स्कूलबंदी के फरमान का कारण आरटीई की बाध्यता या कुछ और!

देश में शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने के बाद से ही गैर मान्यता प्राप्त निजी स्कूल राज्य सरकारों के निशाने पर हैं। राज्यों के शिक्षा विभागों के बीच अधिक से अधिक स्कूलों को बंद करने की अघोषित प्रतिस्पर्धा सी छिड़ी प्रतीत होती है। उत्तर प्रदेश, हरियाणा, केरल और तमिलनाडू ऐसे स्कूलों को बंद करने के लिए नोटिस जारी करने के मामले में शीर्ष के राज्यों में शामिल हैं। हाल ही में दिल्ली सरकार ने अप्रत्याशित फैसले के तहत एक पब्लिक सर्क्युलर जारी कर गैर मान्यता प्राप्त स्कूलों से आगामी सत्र (अप्रैल 2018) से समस्त शैक्षणिक गतिविधियों को बंद करने का फरमान जारी कर दिया।

एक अनुमान के मुताबिक दिल्ली सरकार के इस फैसले से राज्य के लगभग 2-3 लाख छात्र प्रभावित होंगे। ये ऐसे छात्र होंगे जिनके अभिभावकों ने निशुल्क शिक्षा, निशुल्क यूनिफॉर्म, निशुल्क किताबें और मीड डे मिल इत्यादि के लुभावने प्रलोभनों में पड़ने की बजाए शिक्षा की गुणवत्ता को तरजीह देना पसंद किया होगा। इसके लिए अभिभावकों ने प्रतिमाह 200-800 रूपए खर्च करना भी मंजूर किया होगा। लेकिन सरकार ने अभिभावकों द्वारा अपने नौनिहालों के भविष्य के बाबत देखे गए सपनों को एक झटके में चकनाचूर कर दिया। तर्क दिया गया कि मौज़ूदा शिक्षा का अधिकार कानून के तहत ऐसा करना उनकी मजबूरी थी, हालांकि शिक्षा संविधान की समवर्ती सूची में शामिल है और राज्य सरकार के पास अपने हिसाब से नियम बनाने की शक्तियां मौजूद हैं।

यदि हाल फिलहाल में घटित हुई घटनाओं पर गौर करें तो गैर मान्यता प्राप्त स्कूलों को बंद करने के आदेश की कड़ियां कहीं और जुड़ती प्रतीत होती हैं। बजट स्कूलों के अखिल भारतीय संघ 'नेशनल इंडिपेंडेंट स्कूल्स अलायंस' (निसा) ने दिल्ली के गैर मान्यता प्राप्त स्कूलों को मान्यता प्रदान कराने और उन्हें मुख्यधारा में लाने के लिए शिक्षामंत्री मनीष सिसोदिया से कई चरणों की मीटिंग की और उन्हें संबंधित वास्तविक चुनौतियों से अवगत कराया। शिक्षामंत्री ने पब्लिक मीटिंग में ऐसे स्कूलों के लिए नियमों में ढील देने की घोषणा भी की। बाद में 16 जून 2017 को एक नोटिफिकेशन जारी कर स्कूलों को मान्यता देने के नियमों को लचीला बनाने और गैर मान्यता प्राप्त स्कूलों को मान्यता देने की संभावनाओं पर रिपोर्ट देने के लिए योगेश प्रताप सिंह के नेतृत्व में एक सात सदस्यीय कमेटी भी गठित की थी।

कमेटी के अन्य सदस्यों में धर्मेंद्र सिंह, पवन कुमार, पी.लता तारा, शशिबाला सैनी, राज किशोर व राजीव कुमार शामिल थे। हालांकि सुझाव के बाबत कमेटी कोई रिपोर्ट देती इसके पूर्व ही फरवरी 2018 के पहले सप्ताह में दिल्ली के प्री बोर्ड परीक्षाओं के परिणाम आ गए। प्री बोर्ड परीक्षा में शामिल हुआ छात्रों में से एक तिहाई से भी कम छात्रों ने परीक्षा उतीर्ण की। इस घटना ने दिल्ली में शिक्षा के स्तर में सुधार के तमाम सरकारी दावों की पोल खोल दी। इसके पूर्व प्रजा फाऊंडेशन नामक संस्था द्वारा जारी आंकड़ों ने भी दिल्ली सरकार को बैकफुट पर डाल दिया। फाऊंडेशन द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक 2013-14 से 2015-16 बीच सरकारी स्कूलों में लगभग 1,00,000 (एक लाख) बच्चों का नामांकन घटा है जबकि प्राइवेट स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या इस दौरान लगभग 1,50,000 (डेढ़ लाख) बढ़ी है। इसी प्रकार, वर्ष 2013-14 में कक्षा नौंवी में दाखिल छात्रों में से 44% छात्र 2016-17 में 12वीं कक्षा तक नहीं पहुंच सके। जबकि नौंवी कक्षा में दाखिल छात्रों में 43% छात्र वर्ष 2015-16 में दसवीं की परीक्षा पास नहीं कर सकें।

उक्त घटनाएं इन आशंकाओं को मजबूत करती हैं कि स्कूलों में नामांकन घटने और परीक्षा में खराब प्रदर्शन के कारण सरकार बैकफुट पर है और इसी के मद्देनजर गैर मान्यता प्राप्त स्कूलों को मान्यता प्रदान करने की बजाए उन्हें बंद करना चाहती है। चूंकि बजट स्कूलों के अधिकांश छात्र आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग से आते हैं, और सरकारी स्कूलों में भी दाखिला लेने वाले छात्रों की बड़ी तादात इसी वर्ग की होती है इसलिए प्रतीत होता है कि सरकार अपने स्कूलों को भरने के लिए ऐसे छोटे गैर मान्यता प्राप्त स्कूलों को बंद करना चाहती है ताकि सरकारी स्कूलों में नामांकन में वृद्धि दिखाई जा सके।

- आजादी.मी

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