पर्यावरणीय विकास की ओर एक कागज कारखाना

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रायबरेली के एक कागज निर्माता कारखाने ने बिजली बनाने का तरीका इजात किया है जो पर्यवारण के बिलकुल अनुकूल है | पश्चिमी उत्तर प्रदेश की श्री भवानी पेपर मिल ने चावल की भूसी से बिजली बनाने का प्लांट लगाया है|

मिल ने सर्वप्रथम सन 2001 में पहला बोइलर प्लांट लगाया जिसमे जलवाष्प बनायीं जाती थी | इस जलवाष्प का कुछ हिस्सा पेपर बनाने वाले भाग में भेज दिया जाता है और बची हुई जलवाष्प से टर्बाइन इंजन को घुमाया जाता है | इस टर्बाइन से बिजली का निर्माण किया जाता है. सन 2007 में कंपनी के वर्तमान निदेशक सुनील टंडन ने दूसरा बायलर प्लांट लगाया जिस से इस मिल की बिजली सम्बन्धी सभी जरूरते पूरी हो गयी है|

ये दोनों प्लांट मिलके 2.6 मेगावाट बिजली का उत्पादन करते हैं जिसमे से 0.5 मेगावाट का प्रयोग बिजली उत्पादन की संपूर्ण क्रिया में चला जाता है | इस से पूर्व ये मिल राज्य विद्दयुत निगम से बिजली खरीदता था | सन 2001 में मिल का मासिक बिजली का बिल 30 लाख रुपये था | कंपनी के उप-प्रबंधक गोपाल सिंह नेगी ने बताया की निगम की बिजली सेवा में बहत खामियां थी | अनियमित तरीके से बिजली की कटौती होती थी जिस वजह से मिल को करोड़ों का नुक्सान हो जाता था|

आज ये मिल लगभग 1.10 करोड़ रुपये  की बिजली का उत्पादन कर रही है और  बिजली के लिए किसी पर निर्भर भी नही है | अब कंपनी कम खर्चे में ज्यादा बिजली के  साथ साथ पेपर का निर्माण भी कर रही है| इस मिल के वजह से आस पास के किसानो को भी फायदा हो रहा है | जो भूसी वो पहले या तो जला दिया करते थे या फेक दिया करते थे वो अब सीधे इस पेपर मिल को बेच देते हैं | पेपर मिल ये भूसी 3 रुपये किलो में खरीदती है | इस तरह से अब वातावरण भी सुरक्षित रहता है|

पेपर की भूसी एक बायोमास ईंधन है जिसके जलने से कार्बन उत्सर्जन नहीं होता है बल्कि पर्यावरण का संरक्षण भी होता है|

येल विश्विद्यालय के विशेषज्ञों के द्वारा बनायीं गयी ग्लोबल प्रोटेक्शन इन्वायरमेंट इंडेक्स , 2010 के 163 देशो में भारत का 123 वां स्थान है, जो चिंतनीय है | ऐसा होते हुए भी यह छोटी सी पेपर मिल देश का नाम वैश्विक स्तर पर ऊंचा कर रही है|

बीते वर्ष कंपनी ने 57000 कार्बन क्रेडिट बेचे | अंतरराष्ट्रीय बाजार में एक कार्बन क्रेडिट की कीमत 550 रुपये है | जिसके अनुसार मिल ने 1.21 करोड़ रुपये कमाए हैं | बिजली बनाने के इस प्रक्रिया में अंतिम उत्पाद के साथ साथ पानी और काली राख भी निकलती है | शुरुआती दिनों में इस काली राख की वजह से लोगों को आँखों एवं सांस से सम्बंधित कई समस्याओं का सामना भी करना पड़ा | पर सन् 2007 में कंपनी ने एक वेट चैम्बर प्लांट लगाया है | अब काली राख गीली अवस्था में प्राप्त होती है जिसका प्रयोग नई इमारतों के निर्माण में होता है|

श्री भवानी पेपर मिल ने इस वर्ष के अंत में एक नया बायलर प्लांट लगाने का उद्देश्य रखा है | कंपनी ने विद्युत निर्माण के बारे में भी सोचा है पर अभी भी राज्य की और से हरी झंडी का इंतज़ार है|

- रतनेन्द्र पान्डे