फीस वृद्धि में सरकारी दखल से समस्या का समाधान नहीं

सरकारी जमीन पर बने प्राइवेट स्कूलों द्वारा फीस बढ़ाने के एक मामले में फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए सरकार की अनुमति को आवश्यक बताया है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि स्कूली फीस एक बड़ा मुद्दा है; सामाजिक मुद्दा भी और राजनैतिक मुद्दा भी। एक तरफ स्कूल प्रबंधन अपने खर्चे का हवाला देते हुए फीस वृद्धि को न्यायसंगत साबित करने की कोशिश करता है वहीं अभिभावक और उनके साथ साथ सरकार इसे स्कूलों की मनमानी बताती है। अभिभावक चाहते हैं कि स्कूली फीस के मामले में सरकार दखल दे और स्कूलों की मनमानी से उन्हें निजात दिलाए। शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत कुछ एनजीओ व स्वयंसेवी समूह भी सरकारी दखल के लिए दबाव बनाते देखे जा सकते हैं। लेकिन, निजी स्कूलों के कामकाज में सरकारी दखल की अलग समस्याएं हैं।

पाठ्यक्रम निर्धारण में यह दखल पहले से मौजूद है और सरकार अध्यापकों के वेतन को सरकारी अध्यापकों के बराबर कराने की पहल भी कर ही चुकी है। यह बात और है कि स्कूलों के विरोध के कारण इस अव्यवहारिक फैसले का अनुपालन अभी नहीं कराया जा सका है। किंतु एक बार फीस निर्धारण में सरकारी दखल हो गया तो सरकारी महकमा अध्यापकों के वेतन और सेवा शर्तों आदि पर भी हावी हो जाएगा। तब स्कूल मैनेजमेंट का लापरवाह टीचरों के विरुद्ध कार्रवाई करना कठिन हो जाएगा। पूरे देश में सरकारी स्कूलों की बदहाली बताती है कि सरकारी दखल से प्राइवेट स्कूलों का भी यही हाल हो जाएगा। शिक्षा के अधिकार का कानून पहले से ही प्राइवेट स्कूलों की स्वायत्तता को संकट में डाले हुए है। 25 प्रतिशत गरीब बच्चों को आयु के अनुसार कक्षा में प्रवेश देने और फीस की प्रतिपूर्ति के लिए सरकार पर आश्रित हो जाने के बाद से स्कूल प्रबंधन यहां भी बैकफुट पर है। फीस पर नियंत्रण से यह सिलसिला कहीं और ही पहुंच जाएगा। सरकारी महकमे के लिए निजी स्कूलों पर नियंत्रण लाभ का सौदा है। उनके लिए नं॰ 2 की आय का एक और स्रोत खुल जाएगा और इंस्पेक्टर राज की वापसी की संभावना बढ़ेगी। 

दरअसल, समस्या का एक कारण बड़ी बिल्डिंग और ऊंची फीस वसूल करने वाले स्कूलों में शिक्षा की क्वालिटी अच्छी होती है, वाली अभिभावकों की मानसिकता का होना भी है। जबकि सच्चाई यह है कि ऊंची फीस और अच्छी शिक्षा का कोई निश्चित संबंध नहीं है।

युनिवर्सिटी ऑफ सदर्न कैलिफोर्निया के प्रो. जान मैकडरमॉट कहते हैं कि 'एक न्यूनतम स्तर के आगे प्रति स्टूडेंट खर्च बढ़ाने से टेस्ट में सफलता पर प्रभाव नही पड़ता है। शैक्षिक प्रदर्शन में घरेलू पृष्ठभूमि और दूसरी सामाजिक स्थितियों की भूमिका ज्यादा होती है।' अमेरिका में वाबाश नैशनल स्टडी द्वारा 10 कालेजों का अध्ययन किया गया जिनकी शैक्षणिक उपलब्धि बराबर थी। पाया गया कि इनके प्रति स्टूडेंट खर्च में 6 गुने तक का अंतर था।

भारत के संदर्भ में ऐसे अध्ययन उपलब्ध नहीं हैं परंतु मुझे भरोसा है कि यहां भी जमीनी स्थिति ऐसी ही है। जरूरत स्कूलों की क्वॉलिटी रैंकिंग की है, जिस प्रकार होटलों को स्टार रैंकिग दी जाती है। सरकार को चाहिए कि ऐसी रैंकिंग की व्यवस्था को प्रोत्साहित करे और अपनी वेबसाइट पर इसे प्रदर्शित करे ताकि बच्चे का दाखिला कराने से पूर्व अभिभावक को स्कूल की वास्तविकता का पता चल सके। स्कूलों की फीस वृद्धि में हस्तक्षेप करने की बजाए फीस वृद्धि को सत्र के बीच में कभी भी की बजाए सत्रारंभ में करने का नियम बनाना चाहिए ताकि अभिभावक अगर चाहें तो कम फीस वाले स्कूल में बच्चे का दाखिला करा सकें। परंतु स्कूलों की स्वायत्तता में दखल नहीं देना चाहिए।

स्कूलों की मनमानी का एक कारण 'अच्छे' स्कूलों की अपर्याप्त संख्या भी है। सरकार को नए स्कूलों के खुलने का मार्ग प्रशस्त करना चाहिए और इसके लिए नियम कानूनों को सरल बनाने की आवश्यकता है। पर्याप्त संख्या में स्कूल होने पर मुनाफाखोरी अंततः बाजार द्वारा नियंत्रित कर ली जाएगी। समय बीतने के साथ कई दूसरे स्कूल खड़े हो जाएंगे, जो कम फीस में उतनी ही अच्छी शिक्षा उपलब्ध करा देंगे। अंततः इन स्कूलों की होड़ से ही अग्रणी स्कूलों की फीस पर लगाम लगेगी। बाजार को फीस पर नियंत्रण करने देना चाहिए। इससे शिक्षा की गुणवत्ता पर दुष्प्रभाव नहीं पड़ेगा।

स्कूलों को सरकार द्वारा रियायती दर पर भूमि उपलब्ध कराई जाती है और आयकर में छूट दी जाती है। इन स्कूलों की फीस सरकार, पैरंट्स तथा मैनेजमेंट, तीनों की भागीदारी से नियंत्रित की जानी चाहिए। इससे सरकारी सुविधाओं के दुरुपयोग से बचा जा सकेगा। इनके खातों का आडिट कराकर उसे सार्वजनिक करना चाहिए। लेकिन, सभी प्राइवेट स्कूलों की फीस पर नियंत्रण करने के चक्कर में हमें शिक्षा की क्वॉलिटी का सत्यानाश नहीं होने देना चाहिए।

- अविनाश चंद्र (लेखक आजादी.मी के संपादक हैं)

साभारः सोपान स्टेप मैगजीन