भारत में निजी स्कूलों के समक्ष नीतिगत चुनौतियां (2)

अध्यापकों की शैक्षणिक योग्यता और वेतन

शिक्षा का अधिकार (आरटीई) कानून 2009 में शिक्षक होने के लिए बैचलर ऑफ एजुकेशन (बीएड) की योग्यता को अनिवार्य बना दिया गया है। इसके अतिरिक्त, पहले से ही अध्यापनरत समस्त अध्यापकों के लिए अध्यापक पात्रता परीक्षा (टीईटी) उतीर्ण करना भी अनिवार्य कर दिया गया है। राज्य सरकारों ने भी उक्त नियमों में रियायत नहीं दी और सभी निजी स्कूलों के अध्यापकों के लिए पांच वर्ष के भीतर टीईटी उतीर्ण करना आवश्यक कर दिया।

पहली बात तो ये कि भारत में वर्तमान में प्रशिक्षित शिक्षकों की इतनी बड़ी संख्या मौजूद नहीं है जिससे कि मौजूदा अध्यापकों को उनसे बदला जा सके। दूसरी बात बीपीएस बीएड व टीईटी उतीर्ण अध्यापकों को नियुक्त करने का अतिरिक्त खर्च भी वहन नहीं कर सकते।

स्कूलों को अपने शिक्षकों को सामयिक वेतन आयोग की सिफारिशों के अनुरूप वेतन प्रदान करने को भी कहा गया है। बीपीएस कम आय वाले अभिभावकों द्वारा वहन किए जा सकने वाले फीस प्रकोष्ठ (ब्रैकेट) में मानक गुणवत्ता युक्त शिक्षा प्रदान करने के सस्ते माध्यम हैं। अध्यापकों के वेतन में बढ़ोतरी इन स्कूलों के संचालन के सामाजिक व आर्थिक मॉडल के अनुरूप नहीं है। ऐसा करना स्कूलों को फीस बढ़ाने के लिए बाध्य करना है जो कि अभिभावकों के उस समूह के खर्च करने की क्षमता के अनुरूप नहीं है जिन्हें ये अपनी सेवा प्रदान करते हैं।  

व्यावसायिक शुल्क और श्रम कानून

एक तरफ तो स्कूलों को गैर लाभकारी संस्थान माना जाता है, लेकिन दूसरी तरफ उन पर बिजली, पानी, संपत्ति, भूमि परिवर्तन (लैंड कन्वर्जन) जैसी सुविधाओं के लिए शुल्क व कर वाणिज्यिक दर पर वसूले जाते हैं। सरकार को चाहिए कि गैर सरकारी शिक्षा सेवा प्रदाताओं की स्थिति को स्पष्ट करे। जिन श्रम कानूनों का प्रावधान खतरनाक उद्योग धंधों में कार्यरत मजदूरों की सेहत को ध्यान में रखते हुए किया गया था, उन्हे भी विस्तारित कर स्कूलों पर लागू कर दिया गया। श्रम कानूनों को लागू करने से तात्पर्य ईएसआईसी योजना, एम्प्लॉइज़ प्रॉविडेंट फंड व ग्रेच्युटी का प्रावधान करना है। ये प्रावधान बहुत बड़ी मांग नहीं है, लेकिन इनसे ‘इंस्पेक्टर राज’ की वापसी का खतरा अवश्य पैदा हो गया है।
शुल्क नियमन (फी रेग्युलेशन)

एक तरफ तो सेवाओं और सुविधाओं को लेकर अभिभावकों की अपेक्षाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं जबकि सरकार की तरफ से स्कूलों के संचालन से संबंधित कड़े व अनिश्चित नियमन का कार्य जारी है। दूसरी तरफ स्कूली फीस में वृद्धि को भी आमतौर पर बहुत अधिक मान लिया जाता है। तमिलनाडू, राजस्थान, कर्नाटक, महाराष्ट्र और पंजाब राज्यों ने स्कूली फीस के नियमन को लेकर कानून पास कर दिया है, यहां तक कि अदालतों द्वारा भी सरकारों से निजी स्कूलों द्वारा लिए जाने वाले फीस को निर्धारित करने संबंधी निर्देश देने के कई मामले सामने आए हैं।

भारत में लगभग 90 प्रतिशत निजी सकूल बजट प्राइवेट स्कूलों के वर्ग में आते हैं जो सरकारी स्कूलों में होने वाले प्रति छात्र खर्च से भी कम खर्च में शिक्षा प्रदान करते हैं, वह भी तब जबकि प्रति छात्र सरकारी खर्च के हिसाब में केवल आवर्ती खर्चे ही शामिल किए जाते हैं। उधर, निजी स्कूलों की फीस में जमीन व भवन निर्माण में होने वाले भारी भरकम सहित समस्त वित्तीय निवेश भी शामिल होते हैं। फीस के रूप में बड़ी रकम वसूलने वाले स्कूल सीमित संख्या में ही हैं, उनमें से भी ऐसे स्कूलों की संख्या बेहद कम है जो कभी कभार अकादमिक सत्र के मध्य में फीस निर्धारित करने के दोषी पाए जाते हैं। किंतु फीस नियंत्रण की सबसे ज्यादा मार बीपीएस को झेलनी पड़ती है। यहां तक कि सरकार के पास इतने विस्तृत और विविध क्षेत्र में फीस निर्धारण के लिए आवश्यक अंतर्दृष्टि का आभाव भी है। इसके समाधान के लिए किया यह जा सकता है कि, किसी भी अकादमिक सत्र में 15 प्रतिशत से अधिक फीस वृद्धि करने वाले स्कूलों के वजहों को देखते हुए इसका अलग से हल निकालने का प्रयास किया जाए। 
 

आरटीई एक्ट 2009 के तहत 25 प्रतिशत सीटों का आरक्षित होना

आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्लूएस) एवं वंचित तबकों (डिसएडवांटेज ग्रुप) के बच्चों के लिए निजी स्कूलों की 25 प्रतिशत सीटों को आरक्षित रखने के प्रावधान किया गया है, जबकि बीपीएस बड़े पैमाने पर ईडब्लूएस छात्रों को ही अपनी सेवाएं प्रदान करते हैं। चूंकि बीपीएस स्कूलों की संरचना ही कम अथवा मध्यम आय वर्गों को सेवा प्रदान करना है, ऐसे में इन स्कूलों में ईडब्लूएस वर्ग के छात्रों के लिए कोटे का प्रावधान बहुत अधिक मायने नहीं रखता है। आरटीई एक्ट 2009 की धारा (12) (1) (सी) को लागू किए जाने के जमीनी हकीक़त के अनुभव

इसके अनुपालन में गंभीर खामियों की ओर इंगित करते हैः 
• दाखिले के लिए प्रवेश स्तर (एंट्री लेवल) क्या होगा, पहला दर्जा या नर्सरी इस बाबत कुछ स्पष्ट नहीं है
• किसी क्षेत्र में सरकारी स्कूलों के लिए पड़ोस का मानदंड (नेबरहुड क्राइटेरिया) क्या है
• दाखिले की लंबी प्रक्रिया, कुछ मामलों में तो दाखिले वर्ष भर जारी रहते हैं
• दाखिला न होने की दशा में सीटों को खाली रखना
• सरकार द्वारा प्रति छात्र किए जाने वाले खर्च से कम राशि का स्कूलों को बतौर फीस प्रतिपूर्ति देना
• फीस राशि की प्रतिपूर्ति प्रक्रिया में लंबी देरी
• आय के आधार पर ईडब्लूएस वर्ग के लिए अयोग्य होने के बावजूद अभिभावकों द्वारा फर्जी आय प्रमाण पत्र के आधार पर अपने बच्चों का दाखिला कराना
• दस्तावेजों की प्रमाणिकता आदि के जांच की जिम्मेदारी स्कूलों के जिम्मे डालना

