा प्रदाता के पास जाएगी जहाँ उसे बेहतरीन परिणाम मिले- चाहे वह सरकारी हो अथवा निजी। अगर जनता गरीब और मजबूर होगी तो उसे मजबूरन सरकारी सेवा प्रदाताओँ के पास जाना पडेगा, जहाँ गुणवत्ता के मामले में लापरवाही बेहद ज्यादा है। यही वजह है कि अधिकतर सरकारी कर्मचारी भी अपने बच्चोँ को प्राइवेट स्कूलोँ में भेजते हैं, इलाज के लिए प्राइवेट अस्पतालोँ में जाते हैं, निजी एयरलाइंस में यात्रा करते हैं और आमतौर पर सरकारी सेवाओँ के इस्तेमाल से दूर रहने की ही कोशिश करते हैं। सरकार को एक नियम लागू करना चाहिए जिसके अनुसार सरकारी कर्मचारियोँ के लिए उनके बच्चोँ को सरकारी स्कूलोँ में भेजना, उनका इलाज सरकारी अस्पलातोँ में होना अनिवार्य हो, इसी तरह से अन्य सेवाओँ के मामले में भी उनके निजी सेवा प्रदाता के पास जाने पर रोक लगेतब शायद समस्या का कोई समाधान निकल सकता है। इससे भी शायद गुणवत्ता में सुधार लाया जा सकता है। सीएसआर और धर्मार्थ कार्योँ का होते रहना एक अच्छी बात है, मगर भारत की चुनौतियोँ का ये सम्पूर्ण समाधान नहीं हो सकते हैं।

-टी वी मोहनदास पाई

साभारः डेक्कन क्रॉनिकल

http://www.deccanchronicle.com/opinion/op-ed/261117/among-multitude-of-p...

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