भारत में बजट प्राइवेट स्कूलों के समक्ष प्रमुख नीतिगत चुनौतियां

भारत में, सरकार 6 से 14 वर्ष आयुवर्ग के बच्चों को प्रारंभिक शिक्षा प्रदान करने के लिए संवैधानिक रूप से बाध्य है। हमारे देश में शिक्षा नीति की संरचना इस प्रकार की गई है कि वह शिक्षा मयस्सर कराने के लिए मुख्य रूप से सरकार द्वारा संचालित किए जाने वाले स्कूलों पर केंद्रीत है। यकीनन, गैर सरकारी संस्थानों द्वारा संचालित स्कूलों को दोयम स्तर का दर्जा हासिल है। इसलिए, हमें अपने पर्यवेक्षण के दौरान सरकारी और निजी स्कूलों के प्रति नीतिगत दृष्टिकोण में स्पष्ट अंतर देखने को मिला। सरकारी स्कूलों के संबंद्ध में यह दृष्टिकोण जहां सहयोगी और सुविधा प्रदान करने वाला होता है वहीं निजी स्कूलों के प्रति यह दृष्टिकोण अधिक नियंत्रणकारी और नियमन युक्त होता है। स्कूल इंफ्रास्ट्रक्चर (बुनियादी ढांचे) से संबंधित मानदंड एक ऐसा ही क्षेत्र है जहां नियमन में असंगतता ज्यादा स्पष्ट तौर पर दिखाई देती है।

उदाहरण के लिए, एक सरकारी स्कूल में जब पुस्तकालय की सुविधा उपलब्ध नहीं होती तो नीतिगत प्रतिक्रिया उन सभी स्कूलों में सार्वजनिक कोष से पुस्तकालय बनाने वाली होती है। हालांकि जब किसी निजी स्कूल में पुस्तकालय सुविधा उपलब्ध नहीं होती है तो नीतिगत प्रतिक्रिया स्कूल की मान्यता रद्द करने की धमकी देते हुए एक निश्चित समय सीमा के भीतर पुस्तकालय बनाने के लिए स्कूल प्रबंधन पर दबाव बनाने वाली होती है। हम सभी को यह समझना होगा कि बजट प्राइवेट स्कूल्स (बीपीएस) सामुदायिक स्कूल होते हैं और उसी पारिस्थितिक तंत्र का हिस्सा होते हैं जिसमें छात्र, अभिभावक और अध्यापक सम्मिलित होते हैं। स्कूल अपने आस पास की पारिस्थितिकी से ज्यादा अलग नहीं हो सकते। सरकारी स्कूलों की क्षमता में वृद्धि के लिए सरकार सहयोगात्मक दृष्टिकोण अपनाती है लेकिन उसी सरकार का दृष्टिकोण निजी स्कूलों को लेकर सर्वथा विपरीत और कड़े नियमन वाला होता है।

भारत में निजी स्कूल कम संख्या में हमेशा से अस्तित्व में रहे हैं और मुख्यतः शहरी क्षेत्रों तक सीमित रहे हैं। हालांकि बीते तीन दशकों के दौरान सस्ती दर पर गुणवत्ता युक्त शिक्षा उपलब्ध कराने वाले बजट प्राइवेट स्कूलों का उद्भव हुआ और ग्रामीण क्षेत्रों में इनका विस्तार हुआ। अस्तित्व में आने के बाद से बजट प्राइवेट स्कूल देश में स्कूल जाने योग्य लगभग 40 प्रतिशत बच्चों को अपनी सेवाएं प्रदान कर रहे हैं, फिर भी उन्हें उन्हीं समान नीतिगत ढांचों के तहत काम करना पड़ता है जिनके तहत बड़े निजी स्कूल और सरकारी स्कूल संचालित होते हैं। नियामक मानदंडों का अनुपालन करना एक गंभीर मुद्दा बन गया है और इसका परिणाम देश के हजारों स्कूलों की बंदी के रूप में देखने को मिल रहा है। जो अबतक बंद नहीं हुए हैं उन्हें भी अस्तित्व में बने रहने के लिए दिन प्रतिदिन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। प्रस्तुत लेख में बीपीएस द्वारा सामना किए जाने वाले प्रमुख नीतिगत चुनौतियों पर चर्चा की गई है।
 

स्कूल खोलना और चलाना
एक ऐसे देश में जहां ज्यादा से ज्यादा संख्या में स्कूल खोलने की आवश्यकता है, यह जानकर अत्यंत निराशा होती है कि यहां स्कूल खोलना और उसका संचालन करना कितना मुश्किल कार्य है। स्थान और स्तर (प्रायमरी, सेकेंडरी अथवा सीनियर सेकेंडरी) के आधार पर एक स्कूल को खोलने के लिए 15 से 36 अनुमतियों (सर्टिफिकेट्स, मान्यताओं और दस्तावेज़ों) की जरूरत पड़ती है। इसके अलावा समय समय पर बदलते रहने वाले नियमों और उनके अनुपालन की बाध्यता के कारण यह कार्य और अधिक मुश्किल होता जाता है। सेंटर फ़ॉर सिविल सोसायटी (सीसीएस) द्वारा वर्ष 2001 में कराए गए एक अध्ययन के मुताबिक एक स्कूल खोलने के लिए कम से कम 15 लाइसेंसो और अनुमतियों की आवश्यकता होती है। वर्ष 2001 के बाद से केवल इतना परिवर्तन हुआ है कि कुछ राज्यों द्वारा स्कूल खोलने के लिए आवश्यक ‘एसेंसियल सर्टिफिकेट’ की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया गया है।

स्कूलों को स्कूल भवन के निर्माण कार्य व अन्य सुविधाओं की व्यवस्था करने के दौरान के उस समय के नियम कानूनों का अनुपालन करना होता है। हालांकि, विभिन्न प्राधिकरणों द्वारा समय समय पर नए नए नियमों को बनाने का क्रम जारी रहता है और उन्हें बीते समय से प्रभावी भी कराया जाता रहता है। ऐसे में उन नियमों, विशेषकर भवन निर्माण व इंफ्रास्ट्रक्चर से संबंधित कानूनों में हुए परिवर्तन का अनुपालन करना अत्यंत मुश्किल हो जाता है। उदाहरण के लिए, कर्नाटक सरकार ने सभी स्कूलों के लिए खेल के मैदान के रूप में 1 से 1.5 एकड़ की खुली भूमि (ओपन स्पेस) रखना अनिवार्य करने का फैसला लिया है। इसी प्रकार, स्कूलों को काउंसलर, मनोचिकित्सक, महिला सहायिका, क्षेत्रिय भाषा में पाठ्यक्रम, स्कूल बसों की सुरक्षा, सीसीटीवी कैमरों की स्थापना जैसी आवश्यकताओं के संदर्भ में भी आदेश पारित किये गए हैं। अकादमिक सत्र (एकेडमिक सेशन) के बीच में लागू किए जाने वाले ऐसे ऐसे नियमों का अनुपालन और उनके खर्चों को वहन करना स्कूलों के लिए अत्यधिक मुश्किल कार्य हो जाता है।

उदाहरण के लिए तेलंगाना के श्रम विभाग ने दिसंबर 2016 में जारी किए अपने सर्क्युलर के माध्यम से स्कूलों से अपने उन सभी शैक्षणिक व गैर शैक्षणिक कर्मचारियों का पंजीकरण कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ईएसआईसी) के तहत पंजीकृत कराने का आदेश पारित किया जिनका वेतन प्रति माह 21 हजार रूपए से कम है। यह आदेश ईएसआईसी एक्ट में वर्ष 2008 में किए गए उस संसोधन पर आधारित था जिसके तहत स्कूलों के लिए वर्ष 2008 से नियोक्ता सहयोग राशि को जमा कराना आवश्यक किया गया था। हालांकि ऐसे प्रावधानों को लागू करने के पीछे की नियत तारीफ के काबिल है लेकिन इससे स्कूलों के समक्ष अत्यंत मुश्किल परिस्थितियां तो उत्पन्न हो ही जाती है। 

मूलभूत संरचना संबंधी नियम
स्कूली शिक्षा को नियमित (रेग्युलेट) करने के वर्तमान दृष्टिकोण के कारण उत्पन्न होने वाली प्रमुख चुनौतियों में से एक इसके निवेश (इनपुट) आधारित होना है। उदाहरण के लिए, नियमन के केंद्र का भौतिक संरचना (इंफ्रास्ट्रक्चर), शिक्षकों के वेतन, केंद्र व राज्य सरकारों के द्वारा पारित तमाम नियमों के अनुपालन आधारित होना है। वैसे तो ये कानून बड़े व एलीट प्राइवेट स्कूलों के लिए बने प्रतीत होते हैं लेकिन छोटे बजट प्राइवेट स्कूलों को भी उन नियमों का पालन करने को मजबूर होना पड़ता है जबकि इन स्कूलों की पूरी संरचना ही उनसे अलग होती है। उदाहरण के लिए, कक्षा 5 तक संचालित होने वाले स्कूलों के पास मान्यता हासिल करने के लिए 200 स्क्वायर यार्ड भूमि का होना अनिवार्य है, जबकि कक्षा 8 तक चलने वाले स्कूलों के पास 800 स्क्वायर यार्ड भूमि होना आवश्यक है। अनधिकृत (अनऑथराइज्ड) कॉलोनियों व झुग्गी बस्तियों (स्लम) में संचालित होने वाले स्कूलों के आस पड़ोस में एक तो पर्याप्त जमीन की कमी होती है दूसरे, यदि भाग्यवश जमीन उपलब्ध हो भी तो फिर स्कूलों की क्षमता उन्हें खरीदने की नहीं होती है, इसलिए ऐसे क्षेत्रों में अधिकांश स्कूल गैरमान्यता प्राप्त संस्थान के तौर पर संचालित होते हैं।

केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) से संबद्धता प्राप्त करने के लिए शहरी क्षेत्र में संचालित होने वाले स्कूलों को 1.5 एकड़ जमीन व ग्रामीण क्षेत्र में संचालित होने वाले स्कूलों को 3 एकड़ जमीन की आवश्यकता पड़ती है। बजट प्राइवेट स्कूलों के समक्ष सबसे बड़ी बाधा इतने बड़े भूखंड को हासिल करना ही है इसलिए अधिकांश स्कूल केवल कक्षा 8वीं तक के ही होते हैं। शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीई) 2009 भी स्कूलों के लिए मान्यता प्राप्त होना आवश्यक बनाता है, और ऐसा न होने पर उन्हें बंद करने की बात कहता है। भारी आधारभूत संरचानाओं वाले नियमों और बढ़ते नियामक अर्हताओं (रेग्युलेटरी कम्प्लायंसेज़) के कारण आरटीई लागू होने के बाद से देश भर में हजारों स्कूल बंद होने को मजबूर चुके हैं। जो स्कूल अर्हताओं को पूरा करने में असमर्थ हैं फिर भी संचालित हो रहे हैं ऐसे स्कूलों पर 1 लाख रूपए का एक मुश्त जुर्माना और प्रतिदिन 10 हजार रूपए के हिसाब से जुर्माने का प्रावधान है।

मीडिया में प्रकाशित खबरों के मुताबिक महाराष्ट्र में लगभग 7 हजार स्कूल, पंजाब में 13 सौ स्कूल, कर्नाटक में 786 स्कूल और दिल्ली में 12 सौ स्कूलों को बंद करने का नोटिस प्रदान किया जा चुका है। केंद्रीय मानव संसाधन एवं विकास मंत्रालय ने संसद में पूछे गए एक प्रश्न के जवाब में 2,173 स्कूलों का बंद होना स्वीकार करते हुए इसकी लिखित जानकारी दी है। बहुत सारे स्कूल शिक्षण जैसे आदर्श कार्य के ऐवज दंड प्राप्त करने का खतरा (रिस्क) मोल लेने की बजाए स्वतः ही बंद हो जाना मुनासिब समझा। यदि सरकार ने आधारभूत संरचना वाले नियम को आसान नहीं बनाया तो आने वाले वर्षों में और अधिक संख्या में स्कूल बंद होने वाले हैं। सरकारी स्कूलों के मुफ्त होने व तमाम अन्य सुविधाएं मुफ्त में मिलने के बावजूद अभिभावक अपने बच्चों को फीस चुका कर बजट प्राइवेट स्कूलों में भेजना पसंद कर रहे हैं।  

उपरोक्त घटनाओं में छात्रों के शिक्षा के अधिकार की अनदेखी न हो सके इसके लिए पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय द्वारा तय प्रक्रियाओं का भी पालन नहीं किया जा रहा है। कुछ मामलों में तो यह भी देखने को मिल रहा है कि, सरकारें बीपीएस को बंद करने का प्रयास महज इसलिए भी कर रही हैं ताकि पड़ोस के सरकारी स्कूलों में पर्याप्त दाखिला सुनिश्चत हो सके।

जारी है... (शेष अगले भाग में)

लेखक परिचयः
कुलभूषण शर्मा

कुलभूषण शर्मा, ‘फेडरेशन ऑफ प्राइवेट स्कूल्स एसोसिएशन’, हरियाणा के प्रेसिडेंट हैं। वह ‘नेशनल इंडिपेंडेंट स्कूल्स अलाएंस’ (निसा) के प्रेसिडेंट, ‘पैट्रियॉटिक फोरम ऑफ इंडिया’ के स्टेट प्रेसिडेंट व ‘राष्ट्रीय मानवाधिकार संरक्षण संगठन’ के कार्यकारी स्टेट प्रेसिडेंट भी हैं। वह पूर्व में ‘राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान’ के जनरल काउंसिल के सदस्य और ‘स्कूल एजुकेशन रूल्स रिव्यू कमेटी’ के सदस्य भी रहे हैं।
अमित चंद्रा
अमित सेंटर फॉर सिविल सोसायटी (सीसीएस) की पॉलिसी एडवायजरी के हेड हैं। उन्होंने शहरी परिवेश में स्ट्रीट वेंडिंग को वैध रोजगार के रूप में पहचाने दिलाने के लिए ‘जीविकाः लॉ, लिबर्टी एंड लाइवलीहुड’ एडवोकेसी कैंपेन का सफल संचालन किया और राजस्थान व बिहार में कानून के गठन की राह सुनिश्चित करने में अहम भूमिका निभाई।

- सेंटर फॉर सिविल सोसायटी द्वारा प्रकाशित 'रिपोर्ट्स ऑन बजट प्राइवेट स्कूल्स इन इंडिया' से साभार