प्राथमिक शिक्षा का गिरता स्तर (भाग 2)

भाग 1 http://azadi.me/primary-education-in-India-part1‌ से आगे..

देश की प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था की गुणवत्ता में कमी की एक प्रमुख वजह यह भी है कि इसकी जिम्मेदारी पूर्णतः राज्य सरकारों पर ही छोड़ दी गयी है। यही कारण है कि आज देश के तमाम राज्यों में वही पुराने 1986 के ढर्रे पर शिक्षा व्यवस्था को संचालित किया जा रहा है। वर्तमान समय में भूमंडलीयकरण के आने के बाद भी इस तरह से शिक्षा व्यवस्था को चलाया जा रहा है कि वह अर्धनग्न अवस्था में समाज की नकारात्मक प्रदर्शनी बन गयी है। शिक्षा के पुराने पाठ्यक्रम वर्तमान के प्रतिस्पर्धी दुनिया में प्रतिस्पर्धा के लायक नही हैं। देश की नीति नियंता इस बात से अच्छी तरह अवगत हैं कि शिक्षा को उन्नत स्तर का बनाकर ही हम स्वस्थ लोकतान्त्रिक व विकसित देश के रूप में प्रतिष्ठित हो सकते हैं। परंतु इच्छा शक्ति का अभाव और राजनीतिक स्वार्थों के लिए देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है।

‌आजादी के 68 साल बीत जाने के बाद भी सरकारी नियंत्रण वाले प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों में न तो शिक्षा का स्तर सुधर पा रहा है और न ही इनमें विद्यार्थियों को बुनियादी सुविधाएं मिल पा रही हैं। जाहिर है कि प्राथमिक स्कूलों में शिक्षा के सुधार के लिए जब तक कोई बड़ा कदम नहीं उठाया जाता, तब तक हालात नहीं बदलेंगे। निम्न मध्यवर्ग और आर्थिक रूप से सामान्य स्थिति वाले लोगों के बच्चों के लिए सरकारी स्कूल ही बचते हैं। देश की एक बड़ी आबादी सरकारी स्कूलों के ही आसरे है। फिर वे चाहे कैसे हों। इन स्कूलों में न तो योग्य अध्यापक हैं और न ही मूलभूत सुविधाएं। इन स्कूलों में पढ़ाई-लिखाई की असलियत स्वयंसेवी संगठन प्रथम की हर साल आने वाली रिपोर्ट बताती है। बड़े अफसर और वे सरकारी कर्मचारी जिनकी आर्थिक स्थिति बेहतर है, अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाते हैं। अधिकारियों के बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ने की अनिवार्यता न होने से ही सरकारी स्कूलों की दुर्दशा हुई है। जब इन अधिकारियों के बच्चे सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ते, तो उनका इन स्कूलों से कोई सीधा लगाव भी नहीं होता। वे इन स्कूलों की तरफ ध्यान नहीं देते। शिक्षा की गुणवत्ता से आशय यही नहीं कि शिक्षक महज रोचक तरीके से शिक्षण करे, अपितु शाला भवन, पुस्तकालय और खेल का मैदान, शिक्षकों का प्रशिक्षण, बैठने के लिये पर्याप्त जगह, शिक्षक विद्यार्थी अनुपात, पर्याप्त शौचालय (बालक-बालिका के लिए अलग-अलग) आदि व कुछ और बातें यथा शिक्षकों का व्यवहार व सामाजिक समरसता में कमी आदि ऐसी बाते हैं जो कि गुणवत्ता पूर्ण शिक्षण में कमी के प्रमुख कारक हैं।

‌वास्तव में सरकारी विद्यालयों को केवल धन आवंटन और ढांचागत सुविधाएं उपलब्ध कराना ही पर्याप्त नहीं होगा। प्राथमिक शिक्षा में सुधार के लिए संपूर्ण व्यवस्था की खामियों का पूर्णरूपेण निरीक्षण कर उसमें आमूलचूल सुधार व नियमन की आवश्यकता है। सरकारी विद्यालयों में भवन व आवश्यक सुविधाएं होनी चाहिए। पर्याप्त संख्या में शिक्षक व अन्य कर्मचारी भी होने चाहिए। स्कूली शिक्षा में गुणात्मक सुधार सिर्फ सांगठनिक परिवर्तनों से संभव नहीं होगा। हिंदीभाषी राज्यों में स्कूली शिक्षा में भारी वित्तीय निवेश की जरूरत है, ताकि जरूरी बुनियादी आधुनिक सुविधाएं हर स्कूल को उपलब्ध हों। सूचना-प्रौद्योगिकी के व्यापक प्रयोग द्वारा पठन-पाठन की गुणवत्ता में पर्याप्त सुधार किए जा सकते हैं। शिक्षकों व विद्यार्थियों को लैपटॉप, टेबलेट देकर उस पारंपरिक शिक्षण प्रणाली को तिलांजलिदी जा सकती है, जो बच्चों को रट्टू तोता बनाती है। सूचना-प्रौद्योगिकी महंगी जरूर है, किंतु इन राज्यों के बच्चों को अन्य राज्यों के बच्चों के समकक्ष बनाने के लिए यह जरूरी है। सामूहिक नकल के अभिशाप से मुक्ति के लिए शिक्षकों की शिक्षा व प्रशिक्षण में क्रांतिकारी बदलाव की जरूरत है।

‌भारत में शिक्षा अभियानों से जुड़े बहुत से नीति-निर्माता ये मानते हैं कि प्राथमिक शिक्षा की हालत में सुधार के लिए अभी भारत को आने वाले सालों में कठिन चुनौतियों का सामना करना है। बचपन अमूल्य है और जीवन में कुछ प्रारम्भिक वर्षों के लिए ही प्राप्त होता है, इसलिए बस्ते का भार कम रखकर बच्चों को बचपन का आनंद लेने व सामाजिक विकास करने का पर्याप्त अवसर देना चाहिए। सरकारी विद्यालयों में सुधार व प्राथमिक शिक्षा का नियमन शिक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने के लिए दो-आयामी रणनीति होनी चाहिए। समाज या राज्य अपना अधिकतम विकास करने में तभी सक्षम होगा, जब समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमता में वृद्धि कर पाएगा।

स्कूली शिक्षा को बेहतर बनाने के लिए हमें स्कूलों के बारे में अपनी परम्परागत राय को बदलना होगा। शिक्षकों के स्कूलों को कार्यालय न बनाते हुए आंकड़ें देने की बजाय बच्चों के साथ समय बिताने पे जोर देना पड़ेगा। बच्चे अपने शिक्षकों से सतत जुड़े रहना चाहते हैं, विशेषकर प्राथमिक स्तर पर। अतः स्कूलों को कार्यालयीन कामकाज से मुक्त कर प्रभावी शिक्षण संस्थान बनाया जाना चाहिए। हमारे विद्यालय बाल शिक्षण 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए कार्य कर रहे हैं। शिशु शिक्षण के लिए संचालित आंगनवाड़ी और प्रौढ़ शिक्षा के लिए कार्यरत सतत शिक्षा केंद्रों का सम्बन्ध विद्यालय से करने की आवश्यकता है। यदि इन तीनों एजेंसियों यानि आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, शिक्षक और शिक्षा केंद्रों को एकीकृत कर दिया जाए तो 3 से 50 वर्ष तक के लिए शिक्षण की बेहतर व्यवस्था संभव है और समुदाय के सभी वर्गों के लिए स्कूल में प्रवेश और सीखने के अवसर बढ़ सकते हैं।

अधिकांश स्कूल सरकारी कार्यालयों के तरह ही दफ्तर के समय सुबह 10बजे से शाम 5बजे की अवधि में ही खुलते हैं। इस कारण रोजगार में जुटे परिवारों के बच्चों के लिए यह अनुपयोगी सिद्ध हो रहे हैं। विद्यालय समाज के लघुतम इकाई के रूप में 'सामाजिक शिक्षण केंद्रों के रूप में कार्य कर सकते हैं। इस परिकल्पना को साकार करने की दिशा में पहल किये जाने का दायित्व स्थानीय शिक्षण संघ द्वारा पूरा किया जा सकता है। समाज की बुनियादी जरूरत को देखते हुए अगर थाने, चिकित्सालय दिन रात खुले रह सकते हैं तो यह भी आवश्यक है कि विद्यालय कम से कम 12से 16जरूर खुलें।

‌शैक्षणिक सुधार में शिक्षकों की भूमिका सबसे अहम है। अतः शिक्षकों और छात्रों में अनुपात ठीक किया जाए और आदर्श रूप में एक शिक्षक को अधिकतम 20बच्चों को ही ठीक प्रकार से पढ़ाने की जिम्मेदारी दी जाए। शिक्षकों को बेहतर प्रशिक्षण दिया जाए। उन्हें अच्छे प्रशिक्षण के लिए कर्तव्यनिष्ठ, योग्य और क्षमतावान प्रशिक्षकों को सौंपा जाए। शिक्षकों के सही मूल्यांकन के बाद ही उन्हें नवचारी पद्धतियों द्वारा प्रशिक्षण देकर स्कूलों में भेजा जाए। इसके लिए हर प्रदेश में 'शैक्षिक सन्दर्भ एवं स्रोत केंद्र' भी विकशित किया जा सकता है।

प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था को सुधारने के लिए अभिभावकों को जागरूक करने की भी आवश्यकता है क्योंकि शिक्षा क्षेत्र में अनेक सरकारी परियोजनाओं के बारे में अभिभावक जानकारी के अभाव में बच्चों की शिक्षा पर विशेष ध्यान नहीं दे पाते। स्कूली शिक्षा में सुधार के लिए हमें वर्तमान शैक्षिक उद्देश्यों को भी पुनरीक्षित करना होगा। शिक्षा, महज परीक्षा पास करने या नौकरी/रोजगार पाने का साधन नहीं है। शिक्षा विद्यार्थियों के व्यक्तित्व विकास, अन्तर्निहित क्षमताओं के विकास करने और स्वथ्य जीवन निर्माण के लिए भी जरूरी है। शिक्षा प्रत्येक बच्चे को श्रेष्ठ इंसान बनने की ओर प्रेरित करे, तभी वह सार्थक सिध्द हो सकती है। कहा भी गया है ''सा विद्या या विमुक्तये''। अभी पढ़े-लिखे और गैर पढ़े-लिखे व्यक्ति के आचरण और चरित्र में कोई खास अन्तर दिखाई नहीं देता। उल्टे पढ़-लिख लेने के बाद तो व्यक्ति श्रम से जी चुराने लगता है और अनेक प्रकार के दुराचरणों में लिप्त हो जाता है। यह स्थिति एक तरह से हमारी वर्तमान शैक्षिक पध्दति की असफलता सिध्द करती है। अतः यह जरूरी है कि शिक्षा के उद्देश्यों को सामयिक रूप से परिभाषित कर पुनरीक्षित किया जाए और शिक्षा के प्रति अपनी संकीर्ण मानसिकता को खत्म किया जाए।

- शक्ति मिश्रा (लेखक स्वतंत्र टिप्णीकार हैं)

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