जनसंख्याः समृद्धि का एक कारण (भाग एक से आगे)

सम्पूर्ण विश्व में शहरीकरण श्रम विभाजन की सहायता से समृद्धि बढ़ाता है। इसलिए भारत जैसे देशों में शहरीकरण को संपन्नता बढ़ाने के साधन के रूप में अपनाना सरकार के पिछले 50 वर्षों के प्रयासों (ग्रामीण विकास के नाम पर निर्रथक धन का व्यय) की अपेक्षा बेहतर विकल्प है। अभी हाल ही के आर्थर एंडरसन फार्च्यून के विश्वव्यापी सर्वे में भारत के शहरों को सबसे खस्ताहाल स्थिति में पाया गया। निश्चित ही संपन्न देश होने का यह तरीका नहीं है।

सामान्य कुप्रशासन के अलावा, सड़कों की बदतर स्थिति भी हमारे नगरीय क्षेत्र की बर्बादी का एक प्रमुख कारण है। इस मुद्दे पर हम बाद के अध्यायों में विस्तार पूर्वक चर्चा करेंगे। अभी के लिए यह समझें कि हमारे यहां की एसटीडी कोड की पुरस्तक में 400 से अधिक नाम है। अर्थात इतने सारे शहर हैं। परंतु शहरी जनसंख्या का अधिकांश (एक अनुमान के मुताबिक 62.5%) केवल कुछ मुट्ठीभर विशाल महानगरों में केंद्रित है, जो कि प्रतिदिन और बढ़ रहा है। शहरी भूगोल शास्त्री (जो शहरों एवं कस्बों के भूगोल का अध्ययन करते हैं) इस प्रक्रिया क आधिपत्य (Primacy) कहते हैं। आधिपत्य तब होता है जब मुख्य शहर अपने आस पास के कस्बों से सही प्रकार से जुड़ा नहीं होता तथा स्वयं भरता जाता है। यदि सडकें अच्छी होती तो उपनगरों (सैटेलाइट कस्बों) का विकास होता और केवल कुछ गिने चुने महानगरों पर पड़ने वाला अत्यधिक दबाव कम होता और एसटीडी कोड की किताब का प्रत्येक नाम एक छोटा सिंगापुर होता।

अंग्रेजों ने अपने समय में भारत मे कई बढ़िया शहर व असंख्य हिल स्टेशन बनाए। पिछले पचास वर्षों में हमारे सभी शहरी क्षेत्र बर्बाद हो चुके हैं। ब्रिटिश कालीन भारत में सभी हिल स्टेशन किसी न किसी महानगर से जुड़े थे। यथा – दार्जिलिंग-शिलांग का क्षेत्र कोलकाता से, पूना-महाबलेश्वर का क्षेत्र मुंबई से, ऊटू-कुन्नूर का क्षेत्र चेन्नई से तथा शिमला-मसूरी का क्षेत्र दिल्ली से जुड़ा है। इसी तरह से यदि हमारे शहीर भेत्र महानगरों से जुड़ जायें तो वे सभी सिंगापुर की तरह हो सकते हैं। ध्यान रहें, सिंगापुर 1965 में ही आजाद हुआ और कुलियों तथा फेरी वालों की भीड़ से भरे छोटे से गंदे शहर से आज उभरता हुआ विकसित शहर बन गया है।

सड़कों की बदतर स्थिति के कारण भारत मे जरूरत से ज्यादा भीड़ है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि देश में आवश्यकता से अधिक जनसंख्या है। कभी ट्रन या हवाई जहाज से यात्रा करें तो आप पायेंगे कि भारत में विशाल खुले मैदान हैं। जापान, जर्मनी, हॉलैंड एवं बेल्जियम का जनसंख्या घनत्व (प्रति वर्ग किलोमीटर में व्यक्तियों की संख्या) भारत के जनसंख्या घनत्व से अधिक है फिर भी इन देशों के शहरों में अत्यधिक भीड़ की समस्या नहीं है। शहरों में बढ़ती अत्यधिक भीड़ को रोकने का उपाय परिवार नियंत्रण नहीं है, वरन् वे सड़कें हैं जो बहुत सारे कस्बों को मुख्य शहर से जोड़ेंगीं। बहुत सारे शहरी क्षेत्र अर्थात 400 सिंगापुर होने से भारतीयों के पास आवश्यकतानुरूप रहने के लिए स्थान होगा तथा अत्यधिक भीड़ की समस्या समाप्त होगी।

इसलिए यह तर्क दृष्टिकोणों में द्वंद पैदा करता है। हजारों स्वशासित व स्व-पर्याप्त ग्रामीण संघों (गांधी व नेहरू का दृष्टिकोण) के रूप में भारत का भविष्य देखने की अपेक्षा हम भारत को एक शहरी सभ्यता के रूप में देख सकते हैं। ऐसे 400 बढ़िया शहरों के मध्य, जो कि सड़क, रेल, या वायुमार्ग द्वारा भली प्रकार जुड़े हों, सर्वाधिक व्यापार सबसे कम कीमत पर संपन्न हो सकता है। घटिया परिवहन व्यवस्था व्यापार को मंहगा व धीमा बनाती है। एक ट्रक एक दिन में भारतीय राजमार्गों पर लगभग 250 किमी चलता है जबकि शेष संसार में 600 किमी से अधिक चलता है।

ऐसा कहा जाता है कि “प्रत्येक बड़ा शहर अपने परिवहन तंत्र पर विशाल मकड़ी की तरह बैठा होता है।” भारत को भी ऐसे शहरों एवं कस्बों की आवश्यकता है।

चूंकि मानव मात्र ही आर्थिक गतिविधियां संपन्न कर सकते हैं और चूंकि शहर समृद्ध होते हैं अतः ऐसा कहा जाना चाहिए कि “ जनसंख्या को गरीबी का कारण बताने वाला सिद्धांत” शैतान का दर्शन है।

यह दर्शन माता-पिता को बच्चे पैदा करने के कारण शर्मिंदा करता है। यह दर्शन बच्चों में यह भावना पैदा करता है कि वे संसाधन नहीं हैं वरन् समस्या हैं। यह दर्शन मार्ग-दुर्घटनाओं के आंकड़ों पर मानवद्वेषी नजर रखता है और कहता है कि हमारी असुरक्षित सड़कें बढ़ती जनसंख्या की समस्या का एक उदाहरण हैं।

मानव दुनिया के सर्वोत्तम संसाधन हैं क्योंकि उनके पास सोचने के लिए मानव मस्तिष्क है। आप उसी मस्तिष्क में ज्ञान उड़ेलने का अर्थात् खुराक देने का प्रयास कर रहे हैं। अतः कृपया यह निश्चित कर लें कि जो भी खुराक आप मस्तिष्क को दें वह सत्य पर आधारित हो। असत्य दर्शन आपके मस्तिष्क को मृत कर देगा तथा फिर आपको यह नहीं सोचने देगा कि आप अपने दिमाग के प्रयोग व व्यापार करने की योग्यता से, मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था में अपना सर्वोत्तम कार्य करते हुए धन पैदा कर सकते हैं। बल्कि यह आपको इस प्रकार सोचने के लिए प्रशिक्षित करेगा कि आप एवं आपके भाई-बंधु ही विकराल समस्या हैं, जिनके समाधान के लिए आपको राजनीतिक कार्यवाही की आवश्यकता है।

साभारः सेंटर फॉर सिविल सोसायटी (सीसीएस)

Category: