जनसंख्याः समृद्धि का एक कारण (भाग एक)

जब ऐसा कहा गया है कि मानव (Home Economicus) धन पैदा करने के लिए तैयार किया गया एक यंत्र है, तो भारतीय अर्थशास्त्र में बताए जा रहे उस तर्क की जांच करना अत्यंत आवश्यक हो जाता है, जिसके अनुसार भारत की विशाल जनसंख्या गरीबी का एक कारण है। यदि मनुष्य एक मात्र ऐसी प्रजाति है जो धन पैदा कर सकती है, तो इसकी अधिक संख्या गरीबी का कारण कैसे हो सकती है? सच क्या है ?

सच यह है कि नक्शे पर अंकित प्रत्येक बिंदु, जो किसी शहर या कस्बे को प्रदर्शित करता है और घनी आबादी वाला है, अन्य स्थानों (यथा गांव आदि जो नक्शे पर नहीं दिखते) की अपेक्षा समृद्धि है। भीड़ भरी दिल्ली में खाली पड़े झुमरी तलैया के मुकाबले कहीं ज्यादा लखपति व करोड़पति, ज्यादा मोबाइल फोन या बड़ी कारें और तरण ताल हैं। स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठता है – ऐसा क्यों? उत्तर के लिए हमें देखना होगा – अर्थशास्त्र की ओर। अर्थशास्त्र यानि धन पैदा करने का अध्ययन।

चूंकि हम व्यापार कर सकते हैं, अतः अपने उन कार्यों में हम विशेषज्ञता अर्जित करते हैं, जिन्हें हम ही सबसे अच्छे तरीके से कर सकते हैं और इन्हें दूसरों की उन वस्तुओं या कार्यों से बदल लेते हैं, जिन्हें वे सबसे अच्छी तरह से कर सकते हैं। जानवरों की तरह मनुष्य स्व-पर्याप्ती (self-sufficient) होने की कोशिश नहीं करते हैं। वरन् ये अपने लिए एक विशेष कार्यक्षेत्र चुनते हैं। इन विशिष्ट कार्यक्षेत्रों में वे उन वस्तुओं या सेवाओं का उत्पादन करते हैं, जिनका बाजार अर्थव्यवस्था में विनिमय किया जा सके। किसान, मछुआरे, गड़रिये, पत्रकार, दंत चिकित्सक, धोबी इत्यादि सभी इसी व्यवस्था के उदाहरण हैं। मनुष्यों के अतिरिक्त कोई भी अन्य प्रजाति इस ढंग से विशेषीकृत नहीं होती है क्योंकि उनके पास बाजार अर्थव्यवस्था नहीं होती है। यह बजार अर्थव्यवस्था सिर्फ हम मनुष्यों की व्यापार करने की विशेष योग्यता का ही परिणाम है। इसी प्रकार धन पैदा किया जाता है।

अतः आर्थिक रूप से मनुष्यों को कभी भी स्व-पर्याप्ती (self-sufficient) होने की सलाह नहीं दी जानी चाहिए। जरा सोचिए कि यदि आपने निश्चय किया कि आप सभी कार्य अपने आप करेंगे तथा सेवाओं व वस्तुओं का आदान-प्रदान नहीं करेंगे, तो क्या होगा? सोचिए यदि आपका परिवार, फिर आपका गांव या शहर सभी स्व- पर्याप्ती हो जायें? इसका अर्थ यह होगा कि आपको न केवल अपना भोजन पैदा करने एवं कपड़े धोने के लिए बाध्य होना पड़ेगा वरन् आपको अपना मकान बनाना, सर्जरी या ऑपरेशन करना आदि भी सीखना पड़ेगा। इस प्रकार स्व-पर्याप्तता कभी भी जीवन स्तर को ऊपर नहीं उठाती। इसका कुल परिणाम यही होता है कि आपकी उत्पादन ऊर्जा आपके विशेष योग्यता वाले क्षेत्रों से हटकर ऐसी जगहों व कार्यों पर बर्बाद होना शुरू होती है जिनमें आपको महारत नहीं होती।

यदि इस प्रकार की स्व-पर्याप्तता एक व्यक्ति, परिवार, एक गांव, एक कस्बे के ले नुकसानदेह है तो निश्चित ही भारत जैसा एक महना देश भी इस रास्ते को अपनाकर फायदे में नहीं रह सकता।

स्व-पर्याप्तता एक प्रकार की आर्थिक आत्महत्या (Economic Suicide) है

स्व-पर्याप्तता को समझने के लिए एक छोटा सा प्रयोग करें – बच्चों की एक कक्षा में जाइये और उनसे पूछिए कि वे बडे होकर क्या बनना चाहते हैं? वे जवाब देंगे – एक्टर, डान्सर, सिपाही, डॉक्टर आदि। मैं शर्त लगा सकता हूं कि उनमें से कोई भी यह नहीं कहेगा कि मैं बड़ा होकर स्व-पर्याप्ती बनूंगा। (अर्थात स्वयं को इस रूप में विकसित करूंगा कि सारे कार्य स्वयं कर सकूं, किसी पर निर्भर न रहना पड़े)। यदि स्व-पर्याप्तता छोटे बच्चों के तर्कों से विरोधी है तो यह पूरे देश के लिए कैसे तार्किक हो सकती है?

