हमारी विफल शिक्षानीति में तत्काल सुधार जरुरी (2)

भाग 1 http://azadi.me/our-failed-education-policy से आगे..

वर्ष 2008 में ओडिसा और राजस्थान के छ: हजार अधिक विद्यार्थियों ने गणित एवम् विज्ञान के जाने-माने "ग्लोबल ट्रेण्ड इन इण्टरनेशनल मैथेम्टिक्स एण्ड साइन्स स्टडी टेस्ट' में भाग लिया। वे इसमें हिस्सा लेने वाले कुल 49 प्रतिभागियों में से क्रमश: 43वें व 47वें स्थान पर रहे थे। उनका औसत प्रदर्शन का विचलन "ऑर्गनाईजेशन फॉर इकोनॉमिक को-आपरेशन एण्ड डेवलपमेन्ट" (ओइसीडी) के मानक से तीन मानक नीचे था। वर्ष 2009 में शैक्षिक दृष्टि से भारत के श्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले दो राज्यों -हिमाचल प्रदेश और तमिलनाडु ने ओइसीडी द्वारा संचालित "प्रोग्राम फॉर इन्टरनेशनल स्टूडेण्ट एसोशिएशन (पीआईसीए) टेस्ट में भाग लिया। दोनों राज्य इस टेस्ट में एकदम निचले क्रम अर्थात  कुल 74 प्रतिभागियों में से 72वें और 73वें स्थान पर रहे। भारतीय विद्यार्थियों का औसत स्तर ओईसीडी विद्यार्थियों की तुलना में एकदम तलहटी पर फिफ्थ परसेन्टाईल था।

भारतीय प्राधिकारी इससे जुड़े "पीआईएसए" (पीसा) परीक्षण में भाग लेने पर भी बेहद शर्मिन्दा हैं। कथित रुप से पश्चिमी शैली के ये टेस्ट भारतीय विद्यार्थियों को माफिक नहीं बैठते हैं। लेकिन वर्ष 2009 में तीन सर्वोच्च स्थानों पर सिंगापुर, दक्षिण कोरिया और जापान रहे और एशियाई देश लगातार "पीआईएसए" टेस्टों में भी उच्च स्थान पर रहे। इतना संभवत: अधिकारियों के लिये तमगे से कम नहीं है।

भारत की स्कूली शिक्षा नीति इतनी अप्रभावी क्यों है? इसके कई कारण हो सकते हैं लेकिन मेरे हिसाब से कुछ कारण जो कि अत्यंत महत्वपूर्ण हैं वो हैं: पहला, भारत में शिक्षानीति सीखने के परिणामों (लर्निंग आउटकम) की तुलना में "इनपुट" पर ज्यादा केन्द्रित है। दूसरा, शिक्षा नीति प्राथमिक या माध्यमिक शिक्षा के विपरीत उच्च शिक्षा के पक्ष में कड़ा सम्भ्रान्तवादी रुझान रखती है। एशियाई देशों में, प्रति विद्यार्थी प्राथमिक शिक्षा एवं उच्च शिक्षा के मद में सार्वजनिक खर्च का अनुपात मलेशिया में चार से कम, इण्डोनेशिया में दो और थाईलैण्ड और कोरिया में एक है जबकि भारत में यह संख्या नौ से अधिक है। सबसे महत्वपूर्ण कारण स्कूली शिक्षकों के लिये प्रोत्साहन के ढाँचे का विकृत होना है, जिससे वस्तुत: दयनीय प्रदर्शन तो सामने आना ही है। 

सरकारी स्कूलों के शिक्षकों का वेतन बहुत अधिक है। यह देश में प्रतिव्यक्ति औसत आय का तीन गुना है जो अन्य देशों की तुलना में काफी अधिक है। यह चीन की तुलना में ज्यादा है जहाँ शिक्षकों का वेतन प्रति व्यक्ति आमदनी के बराबर हैं। उससे बड़ी बात यह है कि भारत में एक शिक्षक की नौकरी लोकसेवक के रुप में जिन्दगी भर रोजगार की गारंटी होती है चाहे नौकरी में उसकी प्रदर्शन कैसा भी हो। विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों के प्रति उनकी कोई जवाबदेही नहीं होती है। शिक्षकों की जो भी थोड़ी बहुत जवाबदेही होती है वह शिक्षा विभाग यानी नौकरशाही के प्रति होता है। प्रदर्शन न करने पर शिक्षकों को नौकरी से निकालने की तो बात तो दूर, इसके लिए उन्हें डांट भी शायद ही कभी पड़ती हो। बड़ी तादात (कुछ सर्वेक्षणों के मुताबिक लगभग 25%) में शिक्षकों की कक्षा में अनुपस्थिति भी आम बात है। यहाँ तक की जब स्कूल में उपस्थित होते हैं तब भी शिक्षक प्राय: पढ़ाने की बजाए दूसरी गतिविधियों में व्यस्त रहते हैं। कम तनख्वाह और ज्यादा योग्यता के साथ संविदा शिक्षक स्थायी शिक्षकों की तुलना में ज्यादा बेहतर तरीके से नौकरी करते हैं। शिक्षकों को औसत वेतन देने वाले व प्रति छात्र कम खर्च वाले प्राइवेट स्कूलों के छात्रों के सीखने की योग्यता भी आमतौर पर बेहतर होती है। छात्रों को दाखिला देने के मामले में निजी स्कूलों की हिस्सेदारी एक तिहाई से ज्यादा है और यह लागातार तेजी से बढ़ रही है। यह तो तब है जबकि निजी स्कूलों में जाने के लिए शुल्क देना पड़ता है और सरकारी स्कूल निशुल्क हैं।

भारत की शिक्षा नीति की विफलता के दूरगामी प्रभाव होंगे। बुनियादी शिक्षा की इस कमजोर नींव के बूते मौजूदा कार्यबल की एक बड़ी तादात को उच्च कौशल व उच्च उत्पादकता वाली नौकरियों के लिए प्रशिक्षित नहीं किया जा सकता है। इंडिया इम्पलायमेन्ट रिपोर्ट (आइईआर) 2016 के आंकलन के मुताबिक भारत को प्रतिवर्ष 16 मिलियन अतिरिक्त लोगों को समुचित आय वाली उत्पादक नौकरियां प्रदान करनी होंगी। रिपोर्ट में लेकिन यह भी बताया गया है कि केवल पाँच मिलियन वेतनवृद्धि युक्त नौकरियाँ ही उच्च कौशल वाले कार्य के लिये उपलब्ध है। मौजूदा समय में जिन अण्डरइम्पलाईड कामगारों को निम्न स्तर पर शिक्षा दी गई है, वे ज्यादातर निम्न अथवा मध्यम कौशल वाली नौकरियाँ ही पा सकेंगे, लेकिन असंगठित क्षेत्रों की तुलना में संगठित क्षेत्रों में वे अच्छा वेतन पा सकेंगे। 

दुर्भाग्य से ऐसे कामगारों की न तो माँग समुचित रुप में तेजी से बढ़ पा रही है और न ही ऐसे उपयुक्त कुशल कामगारों की आपूर्ति हो पा रही है जो असंगठित क्षेत्रों से संगठित क्षेत्रों की ओर जा सकें। एक अद्यतन प्रतिवेदन में यह तथ्य प्रस्तुत किया गया है कि काम करने की इच्छा रखने वाले भारतीय कामगारों की संख्या पिछले चार सालों में चौंतीस प्रतिशत से बढ़कर चालीस प्रतिशत हो गई है। विडम्बना देखिये कि लगभग साठ प्रतिशत लोग जो रोजगार चाहते हैं वो अभी बेरोजगार हैं। 

स्थानाभाव के कारण, मैं इस विमर्श को शिक्षा के उन वस्तुनिष्ठ मूल्यों तक जो कि कार्यबल को यथोचित भुगतान वाली उच्च उत्पादकता वाली नौकरियाँ दिलवा सके उस तक ही सीमित रख पाया। जबकि एक सक्षम शिक्षा व्यवस्था के आंतरिक मूल्य भी कम से कम उतने ही महत्वपूर्ण हैं जो कि नागरिकों को जीवन का आनन्द लेने और एक मजबूत प्रजातांत्रिक व्यवस्था में भागीदारी बना सके। शिक्षा के वस्तुनिष्ठ (इन्स्ट्रूमेन्टल) मूल्य और आंतरिक मूल्य, दोनों ही हमारी बेकार शिक्षा व्यवस्था के लिये सर्वोपरि महत्व रखते हैं। दुर्भाग्य से उत्तरप्रदेश और अन्य राज्यों के आने वाले चुनाव में राजनैतिक मुद्दे ही ज्यादा सामने आ रहे हैं। अब जबकि लोकसभा चुनाव केवल ढाई साल की दूरी पर हैं तथापि जब तक कि शासक राजकौशल और राजनैतिक इच्छाशक्ति का प्रदर्शन नहीं करेंगे गँभीर नीतिगत सुधार जिनका दीर्घगामी असर होगा वो एकदम सीमित रहेंगे। लेकिन संक्षिप्त रूप में कहें तो यही कारण है कि शिक्षा सुधार जैसे दीर्घावधि के लक्ष्य सुधि जनों के एजेंडे में सर्वोपरि होने चाहिए।

- सुदीप्तो मंडल

(गुवाहाटी में राधाकमल मेमोरियल व्याख्यानमाला मे लेखक द्वारा 24 नवम्बर को प्रस्तुत प्रतिवेदन पर यह निबन्ध आधारित हैं। सुदीप्तो मंडल, नेशनल इन्स्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फायनेन्स एण्ड पॉलिसी में प्रोफेसर और चौदहवें वित्त आयोग के सदस्य हैं।)
साभारः लाइवमिंट
http://www.livemint.com/Opinion/0t7aalXT6u3SGMkFIOlaJN/Our-failed-educat...