फीस वृद्धिः स्कूलों से नहीं आरटीई से लड़ें अभिभावक

प्राइवेट स्कूल प्रत्येक वर्ष फीस में कुछ न कुछ बढ़ोतरी अवश्य करते हैं। बच्चों को मिलने वाली गुणवत्ता युक्त शिक्षा के ऐवज में आमतौर पर अभिभावकों यह स्वीकार्य भी होता है। हालांकि, हाल फिलहाल में अलग अलग मदों में होने वाली फीस वृद्धि को अनापेक्षित व अनावश्यक बताते हुए अभिभावकों ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया है। वे अब सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन करने लगे हैं।

सत्ता एवं विपक्ष सहित समस्त राजनैतिक दलों ने इस मौके को भुनाते हुए फीस नियमन व स्कूल प्रबंधन को नियंत्रित करने की तरफ कदम बढ़ा दिए। दो सप्ताह पूर्व गुजरात में, जहां इस वर्ष विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं; स्कूली फीस को नियंत्रित करने के लिए एक कानून पारित कर दिया गया। हालांकि यह पहला मौका नहीं है जब किसी राज्य ने ऐसा कदम उठाया हो।
फीस नियंत्रित करने के लिए कानून बनाने की शुरूआत वर्ष 2009 में तमिलनाडु से हुई थी जो अब राजस्थान, महाराष्ट्र, कर्नाटक और पंजाब तक पहुंच चुकी है। दिल्ली ने भी स्कूली फीस नियंत्रण के उद्देश्य से दिल्ली एजुकेशन एक्ट 1973 में संशोधन प्रस्तावित किया, लेकिन यह मामला राज्य सरकार व उपराज्यपाल के बीच जारी कश्मकश के बीच फंस गया। उत्तर प्रदेश की एक माह पुरानी सरकार ने भी स्कूली फीस को नियंत्रित करने के उद्देश्य से स्कूलों के खातों की जांच कराने संबंधित फरमान जारी करने शुरू कर दिए हैं।

हालांकि इस ओर आगे बढ़ने से पूर्व स्कूलों द्वारा फीस बढ़ाने के कारणों को भी समझना अत्यंत आवश्यक है। दरअसल, फीस बढ़ने का सबसे बड़ा कारण शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 के वे प्रावधान हैं जिसके क्रियान्वयन ने स्कूलों पर बड़ा आर्थिक बोझ डाल दिया है। ऐसे कुछ प्रावधान हैं:

आधारभूत ढांचों से संबंधित प्रावधानः

आरटीई एक्ट का अनुच्छेद 18 और 19 स्कूलों के लिए मान्यता प्राप्त होना अनिवार्य बनाता है। लेकिन मान्यता प्राप्त करने के लिए स्कूलों को आधारभूत ढांचों से संबंधित कई अर्हताओं को पूरा करने का प्रावधान है। इन प्रावधानों में निश्चित आकार की भूमि की अनिवार्यता सबसे बड़ी अड़चन है। एक्ट के अनुसार केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) से मान्यता प्राप्त होने के लिए शहरी क्षेत्र के स्कूलों के लिए एक एकड़ व ग्रामीण क्षेत्रों के स्कूलों के लिए दो एकड़ की भूमि का होना आवश्यक है। इसके अतिरिक्त यह एक्ट कक्षा कमरों, खिड़कियों, खेल के मैदान, पुस्तकालय, शौचालय आदि की उपलब्धता और आकार प्रकार की विस्तार से व्याख्या करता है। शहरी क्षेत्र में जमीन या तो उपलब्ध नहीं है या फिर यदि उपलब्ध है भी तो काफी महंगी है।

अध्यापकों की योग्यता एवं वेतनः

आरटीई एक्ट का अनुच्छेद 23 स्कूलों के लिए केवल प्रशिक्षित अध्यापकों की नियुक्ति व सराकीर स्कूलों के अध्यापकों के समान वेतन की अनिवार्यता की व्याख्या करता है। प्रशिक्षित अध्यापकों को सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के अनुरुप वेतन प्रदान करने की भी बात कही गई है। जबकि वर्तमान में भारत में तकरीबन 5 लाख बीएड उतीर्ण प्रशिक्षित अध्यापकों की कमी है। इसके अलावा एक्ट में प्रत्येक कक्षा में 30 छात्रों पर एक अध्यापक का अनुपात भी तय कर दिया गया है जिसके कारण सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के अनुरुप वेतनमान का बोझ प्रति छात्र बहुत अधिक बढ़ गया है।  

आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग का कोटाः

एक्ट का अनुच्छेद 21.1 सी सभी निजी स्कूलों की 25 फीसदी सीटों को आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्लूएस) व वंचित तबके के छात्रों के लिए आरक्षित रखने को अनिवार्य घोषित करता है। स्कूल इन छात्रों से शुल्क नहीं वसूल कर सकते, और इसके बदले सरकार के द्वारा स्कूलों को फीस की प्रतिपूर्ति करने का प्रावधान है। लेकिन तमाम राज्यों में फीस प्रतिपूर्ति के लिए व्यवस्था तंत्र की स्थापना तक नहीं हुई है, अतः स्कूलों को प्रतिपूर्ति राशि नहीं मिल रही है। प्रतिपूर्ति की नौकरशाही व्यवस्था से बचने के लिए स्कूल 75 फीसदी छात्रों का फीस बढ़ाने जैसे आसान तरीके को अपना रहे हैं।

स्कूलों पर तालाबंदीः

देश में लंबे समय से ऐसे स्कूलों की भारी कमी रही है जिनकी ख्याति गुणवत्ता युक्त शिक्षा प्रदान करने की हो। आरटीई एक्ट के उपरोक्त प्रावधानों की अर्हता को पूरा करना काफी खर्चीली प्रक्रिया हो गई है, और उक्त प्रावधानों की अर्हता को पूरा न करता हुआ पाया जाने पर स्कूल पर 1 लाख रूपए के जुर्माने का प्रावधान है और इसे कानून का उल्लंघन मानते हुए 10 हजार रूपए प्रतिदिन का जुर्माना तब तक लगाया जाएगा जबतक कि उल्लंघन को दुरूस्त नहीं कर लिया जाता। भारत में कम फीस के ऐवज में शिक्षा प्रदान करने वाले लगभग 3 लाख बजट प्राइवेट स्कूल्स हैं जो एक्ट के प्रावधानों की अर्हता को पूरा कर पाने में समर्थ नहीं हैं और जुर्माने के भय से बंद हो रहे हैं। बजट प्राइवेट स्कूलों की अखिल भारतीय संस्था, नेशनल इंडिपेंडेंट स्कूल्स अलाएंस (निसा) के हिसाब से लगभग 10 हजार स्कूल अबतक बंद हो चुके हैं। इससे अच्छे स्कूलों की कमी और बढ़ी है और अभिभावकों के समक्ष उपलब्ध विकल्पों को सीमित हुई है। 

ध्यान देने योग्य महत्वपूर्ण बात यह है कि आरटीई एक्ट वर्ष 2010 में अधिसूचित हुआ था और राज्यों को इस कानून को लागू करने के लिए तीन वर्ष का समय प्रदान किया गया था। किंतु देश का कोई भी राज्य अब तक इसे पूरी तरह से लागू नहीं कर सका है। वर्ष 2013 के बाद से राज्य सरकारों ने एक्ट के गिने चुने ऐसे प्रावधानों को लागू करने पर जोर डालना शुरू किया जो केवल निजी स्कूलों पर लागू होते हैं। ध्यान देने योग्य बात है कि अवांछनीय फीस वृद्धि की शिकायतें भी अधिकांश उन्हीं राज्यों से आ रहीं हैं जिन्होंने आरटीई एक्ट को लागू करने पर जोर दिया है।

थिंकटैंक सेंटर फॉर सिविल सोसायटी ने ‘कॉस्ट ऑफ कम्पलाएंस टू नॉर्म्स एंड स्टैंडर्ड्स सेट फॉरवर्ड बाय आरटीई सेक्शन 18 एंड 19’ विषयक अध्ययन के दौरान वर्ष 2013 में ही इस बात की भविष्यवाणी कर दी थी कि यदि इस एक्ट को पूरी तरह से लागू कराया गया तो स्कूली फीस में औसतन चौगुने से अधिक की वृद्धि होगी अथवा देशभर में सस्ती शिक्षा प्रदान करने वाले लगभग एक लाख स्कूल बंद हो जाएंगे और इसमें पढ़ने वाले लगभग 1 करोड़ छात्र स्कूल से बाहर हो जाएंगे।

दुर्भाग्यवश इसका खामियाजा अभिभावकों को भुगतना पड़ रहा है और उन्हें लोक-लुभावन कानून लागू करने की बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही है। अभिभावकों को यह समझने की जरूरत है कि स्कूली फीस बढ़ने के कारणों को दूर किया जाना आवश्यक है। फीस नियंत्रण जैसा कदम भले ही थोड़े समय के लिए राहत दे सकता है लेकिन दीर्धावधि में यह बड़ा दर्द देगा।

- अमित चंद्र (लेखक सेंटर फॉर सिविल सोसायटी में एसोसिएट डाइरेक्टर हैं)
साभारः स्वराज्य मैगजीन

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