 

सरकार को ईडब्लूएस वर्ग के छात्रों को शिक्षा उपलब्ध कराने के प्रावधान करना चाहिए न कि छात्रों को स्वयं शिक्षा उपलब्ध कराने का कार्य करना चाहिए। सरकार को चाहिए कि वह ईडब्लूएस वर्ग के छात्रों को कोष/ छात्रवृति आदि के माध्यम से सशक्त करे ताकि वे स्कूल जाने में सक्षम हो सकें। फीस प्रतिपूर्ति की राशि सीधे छात्रों को पेशगी (अडवांस) मिलनी चाहिए।

सुरक्षा संबंधी नियम

छात्रों की सुरक्षा से संबंधित मुद्दे सभी के लिए बड़ी चिंता का विषय हैं। लेकिन फिर भी स्कूलों के लिए सुरक्षा संबंधी नियमों का व्यवहारिक, मापने योग्य व किफायती होना आवश्यक है। इसके साथ ही व्यापक हित धारकों के साथ परामर्श के बगैर नियमों में जल्दी जल्दी और बार बार बदलाव नहीं होने चाहिए। पूर्व में, राज्य सरकारों और न्यायालयों द्वारा भवनों की सुरक्षा, आग से सुरक्षा, पर्यावरण सुरक्षा व सुरक्षित परिवहन व्यवस्था से संबंधित नियम हितधारकों से बगैर परामर्श के ही लागू कर दिए गए जिससे इन नियमों के पालन में लगने वाली लागत स्कूलों के लिए बड़ी आर्थिक बोझ बन गई। ये आदेश यहीं तक सीमित नहीं रहे बल्कि मनोचिकित्सकों व काउंसलरों की नियुक्ति, कक्षाओं व गलियारों में सीसीटीवी कैमरा लगाने, बसों में प्रशिक्षित ड्राइवरों व कंडक्टरों की नियुक्ति जैसे तमाम अन्य नियमों तक विस्तारित कर दिए गए। ऐसे ही एक मामले में हरियाणा उच्च न्यायालय ने छात्र छात्राओं के शारीरिक शोषण की घटनाओं को रोकने के लिए स्कूली बसों में उभयलिंगी समुदाय (ट्रांसजेंडर कम्युनिटी) के कंडक्टरों की नियुक्ति के आदेश जारी किए थे। ऐसे प्रावधान वांछनीय भले हो सकते हैं लेकिन सरकारों को ऐसे आदेशों के अनुपालन कराने के दौरान इनकी संभाव्यता (फिज़ीबिलीटी) और लागत व लाभ विश्लेषण (कॉस्ट बेनिफीट एनालिसिस) का भी ध्यान अवश्य रखना चाहिए।

वित्तीय सहायता का अभाव

एक तरफ जहां स्कूलों से उत्कृष्ट आधारभूत संरचना (इंफ्रास्ट्रक्चर), अध्यापन और खेल सुविधाओं की अपेक्षा की जाती है वहीं इस क्षेत्र में निवेश लाने के लिए कोई वित्तीय सहायता उपलब्ध नहीं है। चूंकि स्कूल संचालन का कार्य गैर लाभकारी प्रयोजन है इसलिए मौजूता वित्तीय संस्थान जैसे बैंक इत्यादि स्कूल खोलने व इन्हें विस्तारित करने के लिए कर्ज इत्यादि भी नहीं प्रदान करते। केंद्र व राज्य सरकारों के द्वारा स्कूल खोलने, इसके संचालन व दिन प्रतिदिन के प्रबंधन कार्य में बढ़ते दखल के कारण यह क्षेत्र भ्रष्ट अधिकारियों के और ज्यादा चंगुल में फंस गया है। सरकार को चाहिए कि वह ‘स्कूल इन्वेस्टमेंट कॉर्पोरेशन’ (विद्यालय निवेश निगम) जैसी संस्था का निर्माण करे ताकि स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में अधिक से अधिक निवेश आने का रास्ता साफ हो सके। इस संदर्भ में पाकिस्तानी मॉडल ‘पंजाब एजुकेशन फाउंडेशन’ से सबक ली जा सकती है। सरकार को चाहिए कि स्कूली शिक्षा को नौकरशाहों के ‘इंस्पेक्टर राज’ से मुक्त करने की दिशा में कार्य करे। तकनीकि के अधिकाधिक प्रयोग से मानवीय हस्तक्षेप की गुंजाइश को कम किया जाना चाहिए।

संदर्भ

ए. वी. पब्लिक स्कूल व अन्य बनाम हरियाणा सरकार व अन्य (2015) 201 की सीडब्लूपी संख्या 21269

मिनिस्ट्री ऑफ ह्यूमन रिसोर्स डेवलपमेंट द्वारा आरटीई एक्ट तहत नियमों के अनुपालन के संदर्भ में पूछे गए गैर तारांकित प्रश्न संख्या 2543 का जवाब। लोक सभा में 5 अगस्त 2015 को हुई चर्चा (श्रीमती खेर, लोकसभा सदस्य)

श्रम एवं रोजगार मंत्रालय की अधिसूचना जी.एस.आर 1166 (ई). द गैजेट ऑफ इंडियाः एक्सट्राऑर्डिनेरी, भाग 2 – धारा 3 (1). नई दिल्ली. 22 दिसंबर 2016

नेशनल इंडिपेंडेंट स्कूल्स अलायंस। आरटीई एक्ट 2014 के कारण स्कूलों के बंद होने संबंधी डाटा. http://nisaindia.org/data-on-school-closures-20140318.

वाधवा, मयंक। वर्ष 2001 में सेंटर फॉर सिविल सोसायटी द्वारा आयोजित रिसर्च इंटर्नशिप पेपरः ‘लाइसेंसेज़ टू ओपन ए स्कूलः इट्स ऑल अबाउट मनी’। 6 फरवरी 2017 में मूल्यांकित http://www.ccs.in/sites/default/files/files/wp0001.pdf.

लेखक परिचयः
कुलभूषण शर्मा

कुलभूषण शर्मा, ‘फेडरेशन ऑफ प्राइवेट स्कूल्स एसोसिएशन’, हरियाणा के प्रेसिडेंट हैं। वह ‘नेशनल इंडिपेंडेंट स्कूल्स अलाएंस’ (निसा) के प्रेसिडेंट, ‘पैट्रियॉटिक फोरम ऑफ इंडिया’ के स्टेट प्रेसिडेंट व ‘राष्ट्रीय मानवाधिकार संरक्षण संगठन’ के कार्यकारी स्टेट प्रेसिडेंट भी हैं। वह पूर्व में ‘राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान’ के जनरल काउंसिल के सदस्य और ‘स्कूल एजुकेशन रूल्स रिव्यू कमेटी’ के सदस्य भी रहे हैं।

 

अमित चंद्रा
अमित सेंटर फॉर सिविल सोसायटी (सीसीएस) की पॉलिसी एडवायजरी के हेड हैं। उन्होंने शहरी परिवेश में स्ट्रीट वेंडिंग को वैध रोजगार के रूप में पहचाने दिलाने के लिए ‘जीविकाः लॉ, लिबर्टी एंड लाइवलीहुड’ एडवोकेसी कैंपेन का सफल संचालन किया और राजस्थान व बिहार में कानून के गठन की राह सुनिश्चित करने में अहम भूमिका निभाई।

- सेंटर फॉर सिविल सोसायटी द्वारा प्रकाशित 'रिपोर्ट्स ऑन बजट प्राइवेट स्कूल्स इन इंडिया' से साभार

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