जब हम बाजार-अर्थव्यवस्था को विशेषीकृत करते हैं तो एक प्रक्रिया शुरू होती है, जिसे अर्थशास्त्री “श्रम विभाजन” कहते हैं।

अर्थशास्त्र श्रम विभाजन द्वारा धन की उत्पत्ति का अध्ययन है

अनेक विशेष योग्यताओं वाली भूमिकाओं के बीच श्रम विभाजन शहरी क्षेत्रों में ही सर्वाधिक उपयुक्त रूप से संभव है। एक गांव में जहां बहुत कम लोग होते हैं, वहां श्रम विभाजन अत्यंत दुष्कर कार्य है। यही वजह है कि गांव में सफल शल्य चिकित्सक, यहां तक कि सफल धोबी होने की गुंजाइश भी कम होती है।

इसीलिए नक्शे पर दिखने वाला प्रत्येक बिंदु (कोई शहर या कस्बा) घनी आबादी वाला होता है और समृद्ध होता है। किसी भी शहर या कस्बे (जहां अपेक्षाकृत जनसंख्या ज्यादा होती है) में कम जनसंख्या वाले गांव के मुकाबले अधिक संपन्नता होती है क्योंकि वहां श्रम विभाजन अधिक होता है। श्रम विभाजन की सीमा व मात्रा बाजार के आकार पर निर्भर करती है। बाजार जितना व्यापक होता है, श्रम विभाजन उतना ही ज्यादा होता है। उदाहरण के लिए – यदि आप एक चाइनीज भोजनालय खोलना चाहते हैं और चाहते है कि प्रतिदिन कम से कम 100 ग्राहक आएं और यदि 100 में एक व्यक्ति किसी दिन चाइनीज भोजन करना चाहता है तो अपने 100 ग्राहक प्रतिदिन की आवश्यकता की पूर्ति के लिए आपको ऐसे कस्बे या शहर की आवश्यकता होगी जहां कम से कम दस हजार संभावित ग्राहक हों। यही कारण है कि भीड़ भरे, ज्यादा जनसंख्या वाले शहर समृद्ध हैं – क्योंकि वहां श्रम का विभाजन ज्यादा होता है। यह एक शाश्वत प्रक्रिया है- केवल दिल्ली या मुंबई ही नहीं वरन् लंदन, टोकियो, न्यूयार्क एवं पेरिस आदि सभी घनी जनसंख्या युक्त एवं समृद्ध हैं।

संसार का लगभग 50 प्रतिशत शहरीकरण हो चुका है – अर्थात विश्व की 50 प्रतिशत जनसंख्या शहरों एवं कस्बों में निवास करती है। भारत विश्व के इस औसत प्रतिशत से काफी नीचे, मात्र 30 प्रतिशत पर है। परंतु भारते के समृद्धतम राज्य गुजरात एवं महाराष्ट्र में शहरीकरण का औसत विश्व के औसत 50 प्रतिशत के आस-पास है जबकि भारत के सबसे गरीब राज्य जैसे – असम एवं बिहार में शहरीकरण का औसत 10 प्रतिशत से भी कम है।

यहां यह जानना महत्वपूर्ण है कि सभ्यता (civilization) शब्द लैटिन भाषा के शब्द सिविटास (civitas) से लिया गया है, जिसका अर्थ शहर (city) होता है। सभ्यता की कहानी, मध्य सागर के चारो ओर बसे हुए तथा एक दूसरे के साथ वस्तुओं और सेवाओं के आदान-प्रदान अर्थात व्यापार करने वाले बड़े शहरों के निर्माण की ही कहानी है। मोहन-जो-दाड़ो एवं हड़प्पा भी, लोथल बंदरगाह द्वारा, मध्य सागर से जुड़े हुए महान शहर थे। इस छोटे और सुरक्षित सागर ने परिवहन की सुविधा दी, जिससे व्यापार को बढ़ावा मिला। शहर एवं कस्बे मानव उपनिवेशिकों की बांबी हैं। शहर को बर्बाद कर विकास को कोई भी प्रयास निरर्थक है।

जारी है...
साभारः जनसंख्याः समृद्धि का एक कारण "सेंटर फॉर सिविल सोसायटी" (सीसीएस)

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