हमारी विफल शिक्षानीति में तत्काल सुधार जरुरी (1)

वर्ष 2016 के अंत के साथ नरेन्द्र मोदी सरकार का आधा कार्यकाल पूरा हो चुका है। अतः मध्यावधि समीक्षा के लिये यह अच्छा समय है। मगर ऐसी किसी भी समीक्षा पर विमुद्रीकरण आघात से जुड़ी घटनाओं का प्रभुत्व तो रहेगा ही। इस एक अल्पावधि के घटनाचक्र को छोड़कर सरकार को अपने कार्यकाल के उत्तरार्ध में किस एक महत्वपूर्ण नीतिगत सुधार पर जोर देना चाहिये? तो मैं यह कहूँगा कि यह हमारी विफल शिक्षा नीति है जिसमें सुधार की जरुरत है। आगे पूरा आलेख इसी बात की व्याख्या करेगा कि ऐसा क्यों जरुरी है?

भारतीय अर्थव्यवस्था लम्बे समय से दो व्यापक चुनौतियों का सामना कर रही है। एक चुनौती तो तेजी से बिगड़ते पर्यावरण की है, जिसमें स्वच्छ जल का अभाव शामिल है, जिसे मैं अभी इस आलेख से अलग रखना चाहूँगा। दूसरी चुनौती है बोरोजगारी का भूत (या भय)। सटीक शब्दावली में कहें तो "अण्डर-एम्पलायमेन्ट" अर्थात पूरी तरह से रोजगार न मिलना। ऐसे बहुत-से कारण हैं जो रोजगार के अवसर पैदा करने की धीमी वृद्धि के लिये जिम्मेदार हैं। विपन्न अधोसंरचना से लेकर विपन्न शासन तक और आर्थिक नीतियों के रोजगार विरोधी पक्षपाती घ्वंस भी इसके लिये जिम्मेदार हैं। मगर उच्च उत्पादकता वाले रोजगार की अभिवृद्धि में सबसे बन्धनकारी बाधा भारत की शिक्षानीति की विफलता है। देश के कुल कार्यबल का एक छोटा-सा हिस्सा ही कुशल उच्च उत्पादकता वाले रोजगार के लिये शैक्षणिक आधार रखता है। भारत में मुश्किल से पाँच प्रतिशत कार्यबल ही किसी कौशल प्रशिक्षण से युक्त हैं। केवल दो प्रतिशत कार्यबल के पास कोई औपचारिक कौशल प्रमाण पत्र है, जबकि यूरोपियन देशों- जैसे  यू.के. या जर्मनी में यह सत्तर प्रतिशत और पूर्वी एशियाई देशों जैसे जापान और दक्षिणी कोरिया में यह अस्सी से नब्बे प्रतिशत है। 

पूर्ववर्ती सरकार के कतिपय प्रयासों के आधार पर मौजूदा सरकार ने भारत में कौशल की भारी कमी को देखते हुए "राष्ट्रीय कौशल विकास और उद्यमिता नीति, 2015”  प्रस्तुत की। इस नीति के अन्तर्गत महत्वाकांक्षी प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (पीएमकेवीवाई) आरम्भ की गई, जो आने वाले सात सालों में पन्द्रह से पैंतालिस आयुवर्ग के लगभग चार सौ मिलियन श्रमिकों को प्रशिक्षित करेगी। इस योजना के सहित बहुत से विकास कार्यक्रम आरम्भ किये गये। इस योजना के अभी तक के परिणाम निराशाजनक हैं। इस योजना के बारे में संसदीय समिति को प्रस्तुत प्रतिवेदन में सरकार ने यह बताया है कि प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के अन्तर्गत 25 अप्रैल 2016 तक 1.76 मिलियन उम्मीदवार प्रशिक्षित किये गये हैं। इनमें से केवल 5,80,000 ही सफलतापूर्वक प्रशिक्षण पूर्ण करने का प्रमाण पत्र प्राप्त कर पाये। इन में से भी मात्र 82,000 वास्तविक रुप में रोजगार प्राप्त कर पाये। यह सफलता की दर इतनी कम क्यों है? उत्तर बड़ा सरल है, कोई भी कौशल विकास कार्यक्रम फिर वो चाहे जितना अच्छा क्यों न बनाया गया हो, बुनियादी शिक्षा के आधार के बिना सफल नहीं हो सकता है। लेकिन भारत में लम्बे समय तक प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा की उपेक्षा से गुणवत्तापूर्ण बुनियादी शिक्षा की प्राप्ति के अवसर बेहद सीमित हो गये।

यह तो स्पष्ट है कि शिक्षा के प्रति भारत की सम्भ्रांतवादी पूर्वाग्रहपूर्ण पहल इन घोषित नीतियों में नहीं है। मगर नीतियों के अमल और उसके नतीजों को देखने से यह साफ है कि दशकों तक उदात्त नीतिगत लक्ष्यों के बाद भी हम भारत का अपने पड़ोसी एशियाई देशों और उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में प्रदर्शन बेहद दयनीय हैं। भारत अंतत: यूनिवर्सल प्राथमिक शिक्षा के लक्ष्य की ओर बढ़  रहा है। सौ साल से भी ज्यादा समय पहले यह विचार प्रसिद्ध "गोखले'ज बिल ऑफ 1911" में प्रादूर्भूत हुआ था। चीन ने यह लक्ष्य 1970 में पा लिया था। दक्षिणी कोरिया ने तो इससे भी पहले 1960 में ही यह लक्ष्य प्राप्त कर लिया था और कमोबेश 1970 में यूनिवर्सल सेकण्डरी एजुकेशन का लक्ष्य पा लिया था।

वर्ष 2012 में भारत में सकल जनसंख्या में से 26 प्रतिशत निरक्षर थे जबकि तुलनात्मक रुप में दक्षिण अफ्रीका में 5 प्रतिशत, चीन में 4 प्रतिशत और तुर्की में केवल 2 प्रतिशत है। भारत की 50 प्रतिशत आबादी सिर्फ प्रथमिक शिक्षा प्राप्त है जबकि चीन में यह 38 प्रतिशत, दक्षिणी अफ्रीका में 24 प्रतिशत और तुर्की में 20 प्रतिशत है। भारत के ऊपरी सीमान्त में 13 प्रतिशत शिक्षित हैं, जिसकी तुलना आसानी से चीन में 10 प्रतिशत,  दक्षिणी अफ्रीका में 14 प्रतिशत और तुर्की में 15 प्रतिशत से की जा सकती है। भारत की शिक्षा प्रोफाईल की इस अजीब शीर्ष पर भारी संरचना से उच्च शिक्षा के साथ प्राथमिकता जुड़ रही है और बुनियादी शिक्षा की उपेक्षा हो रही है। भारत की शिक्षा नीति का क्रियान्वय सम्भ्रान्तवादी रुझान की पकड़ में है। देश की आबादी का आधा हिस्सा निचले हिस्से (बॉटम) में है, जो या तो निरक्षर है या फिर केवल प्राथमिक शिक्षा प्राप्त है। इस बीच़ टेरिटेरी शिक्षा से ऊपरी सतह पर एक गैर आनुपातिक बड़ा खण्ड बन जाता है।

ये आंकड़े निऱाशाजनक हैं फिर भी ये भारतीय शिक्षा नीति की विफलता की गहराई को प्रतिबिम्बित नहीं करती है। इसके लिये हमें उस सदमे में डालने वाले सीखने के उन नतीजों को देखना होगा जो "एनुअल स्टेट्स ऑफ एज्यूकेशन रिपोर्ट" में दिये गये हैं। कक्षा पाँचवीं के लगभग 52 प्रतिशत विद्यार्थी उस एक साधारण से पाठ को भी नहीं पढ़ पाते हैं जो कक्षा दो के लिये बनाया गया था। इसी प्रकार कक्षा पाँचवी के लगभग पचास प्रतिशत विद्यार्थी एक सामान्य-सा जोड़ -घटाव भी नहीं कर पाते है जो कक्षा दो के विद्यार्थियों के लिये बनाये गए थे। निराशाजनक बात यह है कि बार-बार असर (एएसईआर) सर्वेक्षण में ऐसे नतीजों के बाद भी स्थिति में कोई सुधार नजर नहीं आया। पढ़ने और गणित के बुनियादी ज्ञान के बीच की यह खाई कम होती नजर नहीं आ रही है और विद्यार्थियों को आगे की पढ़ाई के लिये असक्षम बना रही रहे हैं।

(जारी है..http://azadi.me/our-failed-education-policy-2)

- सुदीप्तो मंडल

(गुवाहाटी में राधाकमल मेमोरियल व्याख्यानमाला मे लेखक द्वारा 24 नवम्बर को प्रस्तुत प्रतिवेदन पर यह निबन्ध आधारित हैं। सुदीप्तो मण्डल, नेशनल इन्स्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फायनेन्स एण्ड पॉलिसी में प्रोफेसर और चौदहवें वित्त आयोग के सदस्य हैं।)

साभारः लाइवमिंट
http://www.livemint.com/Opinion/0t7aalXT6u3SGMkFIOlaJN/Our-failed-educat...