निजी स्कूलों में मनाया 'ब्लैक डे', काली पट्टी बांध किया काम

- सरकार व शिक्षा विभाग पर स्कूलों के साथ भेदभाव का आरोप, प्रधानमंत्री व राज्य के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिख मामले से कराया अवगत
- देशभर के 60,000 से अधिक स्कूलों के शैक्षणिक व गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों ने शांतिपूर्ण तरीके से दर्ज कराया विरोध

नई दिल्ली। स्कूल संचालन और प्रबंधन के कार्य में दिन प्रतिदिन बढ़ते सरकारी हस्तक्षेप, नए-नए नियम कानूनों के नाम पर होने वाले भेदभाव, स्कूल संचालकों व कर्मचारियों के शोषण व बढ़ते इंस्पेक्टर राज के खिलाफ देशभर के स्कूलों का गुस्सा आखिरकार गुरुवार को छलक उठा। आर्थिक और मानसिक प्रताड़ना से परेशान विभिन्न राज्यों के 60,000 से अधिक निजी स्कूल संचालकों, अध्यापकों और कर्मचारियों ने इसका विरोध बतौर ब्लैक डे, हाथों पर काली पट्टी बांध कर किया। इस दौरान प्रांतीय स्कूल संगठनों ने नेशनल इंडिपेंडेंट स्कूल्स अलायंस (निसा) के नेतृत्व में स्कूल बसों व स्कूल भवनों पर विरोधस्वरूप काले झंडे भी लहराए। स्कूल संगठनों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मानव संसाधन एवं विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर, राज्य के मुख्यमंत्रियों व शिक्षामंत्रियों को मांगपत्र सौंपा और अपने साथ होने वाली ज्यादतियों से भी अवगत कराया और समस्या के समाधान की मांग की।

निसा के राष्ट्रीय अध्यक्ष कुलभूषण शर्मा ने बताया कि शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) के तहत 14 वर्ष तक की आयु के बच्चों को निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने की जिम्मेदारी सरकार की है। सरकार अपनी इस जिम्मेदारी से भाग रही है और इसे निजी स्कूलों पर थोप रही है। स्कूलों को 25 प्रतिशत आरक्षित सीटों के ऐवज में प्रतिपूर्ति भी नहीं की जा रही है और आए दिन अनावश्यक रूप से नए नए नियम थोपे जा रहे हैं। कुलभूषण शर्मा ने कहा कि गुरुग्राम स्थित रेयान इंटरनेशनल स्कूल के छात्र के साथ हुई दुर्भाग्यपूर्ण घटना के बाद छोटे व गैर सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों के लिए ऐसे ऐसे नियम थोपे जा रहे हैं जो व्यवहारिक नहीं है। इस कारण, शिक्षा के क्षेत्र में भ्रष्टाचार और इंस्पेक्टर राज को बढ़ावा मिल रहा है।

निसा के राष्ट्रीय संयोजक डा. अमित चंद्र ने बताया कि बहुप्रचारित शिक्षा का अधिकार कानून, तमाम अच्छे उद्देश्यों के बावजूद समाज को शैक्षणिक रूप से बांटने का सरकारी उपकरण बन कर रह गया है। यह सबको समान शिक्षा प्रदान करने की बजाए राजनैतिक मुद्दे के तौर पर ज्यादा इस्तेमाल किया जा रहा है जिससे स्कूल संचालकों, शिक्षकों, कर्मचारियों, अभिभावकों, मीडिया व नागरिक संगठनों के मध्य विवाद की स्थिति उत्पन्न हो गयी है। इसका ताजा उदाहरण फीस नियंत्रण के लिए उठाए गए कदम हैं। अच्छा हो यदि सरकार स्कूलों की बजाए डायरेक्ट बेनिफिट स्कीम के तहत छात्रों को सीधे फंड उपलब्ध कराए ताकि अभिभावक अपने बच्चों को मनपसंद स्कूल में भेज सकें और उनके साथ भेदभाव की संभावना समाप्त हो सके।
निसा पदाधिकारी एस. मधुसूदन ने बताया कि नीति निर्धारण के दौरान निजी स्कूलों के प्रतिनिधित्व की अनदेखी की जाती है। यही कारण हैं कि शिक्षा के क्षेत्र में बनने वाले अधिकांश कानून पक्षपाती और अव्यहारिक होते हैं और इनका पालन करना छोटे व कम शुल्क वाले बजट स्कूलों के लिए संभव नहीं हो पाता। उन्होंने कहा कि निजी स्कूलों को विलेन के तौर पर प्रोजेक्ट किया जा रहा है। हमारे यहां अधिकांश अध्यापिकाएं व प्रधानाचार्य महिला हैं और हाल ही में स्कूल सेफ्टी के नाम प्रधानाचार्यों को दंडित करने के फरमान से वे भयभीत हैं और वे पद से अपना इस्तीफा दे रही हैं।

- नेशनल इंडिपेंडेंट स्कूल्स अलायंस द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति